प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर को अचानक पूरे देश पर नोटबंदी का गोला दाग दिया था. तबसे अब तक इस फैसले को लेकर तरह-तरह की अटकले लगाई गई हैं. जनता में अलग-अलग तरह की भावनाएं हैं. इसकी वजह से आई परेशानियों से गुस्सा है, इसे फेल समझने वालों में उपहास की भावना है, इसे कड़ा फैसला मानने वालों का तारीफी लहज़ा है और करोड़ों लोगों में ये उत्सुकता भी है कि इस फैसले की रूपरेखा कैसे बनी.
नोटबंदी को लेकर कयासों का दौर
पूरे देश में सब लोग अपनी-अपनी जगह दिमाग लगाते रहे कि ये आइडिया कहां से आया होगा, किस-किस के साथ डिस्कस किया गया होगा, अंतिम फैसला कब लिया गया होगा, किस-किस से शेयर किया गया होगा वगैरह-वगैरह. कुछ दिन पुणे के 'अर्थ क्रांति प्रतिष्ठान' के फाउंडर अनिल बोकिल का नाम सुर्ख़ियों में रहा कि मूल रूप से ये आइडिया उनका था. ये खुसर-पुसर भी होती रही कि भाजपा के लोगों को पहले ही चेतावनी दी गई थी. जितने मुंह उतनी बातें.जब एक भाई से सस्पेंस बर्दाश्त नहीं हुआ तो वो पहुंच लिया आरबीआई के पास 'सूचना के अधिकार' की नाव पर सवार हो कर. आरटीआई लगाई कि क्या इस फैसले से पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमनियम और वित्तमंत्री अरुण जेटली से सलाह ली गई थी? रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के सीपीआईओ (सेंट्रल पब्लिक इनफॉर्मेशन ऑफिसर) ने इस सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया है.
रिजर्व बैंक का दो टूक जवाब
आरटीआई के जवाब में रिजर्व बैंक ने कहा, "इस तरह का सवाल आरटीआई क़ानून की धारा 2(एफ) के तहत सूचना की परिभाषा में नहीं आता. बैंक ने इसे 'राय मांगना' बताया. हालांकि रिजर्व बैंक के इस जवाब से पूर्व सूचना आयुक्त शैलेष गांधी असहमत हैं. उन्होंने कहा, "इसे राय मांगना कैसे कहा जा सकता है? किसी से सलाह ली गई या नहीं, ये रिकॉर्ड का मामला है." याचिकाकर्ता ने यही सवाल प्रधानमंत्री ऑफिस और वित्त मंत्रालय से भी किया है. लेकिन 30 दिनों के बाद भी इस पर जवाब नहीं आया है. आवेदक ने ये जानने की भी इच्छा जताई थी कि 500 और 1000 के नोट बंद करने से पहले किन अधिकारियों से सलाह ली गई थी. इस पर रिजर्व बैंक ने कहा कि ये जानकारी बैंक नोटों को चलन से बाहर करने को लेकर है. आरटीआई क़ानून की धारा 8(1) के तहत इसका खुलासा करने की ज़रूरत नहीं है.अंधेरों में तीर चलाना जारी रखिये
ये बताने से भी इनकार किया गया है कि क्या किसी अधिकारी या मंत्री ने नोटबंदी के फैसले का विरोध किया था. आरबीआई ने कहा कि नोटबंदी से जुड़ी किसी भी बैठक का ब्योरा नहीं दिया जा सकता.तो आप अंदाज़ा लगाते रहें कि आप जो एटीएम की लाइनों में तड़प रहे हैं, बैंक अधिकारियों से माथा फोड़ रहे हैं, पेटीएम चलाना सीख रहे हैं, इन सब के लिए कौन-कौन ज़िम्मेदार हैं? कौन हैं वो लोग जिनकी वजह से पूरे भारत में शोरोगुल का समां कायम हुआ है? किस की खुराफ़ात का खामियाज़ा ख़ासो-आम को भुगतना पड़ रहा है?
एक मोदी जी के अलावा और किसी को 'ब्लेम करने का' या 'बलिहारी जाने का' ऑप्शन नहीं है. वैसे भी सब नदियों को सागर में ही मिलना होता है. सरेंडर कर जाइए.














