"एक दिन पहले हमें मंत्रालय ने कॉल पर अवॉर्ड देने की जानकारी दी. वहीं से हमें हवाई जहाज के टिकट भेजे गए थे. यहां दिल्ली में हमें अशोका होटल में ठहराया गया है. सोमवार को मेरे पिता को राष्ट्रपति कोविंद ने अवॉर्ड दे कर सम्मानित किया."पद्मश्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. सोमवार को राष्ट्रपति भवन में सम्मान सामारोह का आयोजन किया गया जो मंगलवार को भी जारी रहा. इस दौरान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 119 लोगों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया. इनमें 7 पद्म विभूषण, 10 पद्म भूषण और 102 पद्मश्री सम्मान हैं.
पद्मश्री मोहम्मद शरीफ, 'लावारिस लाशों के मसीहा' जो अपने बेटे का अंतिम संस्कार नहीं कर पाए
अब तक 25 हजार लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं.
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(बाएं) मोहम्मद शरीफ को पद्मश्री देते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद. तस्वीर उनके ट्विटर हैंडल से साभार है. दाईं तस्वीर प्रतीकात्मक है (साभार- पीटीआई)
अयोध्या के मोहम्मद शरीफ को लोग 'लाशों के मसीहा' के नाम से जानते हैं. 83 साल के मोहम्मद शरीफ के रहते जिले में पिछले 25 सालों से किसी भी लावारिस लाश को अंतिम संस्कार के लिए नहीं तरसना पड़ा. उनकी इस समाज सेवा के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. वैसे तो मोहम्मत शरीफ को पद्मश्री मिलने की घोषणा 25 जनवरी, 2020 को ही कर दी गई थी. लेकिन कोरोना संकट के चलते उन्हें और पद्म पुरस्कार पाने वाली कई हस्तियों को अब जाकर ये सम्मान मिला है. सोमवार 8 नवंबर को पद्मश्री से नवाजे जाने के बाद से ही मोहम्मद शरीफ के जिले के लोगों में खुशी की लहर है.
लाशों के 'मसीहा' बनने के पीछे की कहानी
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 1992 में मोहम्मद शरीफ के बड़े बेटे रईस की सुल्तानपुर में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. शरीफ को इस हादसे के बारे में पता नहीं था. रईस की लाश सड़क पर ही पड़ी रही और कोई उसे अस्पताल नहीं ले गया. अखबार के मुताबिक रईस की लाश को जानवरों ने नोच खाया था. इस कारण मोहम्मद शरीफ अपने बेटे को दफ्ना भी नहीं पाए. इस बात ने उनको अंदर तक हिला कर रख दिया था. तब मोहम्मद शरीफ ने कसम खाई कि किसी भी मुर्दा की दुर्गति नहीं होने देंगे. रिपोर्ट की मानें तो तभी से मोहम्मद शरीफ जिले के अस्पतालों में जाकर हर लावारिस लाश के बारे में पता करते रहे हैं. जब भी उन्हें लावारिस शव पाए जाने की खबर मिलती, वे अपना ठेला लेकर पहुंच जाते. अगर किसी लाश को 72 घंटों तक कोई लेने नहीं आता तो पुलिस वो लाश मोहम्मद शरीफ को दे देती. जिसके बाद शरीफ उस अज्ञात शव का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करते. मोहम्मद शरीफ मरने वाले व्यक्ति के धर्म के मुताबिक ही उसका अंतिम संस्कार करते थे. शव किसी हिंदू का हो तो सरयू के किनारे पूरे रीति-रिवाजों के साथ उसका दाह संस्कार किया जाता, वहीं मुस्लिम होने पर शव को कब्र में दफ्ना देते. इस तरह मोहम्मद शरीफ अब तक 25 हजार से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. लोग तो उन्हें 'लावारिस लाशों के वारिस और मसीहा' कहने लगे हैं.
समाजसेवा में गरीबी नहीं आई आड़े
अयोध्या जिले के खिरकी अली बेग मोहल्ले में मोहम्मद शरीफ एक किराये के मकान में रहते हैं. उनकी साइकिल मरम्मत करने की दुकान है, जो फिलहाल उनका बीटा अशरफ चलाता है. उनका दूसरा बेटा शब्बीर ड्राइवर है. शरीफ कई सालों तक दुकान भी चलाते रहे और समाज सेवा के काम में भी लगे रहे. दिनभर में वे दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने लायक ही कमा पाते थे. लेकिन पैसे की किल्लत कभी भी उनकी समाज सेवा के आड़े नहीं आई. इन दिनों मोहम्मद शरीफ काफी बीमार हैं. इतने कि अब उनके लिए बिस्तर से उठा पाना भी मुश्किल हो गया है. ऐसे मेंं दोनों बेटे मिलकर घर खर्च चलाने के साथ उनका इलाज करा रहे हैं.
पिछले साल 25 जनवरी को भारत सरकार ने मोहम्मद शरीफ को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की थी. अब उन्हें दिल्ली से बुलावा आया तो परिवार के पास टिकट खरदीने के पैसे भी नहीं थे. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक मोहम्मद शरीफ के बेटे शब्बीर ने बताया,
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