तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं. पॉपुलर कल्चर में ये लाइन्स फ़िल्म मसान ने दीं लेकिन इन्हें बहुत वक़्त पहले दुष्यंत कुमार ने लिखा था. एक ऐसा ही पुल देश में शुरू होने को है जिसपर से रेल गुज़रेगी और साथ ही जिसपर गाड़ियां भी चलेंगीं. आज आसान भाषा में इसी पुल के बार में बात होगी जो कि बना है असम में और जिसे नाम दिया गया है बोगीबील पुल.
ऐसा दिखता है बोगीबील पुल
- इस पुल की पूरी कहानी क्या है?
बोगीबील पुल 4.94 किलोमीटर लंबा पुल है जो कि एशिया का दूसरा और भारत का सबसे लंबा रेल-कम-रोड ब्रिज है. अभी तक केरल में बना वेम्बानाड पुल देश का सबसे लम्बा रेल का पुल था. अब ये रेल-कम-रोड ब्रिज का क्या मतलब होता है? माने, डबल-डेकर. यानी दो तल्ले का पुल होता है. एक तल्ले पर रेल बिछी होती है जिसपर ट्रेन चलती है और दूसरे पर रोड होती है जिसपर गाड़ियां चलती हैं. ये पुल असल में ब्रह्मपुत्र नदी पर बना है जो कि नदी के उत्तर तट को दक्षिण तट से जोड़ेगा.
ब्रह्मपुत्र नदी पर बना है ये पुल
- इस पुल के फायदे क्या-क्या हैं?
इस पुल से दो प्रदेशों, असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच आवाजाही आसान हो जाएगी. घंटों बचेंगे. मसलन अगर असम के तिनसुकिया से अरुणाचल प्रदेश के नाहरलगुन जाना होता था तो बीच में पड़ने वाली ब्रह्मपुत्र को पार करने के लिए जिस पुल का इस्तेमाल करना पड़ता था, वो तिनसुकिया से 450 किलोमीटर दूर गुवाहाटी में था. इस पुल के बनने से ये लगभग 10 घंटों का सफ़र नहीं करना पड़ेगा और दूरी और भी कम हो जाएगी. इसी तरह से दिल्ली से डिब्रूगढ जाने वाली ट्रेन का समय भी तीन घंटे बचने लगेगा.
असम-अरुणाचल के बीच यात्रा में घंटों की बचत होगीइसके साथ ही ये पुल सेना के काम भी आएगा. भारत के पूर्वोत्तर सीमा तक सेना को पहुंचने में इस पुल से काफ़ी मदद मिलेगी और अरुणाचल में किबिथू, वलॉन्ग और चगलगाम चौकियों तक सेना पहले की अपेक्षा जल्दी और आसानी से पहुंच जाएगी.
पूर्वोत्तर सीमा तक सेना को पहुंचने में मदद मिलेगी
ये पुल इंजीनियरिंग का एक शानदार नमूना है. सबसे पहले, इस बात की गारंटी दी गई है कि ये पुल अगले 120 सालों तक functional रहेगा. इसके साथ ही इस पुल में 125 मीटर लम्बे 39 गर्डर इस्तेमाल किये गये हैं. इसके साथ ही दो 33 मीटर के गर्डर इस्तेमाल किये गए हैं. इनकी आधारशिला पर रेलवे और सड़क के लिए बेस तैयार किया गया. रेलवे की पटरियां बिछाने के लिए स्टील और लोहे का सहारा लिया गया जबकि सड़क बिछाने के लिए कंक्रीट का बेस बनाया गया.
120 सालों तक पुल के टिकने की गारंटी हैइस पूरे दौरान जिस प्रकार की वेल्डिंग का इस्तेमाल किया गया वो भारत में पहली बार हुआ. इंजीनियरिंग की फ़ील्ड में वेल्डिंग के लिए अलग अलग रूल बुक्स हैं और ये जगहों और प्रोफेशन के हिसाब से बदलती रहती हैं. मसलन अमेरिकन सोसायटी ऑफ़ मेकेनिकल इंजिनियर्स वेल्डिंग के लिए अलग नियमों का इस्तेमाल करते हैं और अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टिट्यूट अलग नियमों को फॉलो करते हैं. ऐसे में इस पुल को बनाते वक़्त यूरोपियन वेल्डिंग स्टैंडर्ड्स को फॉलो किया गया है जो कि पहली बार हुआ है.
पहली बार यूरोपियन वेल्डिंग स्टैंडर्ड्स फॉलो किया गयाइसके अलावा इस पुल को बनाते वक़्त कंक्रीट को जगह तक पहुंचाना बहुत बड़ा मसला था. इसके लिए पाइप लाइंस का इस्तेमाल किया गया. इस पुल के ऊपर 3 लेन की सड़क और नीचे 2 रेलवे ट्रैक बनाए गए हैं. चूंकि यहां बारिश बहुत होती है, इसीलिए इस पुल की सड़कों में रबड़ की भी मिलावट की गई है. इसके रेलवे ट्रैक पर आमने सामने से आती दो ट्रेनें 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार दौड़ सकती हैं. अमूमन पुल पर जब ट्रेन गुज़रती है तो स्पीड काफ़ी कम कर दी जाती है. लेकिन ओस पुल पर ऐसा नहीं होगा. 42 खंभों पर टिका हुआ ये पुल 8.0 की तीव्रता से आए भूकंप को भी झेल सकता है.
आमने सामने से आती दो ट्रेनें 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार दौड़ सकती हैं
- इस पुल का राजनीतिक ऐंगल क्या है?
इस पुल को साल 1997 में शुरू कर दिया गया. तब प्रधानमंत्री HD देवेगौडा ने इसकी आधारशिला रखी थी. इसके बाद अप्रैल 2002 में वाजपेयी जी के कार्यकाल में इसका काम शुरू हुआ और आज 16 साल बाद 2018 में मोदी जी ने इसका उद्घाटन किया है. ये भी एक अच्छा इत्तेफ़ाक है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के दिन इस पुल का उद्घाटन हुआ.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुल का उद्घाटन कियाइस पुल के नाम का अभी तक औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है, चूंकि ये पुल असम के बोगीबील के पास बना है इसीलिए इसे सभी बोगीबील पुल कह रहे हैं.
Bogibeel Bridge