दुनिया भर में सूखे की समस्या बढ़ रही है. इसका एक कारण क्लाइमेट चेंज है. जमीन में स्थित पानी का स्तर भी घट रहा है. इनका काफी असर खेती पर पड़ रहा है. लेकिन अमेरिका स्थित ओरेगन के एक छात्र ने पानी की कमी से बचने का एक तरीका निकाल लिया है. ताकि फसलों को पानी मिल सके.
13 साल के लड़के ने 'हवा से पानी बनाने वाला डिवाइस' बना दिया, काम कैसे करेगा?
Device turns air moisture into water: 13 साल के छात्र रॉय कीम ने हवा से पानी बनाने वाले एक चैंबर बनाया है. यह चैंबर हवा में मौजूद नमी को ठंडा करके उसे पानी में बदल देता है, जिसका इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है. माने यहां हवा से बिल्कुल नया पानी नहीं बनता है, बल्कि उसमें पहले से मौजूद वॉटर वेपर को ठंडा कर पानी बनाया जाता है.

13 साल के छात्र रॉय कीम ने हवा से पानी बनाने वाले एक चैंबर बनाया है. यह चैंबर हवा में मौजूद नमी को ठंडा करके उसे पानी में बदल देता है, जिसका इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है. माने यहां हवा से बिल्कुल नया पानी नहीं बनता है, बल्कि उसमें पहले से मौजूद वॉटर वेपर को ठंडा कर पानी बनाया जाता है.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, रॉय कीम बीवरटन के व्हिटफोर्ड मिडिल स्कूल में पढ़ते हैं. उनके डिवाइस ने उन्हें '2026 3M यंग साइंटिस्ट चैलेंज' के टॉप 10 नेशनल फाइनलिस्ट में जगह दिलाई है.
3M और डिस्कवरी एजुकेशन की ओर से आयोजित '3M यंग साइंटिस्ट चैलेंज' अमेरिका के स्कूलों में 5वीं से 8वीं क्लास में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के लिए है. यह चैलेंज हिस्सा लेने वालों को असल दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए साइंस और इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा देता है.
कैसे काम करता है ये चैंबर?रॉय कीम के मॉडल में 'पेल्टियर मॉड्यूल' का इस्तेमाल किया गया है. यह एक ऐसा डिवाइस है जो बिजली मिलने पर तापमान में अंतर पैदा करता है. यानी एक हिस्सा बहुत ठंडा और एक हिस्सा गर्म हो जाता है, जिससे गर्म हवा में मौजूद नमी पानी की बूंदों में बदल जाती है.
पानी बनाने वाले प्रोजेक्ट में सबसे पहले हवा चैंबर में जाती है. वहां उसे गर्म किया जाता है, फिर एक पंखा उसे ठंडी सतह की तरफ फेंकता है. वहां एक प्लेट के टकराने के बाद उसमें मौजूद जलवाष्प ठंडा होकर पानी की बूंदों में बदल जाता है. यह बूंदें नीचे गिरकर फनल में इकट्ठी हो जाती हैं, जिन्हें वॉल्व का इस्तेमाल करके पौधों तक पहुंचाया जाता है.

इस सिस्टम में मिट्टी की नमी, तापमान और ह्यूमिडिटी सेंसर भी लगे हैं. ये सेंसर अपने-आप हवा के बहाव को एडजस्ट करते हैं. और तय करते हैं कि पौधों को असल में कब पानी की जरूरत है. इससे पानी की बर्बादी नहीं होती. टेस्टिंग के दौरान प्रोटोटाइप ने दो घंटे में 10 मिलीलीटर पानी बनाया. जिसकी ज्यादा से ज्यादा क्षमता 135.8 ग्राम प्रति किलोवाट-घंटा थी.
मगर बड़े खेतों के लिए काफी लीटर पानी की जरूरत है. हवा अगर काफी सूखी होगी, तब भी पानी बनने पर असर पड़ेगा. हालांकि, ये अभी सिर्फ शुरुआत है. आगे रॉय और एक्सपेरिमेंट करके इस समस्या का भी समाधान निकाल सकते हैं.
ये भी पढ़ें: दतिया उपचुनाव में बीजेपी को नरोत्तम मिश्रा के आंसुओं ने 'डुबो' दिया?
इस 13 वर्षीय छात्र को उम्मीद है कि उनका डिवाइस टिकाऊ खेती की तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए प्रेरित करेगा. वह भविष्य में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर और एनवायरनमेंटल समाधानों पर काम करने की भी प्लानिंग कर रहे हैं, जो पानी की कमी और क्लाइमेट चेंज जैसी ग्लोबल चुनौतियों से निपट सकें.
वीडियो: बांकीपुर में प्रशांत किशोर का बड़ा उलटफेर, दतिया में नरोत्तम मिश्रा को झटका













