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राजस्थान में जिस दलित बच्चे की मौत हुई, उसके घरवालों ने कहा - "वो अपनी जाति की वजह से मारा गया"

बच्चे के चाचा ने कहा - "हमें आज भी बाल कटवाने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है."

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(बाएं-दाएं) दलित छात्र की अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार के समय की तस्वीरें. (आजतक)

राजस्थान के जालोर जिले के सरस्वती विद्या मंदिर में कथित पिटाई के बाद जिस दलित बच्चे इंद्र की मौत हुई है, उसके घरवालों ने कहा है कि बच्चा अपनी जाति की वजह से मारा गया है. 

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इंद्र के चाचा ने अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा है कि उन्हें अपने बाल कटवाने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, क्योंकि ऐसा हज्जाम ढूंढना होता है, जो उनके बाल काट सके. अखबार से बातचीत में इंद्र के चाचा किशोर कुमार मेघवाल ने कहा,

"मेरा भतीजा अपनी जाति की वजह से मारा गया. हमारे इलाके में दलितों को अमानवीय व्यवहार झेलना पड़ता है. आज भी हमें ऐसा हज्जाम (Barber) ढूंढने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है जो हमारे बाल काट सके. जब से हमने FIR दर्ज कराई है, हम अपनी ही सुरक्षा को लेकर डर में जी रहे हैं."

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वहीं इंडियन एक्सप्रेस की ही रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस फिलहाल इस घटना में किसी जाति का ऐंगल होने से इनकार कर रही है. पुलिस का कहना है कि जांच में अभी ये ऐंगल सामने नहीं आया है.

बता दें कि 13 अगस्त को जालोर के सुराणा में इंद्र की मौत हो गई थी. खबरों के मुताबिक बीती 20 जुलाई को इंद्र ने अपने प्राइवेट स्कूल के बर्तन से पानी पी लिया था, जो एक टीचर चैल सिंह को नागवार गुजरा. आरोप है कि एक दलित के मटके से पानी पी लेने से चैल सिंह को इतना गुस्सा आया कि बच्चे को मार-मार घायल कर दिया. बाद में गुजरात के अहमदाबाद के अस्पताल में बच्चे की मौत हो गई. 

आरोपी टीचर राजपूत समाज का

इस घटना के आरोपी टीचर चैल सिंह को गिरफ्तार किया जा चुका है. उसका स्कूल इंद्र के घर से कोई चार किलोमीटर की दूरी पर है. स्थानीय लोग बताते हैं कि चैल सिंह करीब बीते दो दशकों से ये स्कूल चला रहा था. इसके लिए उसने एक राजपूत परिवार से एक मंजिला इमारत किराये पर ली थी.

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सोमवार, 15 अगस्त को जालोर के एसपी हर्ष वर्धन अगरवाला और उनकी टीम ने स्कूल के कई दूसरे छात्रों के बयान दर्ज किए. इनमें वे छात्र भी शामिल हैं जो 20 जुलाई के दिन स्कूल में मौजूद थे. एसपी अगरवाला ने अखबार को बताया,

"हम इस आरोप की जांच कर रहे हैं कि छात्र को एक विशेष बर्तन से पानी पीने की वजह से मारा गया. स्कूल के लोगों से भी पूछताछ चल रही है. लेकिन शुरुआती जांच में ये आरोप सही साबित नहीं होता."

वहीं इंद्र के एक क्लासमेट ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर बताया कि 20 जुलाई को उसकी कागज के एक टुकड़े को लेकर इंद्र से बहस हो गई थी. इस छात्र के मुताबिक आरोपी टीचर ने तब दोनों को थप्पड़ मारा था. उधर चैल सिंह के स्कूल के स्टाफ ने उसका बचाव किया है. उनका कहना है कि स्कूल की बिल्डिंग में पानी का कोई बर्तन नहीं रखा गया था. स्कूल के एक टीचर अशोक जींगर ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,

"मैं ये तो नहीं कह सकता कि 20 जुलाई को असल में क्या हुआ था. लेकिन इस स्कूल में ज्यादातर स्टाफ एससी-एसटी समाज के ही हैं और कभी भी हमसे भेदभाव नहीं किया गया है. यहां कोई किसी मटकी से पानी नहीं पीता है. छात्र और टीचर स्कूल कंपाउंड में बने एक टैंक से पानी पीते हैं."

हालांकि इंद्र का परिवार आरोप लगाता है कि स्कूल के दलित टीचरों पर काफी दबाव है. उसका कहना है कि आरोपी चैल सिंह का बचाव करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि वही स्कूल का मालिक है.

इस मामले की जांच करने वाले अधिकारी (IO) हिम्मत चरण ने बताया कि स्कूल के आठ टीचरों में से तीन अनुसूचित जाति के हैं. दो अनुसूचित जनजाति से आते हैं. एक टीचर ओबीसी कैटेगरी से है. बाकी दो टीचर अन्य समाज के सदस्य हैं. इनमें चैल सिंह भी शामिल है. वो राजपूत समाज से आता है.

कांग्रेस विधायक विरोध पर उतरे

लेकिन कांग्रेस विधायक और राजस्थान अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन खिलाड़ी लाल बैरवा पुलिस और स्कूल के स्टाफ की बातों पर सवाल खड़े करते हैं. उनका कहना है,

"पुलिस की जो फैक्चुअल रिपोर्ट हमें भेजी गई, वो कहती है कि जाति का कोई ऐंगल नहीं है. लेकिन लोगों से बात करने के बाद मैं जान गया हूं कि (घटना की) यही वजह है. अगर पुलिस अपराध को दबाने की कोशिश कर रही है तो मैं पूरे पुलिस स्टेशन को सस्पेंड करने की सिफारिश करूंगा."

बता दें कि इंद्र की मौत की खबर आने के बाद सीएम अशोक गहलोत ने मृतक छात्र के परिवार को 5 लाख रुपये मुआवजे का ऐलान किया. इस पर खिलाड़ी लाल बैरवा ने नाराजगी जाहिर की. और कहा कि 50 लाख रुपये के मुआवजे के साथ परिवार के किन्हीं दो सदस्यों को सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए.

वहीं कांग्रेस के एक अन्य विधायक पाना चांद मेघवाल ने सोमवार को विधानसभा स्पीकर सीपी जोशी और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अपना इस्तीफा भेज दिया. इसमें उन्होंने कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी दलितों और अन्य वंचित लोगों पर लगातार हो रहे अत्याचार से वे आहत हैं.

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