'हमारे पास ऐसी डिवाइस (एमुलेटर) है, जिससे स्मार्ट फोन्स में मैलवेयर के सभी वर्जन होने का पता लगा. यह इतना खतरनाक मैलवेयर है कि इसे कानूनी रूप से इतेमाल करने की इजाजत नहीं मिल सकती. या अच्छे उद्देश्यों के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. यह न केवल आपके चैट्स पढ़ लेता है, बल्कि इससे आपके वीडियो भी चुराए जा सकते हैं.'पेगासस विवाद 18 जुलाई 2021 को दुनिया के 17 अखबारों और न्यूज़ पोर्टल्स पर पेगासस को लेकर एक प्रोजेक्ट के तहत खबरें छापी गईं. सामने आया कि इजरायल में सर्विलांस का काम करने वाली निजी कंपनी के डेटाबेस में दुनिया के हज़ारों लोगों के मोबाइल नंबर मिले हैं. इजरायल की इस कंपनी का नाम NSO ग्रुप है और इसके जासूसी करने वाले स्पाईवेयर का नाम पेगासस है. पता चला कि पेगासस का डेटाबेस लीक हुआ और सबसे पहले फ्रांस की नॉनप्रॉफिट मीडिया कंपनी- फॉरबिडन स्टोरीज़ और मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल को मिला. इन दोनों ने ये डेटा दुनिया के 17 मीडिया हाउस के साथ शेयर किया. जिसमें द गार्डियन, वॉशिंगटन पोस्ट जैसे प्रतिष्ठित अखबार शामिल हैं. भारत में ये डेटा द वायर को मिला. इस पूरे अभियान को पेगासस प्रोजेक्ट का नाम दिया गया. भारत से लिस्ट में किनके नंबर हैं? पेगासस प्रोजेक्ट में शामिल द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक डेटाबेस में भारत से 300 मोबाइल नंबर थे. इसमें 40 पत्रकार हैं. 3 बड़े विपक्षी नेता हैं. दो नरेंद्र मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री भी शामिल हैं, एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति और कई सिक्योरिटी एजेंसी के अधिकारी भी. कुछ कारोबारियों का नाम भी शामिल है. रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा नाम राहुल गांधी का आया. राहुल गांधी के दो मोबाइल नंबर पेगासस के संभावित टारगेट रहे. राहुल गांधी के नंबर को 2018 के मध्य से 2019 के मध्य तक टारगेट की लिस्ट में रखा गया था. अप्रैल-मई 2019 में देश में लोकसभा के चुनाव हुए थे. रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी के 5 दोस्तों और करीबियों के नंबर भी लिस्ट में हैं. इसके बाद पेगासस का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने कहा कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हर बार छूट नहीं पा सकती है. ऐसा कहते हुए कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया. न्यूयॉर्क टाइम्स का हालिया खुलासा? इस मामले में अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने करीब एक साल तक अपनी जांच पड़ताल की. इसके बाद 28 जनवरी 2022 को उसने एक रिपोर्ट छापी. रिपोर्ट में कई जरूरी बातों के साथ ये भी बताया गया है कि भारत सरकार ने 2017 में इज़रायल से 2 बिलियन डॉलर की एक डिफेंस डील की थी. और इसी सौदे में जासूसी करने वाला सॉफ्टवेयर पेगासस भी खरीदा गया. ये डील तब हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़रायल के दौरे पर गए थे. न्यूयॉर्क टाइम्स के इस खुलासे के बाद भी अभी तक ना तो भारत सरकार और ना ही इजरायल की सरकार ने पेगासस के खरीद-फरोख्त की बात स्वीकारी है.
पेगासस विवाद: कई फोन खंगालने के बाद एक्सपर्ट्स को क्या मिला है? जानिए
इन एक्सपर्ट्स को फोन्स में जो कुछ मिला, वह सरकार की मुश्किलें बढ़ाने वाला है
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Supreme Court पहले ही Pegasus मामले की जांच के लिए कमेटी का गठन कर चुका है. (फोटो: इंडिया टुडे/पीटीआई)
पेगासस सॉफ्टवेयर. साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स के शब्दों में कहें तो पेगासस मैलवेयर, इसे लेकर भारत में मचा सियासी बवाल थमता नजर नहीं आ रहा है. न्यूयॉर्क टाइम्स के हालिया खुलासे के बाद अब साइबर सिक्योरिटी से जुड़े विशेषज्ञों ने दावा किया है कि इस मैलवेयर के जरिए भारत में कुछ लोगों के फोन हैक किए गए थे. इन एक्सपर्ट के मुताबिक उन्हें इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं कि भारत में कई लोगों के स्मार्टफोन्स की पेगासस के जरिए जासूसी की गई थी.
कौन हैं ये एक्सपर्ट?
पेगासस विवाद में सुप्रीम कोर्ट में जिन लोगों ने याचिका दाखिल की थी. अब उन्होंने ही इस मामले की जांच कर रही कोर्ट की कमेटी के सामने एक नया हलफनामा दाखिल किया है. इस हलफनामे में एक्सपर्ट्स की एक जांच रिपोर्ट का जिक्र किया गया है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने साइबर सिक्योरिटी के कुछ एक्सपर्ट्स को अपने उन स्मार्टफोन्स की फॉरेंसिक जांच करने को कहा था जिनमें पेगासस के जरिए जासूसी किए जाने का शक था. इन एक्सपर्ट्स को जांच के दौरान कुछ स्मार्टफोन में पेगासस की सेंधमारी के पुख्ता सबूत मिले हैं.
एक्सपर्ट्स को क्या मिला?
इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक याचिकाकर्ताओं ने अपने नए हलफनामे में बताया है कि साइबर सिक्योरिटी के एक एक्सपर्ट को 7 आईफोन्स दिए गए थे. उनमें से दो आईफोन्स में पेगासस की मौजूदगी और छेड़छाड़ के सबूत मिले हैं. इस एक्सपर्ट ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि सुप्रीम द्वारा बनाई गई जांच कमेटी को यह बताया गया है कि उन्होंने फॉरेंसिक टूल्स के जरिए दो आईफोन्स में पेगासस की मौजूदगी पाई है. इस एक्सपर्ट् के मुताबिक एक आईफोन में अप्रैल 2018 में पेगासस डाला गया था, जबकि दूसरे आईफोन में जून और जुलाई 2021 के बीच कई बार इस मैलवेयर के अलग-अलग वर्जन डाले गए थे. इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने एक अन्य साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट को 6 एंड्रॉयड फोन्स की जांच की जिम्मेदारी सौंपी थी. इन सभी में पेगासस की घुसपैठ के ठोस सबूत मिले हैं. एंड्रॉयड फोन्स की जांच करने वाले इस एक्सपर्ट ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा,
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