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नक्सली हमले में बीजेपी विधायक की मौत, 5 सुरक्षाकर्मी शहीद
भाजपा नेताओं का कांग्रेस पर सवाल है कि उसके नेता उसी इलाके में कैसे प्रचार कर पा रहे हैं...
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दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने बुलेटप्रूफ कार उड़ा दी, जिसमें BJP विधायक की मौत हो गई, 5 जवान शहीद
भाजपा नेता और विधायक भीमा मंडावी की नक्सली हमले में मौत हो गई. मंडावी के साथ उनके पांच PSO's यानी सुरक्षा अधिकारियों की भी मौत हो गई. ये हादसा उस समय हुआ, जब मंडावी बस्तर सीट पर भाजपा कैंडीडेट बैदूराम कश्यप के लिए प्रचार करके लौट रहे थे. वह दंतेवाड़ा शहर से 40 किलोमीटर नकुलनार से श्यामनगर के रास्ते में थे. यहां कुआकोंडा थाने की सीमा में श्यामागिरी पर्वत पड़ता है. इसी के पास नक्सलियों ने एक ताकतवर IED सड़क पर लगाया हुआ था. काफिले में तीन गाड़ियां थीं और IED ठीक मंडावी की गाड़ी के नीचे फटा. धमाके में गाड़ी पूरी तरह से नष्ट हो गई. धमाके के बाद काफिले पर फायरिंग भी हुई. मंडावी ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. शुरुआत में मंडावी के लापता होने की खबर थी, लेकिन एंटी नक्सल ऑपरेशन्स के डीआईजी पी सुंदर राज ने मंडावी की मौत की पुष्टि कर दी है. कौन थे मंडावी?
गदापाल के रहने वाले मंडावी संघ के बैकग्राउंड से आने वाले नेता थे. पहले पंचायत स्तर की राजनीति की. पंचायत सचिव रहे. जिस बस्तर में कांग्रेस का मतलब होता था महेंद्र कर्मा, उसी बस्तर में इन्होंने 2008 में कर्मा को विधानसभा चुनाव में हरा दिया था. 2013 में झीरम घाटी हादसे में कर्मा की मौत हो गई. इसके बाद दंतेवाड़ा सीट पर कर्मा की पत्नी देवती वर्मा ने चुनाव लड़ा. तब मंडावी हार गए. 2018 में फिर देवती के खिलाफ लड़े. बस्तर में झीरम हमले के बाद कांग्रेस के लिए सहानुभूति खत्म नहीं हुई है.
बावजूद इसके, मंडावी ने उन्हें तकरीबन 2200 वोट से हरा दिया. इस चुनाव को कवर करने दी लल्लनटॉप बस्तर गया था. वहां हमने देखा कि किस तरह राजनीतिक पार्टियों के नेता सुदूर इलाकों में जाने से बचते हैं. क्योंकि जान का खतरा है. तब भी मंडावी जीते. कारण - सौम्य स्वभाव. मिलनसार व्यक्तित्व. दूसरा फैक्टर - संगठन. संघ ने इनके लिए काफी काम किया था. इन्हें विधानसभा चुनाव में जितवाने के लिए एढ़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया था. वनवासी कल्याण आश्रम और सीधे संघ के लोग भी लगे हुए थे. तब जाकर पूरे बस्तर संभाग में भाजपा 12 में से एक सीट पर अपना खाता खोल पाई. मंडावी की जीत को एक और लेंस से देखना होगा. हमने बस्तर में लंबे समय से काम कर रहे पत्रकारों से बात की. उन्होंने हमें बताया कि नक्सली चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ रहते हैं. लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान नक्सलियों ने भाजपा को ज़्यादा टारगेट किया. क्योंकि केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार थी. विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा नेताओं के खिलाफ नामज़द कैंपेन चला. धमकियां जारी की गईं. ऐसे में मंडावी का जीतना एक पार्टी के जीतने से ज़्यादा की बात थी. कांग्रेस से सवाल?
कांग्रेस सवाल करती रही है कि रमन सिंह अपने तीन कार्यकालों में नक्सल समस्या का समाधान क्यों नहीं कर पाए. अब छत्तीसगढ़ में निज़ाम कांग्रेस का है. छत्तीसगढ़ में सुरक्षा व्यवस्था राज्य की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है. केंद्र की एजेंसियां उनकी मदद करने के लिए हैं. तो सारे सवालों के जवाब भूपेश बघेल को देने हैं. #पहला सवाल तो यही है कि मंडावी की मौत किसी सरप्राइज़ अटैक में नहीं हुई है. ये इलाका नक्सलियों के प्रभाव वाला है. ठीक इसी इलाके में कुछ वक्त पहले इसी तरह का एक और आईईडी ब्लास्ट हुआ था, जिसमें छह जवानों की मौत हो गई थी. इनमें छत्तीसगढ़ पुलिस के अधिकारी विवेक शुक्ला की मौत भी हो गई थी. तो सरकार को मालूम था कि इलाका खतरनाक है. #दूसरा सवाल नक्सल हमले के पैटर्न से आता है. ठंड खत्म होने के बाद से बारिश से पहले तक, माने अप्रैल से जुलाई तक नक्सली टेक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन चलाते हैं. इस वक्त जंगल के नाले सूखे रहते हैं और नक्सल मूवमेंट आसान रहता है. इसी दौरान सारे बड़े हमले होते हैं. 6 अप्रैल, 2010 को ताड़मेटला के नक्सल हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की हत्या इसी स्ट्रैटेजी के तहत हुई थी. तो नक्सल टार्गेट्स माने जाने वाले लोगों को अतिरिक्त सुरक्षा दी जानी चाहिए थी.
#तीसरी बात सबसे गंभीर है. स्थानीय भाजपा नेताओं की शिकायत है कि कांग्रेस नेता अंदरूनी इलाकों में अपेक्षाकृत आसानी से घुस पा रहे हैं. मिसाल के लिए कांग्रेस नेता विक्रम मंडावी. बीजापुर के कोर नक्सल एरिया में विक्रम मंडावी की एक सभा हुई थी. जगह का नाम तराला. इसमें 3000-4000 लोग जुटे. नक्सल इलाके में ये एक बहुत बड़ी सभा है. 30 मार्च, 2019 को विक्रम ने बीजापुर में ही एक और सभा की. इस बार कंगालूर में. इसमें भी लोग जुटे. तो दबी ज़बान में सवाल किया जा रहा है कि नक्सली कांग्रेस को लेकर सॉफ्ट क्यों हैं. आगे क्या होगा?
बस्तर में 11 अप्रैल को वोट पड़ने हैं. प्रचार थम चुका है. लेकिन वोटिंग के लिए कितने लोग निकलेंगे, इसे लेकर संशय पैदा हो गया है. खासकर अंदरूनी इलाकों में. नक्सली लगातार धमकियां देते रहे हैं. वोट दिया तो उंगली काट देंगे, जान ले लेंगे. अब एक भाजपा विधायक की हत्या हो गई है. जब कि उसके पास तीन गाड़ियां थीं, हथियारबंद जवान थे. तो लोगों में डर बैठेगा. डर का वाद ही आतंकवाद कहलाता है.
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