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ये स्टार्टअप कउवों को नौकरी देगा और पर्यावरण भी बचाएगा

स्वच्छ भारत अभियान के लिए भी अच्छा आइडिया है ये.

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पर्यावरण को बचाने के लिहाज से कउवों का इस्तेमाल करने वाला ये स्टार्टअप काफी अच्छा है.
बचपन में एक प्यासे कउवे की कहानी पढ़ी थी. कैसे एक कउवा घड़े के पास पहुंचता है मगर उसमें पानी काफी नीचे होता है. उसकी मुंडी उसमें घुस नहीं पा रही होती है तो वो छोटे-छोटे पत्थर लाता है और घड़े में डालता है. इससे घड़े का पानी ऊपर आ जाता है. और कउवा छाती तर होने तक पानी पीता है. उस दिन एक बात समझ आ गई थी कि ये कउवा है आदमी काम का. बुद्धि है लौंडे में.
बचपन में किताब में कउवे की ये फोटो तो देखी ही होगी.
बचपन में किताब में कउवे की ये फोटो तो देखी ही होगी.

नीदरलैंड्स में भी ये बात एक कंपनी क्राउडेड सिटीज के लोगों को समझ आ गई. और इत्ती ज्यादा समझ में आ गई कि उन्होंने कउवे के भरोसे एक स्टार्टअप शुरू कर दिया. स्टार्टअप का नाम है क्रोबार (crowbar). क्रोबार स्टार्टअप पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी बहुत सही है. काहे से इसमें वो सिगरेट बटोरी जाएंगी जो धुआं छोड़ने के बाद लोग बड़े भौकाल से सड़क पर फेंककर चले जाते हैं. करीब 4.5 ट्रिलियन सिगरेट के टुकड़े (यानी 4.5000000000000 टुकड़े. यानी बहुत ही ज्यादा) ऐसे ही पूरी दुनिया में हर साल इधर-उधर फेंक दी जाती हैं. और ये नॉन बायोडिग्रेडेबल हैं. माने प्लास्टिक की तरह ये नष्ट नहीं होती और पर्यावरण में जहर घोलती रहती हैं. तैर-वैर के ये नालों, नदियों से होते हुए समुद्र तक पहुंचती हैं और सबको नुकसान पहुंचाती है. सो इसे इकट्ठा करने की तरकीब ही इस स्टार्टअप का मूलमंतर है.
कउवा सिग्रेट बट डालेगा तो उसे बदले में खाने को कुछ मिलेगा.
कउवा सिगरेट बट डालेगा तो उसे बदले में खाने को कुछ मिलेगा. (फोटो क्रेडिट-क्राउडेड सिटीज)

इसमें पर्यावरण सुधारक बनेंगे कउवे. डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ कउवों को स्पेशल ट्रेनिंग दी जाएगी, जिसके बाद वो यहां-वहां पड़ी सिगरेट पहले उठाएंगे फिर उसे क्रोबार में डालेंगे. अब सवाल उठता है कि कउवे क्रोबार में सिगरेट क्यों डालेंगे. घड़े में पत्थर डालने पर तो उन्हें पानी मिला था, यहां क्या मिलेगा. तो इसकी भी व्यवस्था है. जब भी कउवा इसमें सिगरेट डालेगा, क्रोबार उसे कुछ खाने के टुकड़े देगा. हालांकि खाने का सामान देने से पहले मशीन ये भी चेक करेगी कि कउवे ने सिगरेट बट ही डाला है. माना जा रहा है इस लालच में कउवा और सिगरेट बट लाएगा और अपने साथी कउवों को भी बताएगा.
आइडिया कैसे आया
देखो भाई, किसी भी स्टार्टअप के लिए सबसे ज़रूरी है आइडिया. इस स्टार्टअप के मालिक रुबेन वनडेर व्लुतेन और बॉब स्पाइकमैन एक बार एक जोशुआ क्लीन नाम के आदमी से मिले. जोशुआ कउवों को सिक्के बटोरने की ट्रेनिंग देते थे. बस यहीं से इन दोनों को खयाल आया अपने स्टार्टअप के लिए. उन्होंने सिगरेट उठाने के लिए कउवों को ट्रेनिंग देने की सोची. फिलहाल स्टार्टअप के लिए क्रोबार तैयार कर लिया गया है. अब तक के रिसर्च के नतीजे भी अच्छे रहे हैं. अब इसकी टेस्टिंग के लिए पायलट प्रोजेक्ट कुछ खास जगहों पर चलाया जाएगा. फिर ज्यादा से ज्यादा मशीनें बनाके इन्हें बेचा जाएगा.

देखा जाए तो ये स्टार्टअप पर्यावरण संरक्षण और साफ-सफाई के लिहाज से बहुत अच्छा है. ऐसे और भी प्रयास होते रहने चाहिए. भारत में तो गंदगी वैसे भी काफी देखी जाती है. खाने-पीने के रैपर से लेकर सिगरेट तक लोग जहां मन हुआ, वहां फेंक देते हैं. ऐसे में ये स्टार्टअप अपने देश के लिहाज से भी काफी कारगर साबित हो सकता है. देखने वाला होगा कि इंडिया आने मे क्रोबार को कितना वक्त लगेगा. खैर केंद्र सरकार को अपने स्वच्छ भारत अभियान के तहत इस मॉडल पर ध्यान देना चाहिए. काम की चीज साबित हो सकती है ये. वैसे भी हिंदुस्तान में कउवों की कमी नहीं है.


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