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एक हिंदू की हत्या का बदला लेना था, सो एक निर्दोष मुसलमान को मार दिया. हिसाब बराबर?

मारने वालों को बस एक मुसलमान की तलाश थी. ताकि उसे मारकर बदला ले सकें.

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किसी की हत्या हुई, गलत हुआ. बहुत गलत हुआ. मगर उसकी मौत के बदले किसी दूसरे बेगुनाह का कत्ल कर दिया जाए? बस इसलिए कि उसका धर्म और पहली हत्या करने वाले हत्यारों का धर्म एक ही है? हम आगे की तरफ नहीं जा रहे. उल्टें पांव बर्बर असभ्य हो रहे हैं?
कुछ खबरें जानकारी नहीं देतीं, डराती हैं. उनमें किसी बेगुनाह के बेवक्त मरने की उदासी होती है. मरने वाले की जाति-धर्म देखे बिना अगर आपको उसको लिए तकलीफ हो, तो समझिए अंदर का इंसान बचा है. और इस खौफनाक दौर में इंसान बचे रहना शायद इकलौता सुकून है. ये जो डरावना वाकया आप पढ़ रहे हैं, वो मंगलुरु में हुआ. एक हिंदू की हत्या का बदला लेने के लिए एक मुसलमान का कत्ल कर दिया गया. मरने वाले की गलती ये थी कि वो मुसलमान था. बस. बस इतनी ही गलती थी उसकी.
किसी को बस इसलिए मार दिया जाए कि वो मुसलमान है? इतनी गई-गुजरी सोच के लोग हमारे बीच जीते हैं ये शर्मनाक है.
किसी को बस इसलिए मार दिया जाए कि वो मुसलमान है? इतनी गई-गुजरी सोच के लोग हमारे बीच जीते हैं ये शर्मनाक है.

'बदला लेने के लिए किसी मुसलमान को मारना था, मार दिया' 3 जनवरी को मंगलुरु में दीपक राव नाम के एक बजरंग दल के कार्यकर्ता की बड़ी बेदर्दी से हत्या कर दी गई. दिनदहाड़े. मारने वाले चारों युवक मुसलमान थे. चार हिंदू लड़कों का खून खौला. चारों ने दीपक राव की हत्या का बदला लेने की ठानी. दीपक के खून के बदले किसी मुसलमान का खून बहाकर. शिकार बने 47 साल के अहमद बशीर. अहमद ने दीपक का कत्ल नहीं किया था. अहमद या उसके परिवार का दीपक की हत्या से कोई लेना-देना नहीं है. मगर फिर भी चारों लड़कों ने मिलकर अहमद को कत्ल कर दिया. ये पूरी वारदात सीसीटीवी कैमरा में दर्ज हो गई. हत्यारों की उम्र जानना चाहेंगे? एक 25 साल का श्रीजीत पीके, एक 22 साल का धनुष पुजारी और उसका 21 साल का भाई किशन पुजारी. इनके साथ था 22 साल का एक नौजवान संदेश कोटयान. चारों पकड़े गए. पुलिस के मुताबिक, चारों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है. पुलिस ने पूछा क्यों मारा, तो उन्होंने कहा:
दीवक राव की हत्या का बदला लेने के लिए किसी मुसलमान को मारना था. मार दिया.
यूं ही. बस यूं ही. ऐसे जैसे अक्कड़-बक्कड़ का खेल हो. मारने वालों ने एक मुसलमान खोजा और अहमद उनके हाथ आ गए. कोई और बेगुनाह मुसलमान भी हाथ आया होता, तो उसका ये ही हश्र हुआ होता. पुलिस इन चारों को RSS का कार्यकर्ता बता रही है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने अहमद के एक पुराने दोस्त से बात की. प्रभाकर नाम है उस दोस्त का. हिंदू है. उसके मुताबिक, अहमद ने एक बार उसकी जान बचाई थी. दोनों तब सऊदी अरब में काम करते थे. कुछ मुसलमानों ने प्रभाकर को घेर लिया था. उन्हें मारने की मंशा से. उस समय बशीर आगे आए और कहा:
प्रभाकर हमारा आदमी है. उसे हाथ लगाने की हिम्मत मत करना. 
दीपक राव बजरंग दल के कार्यकर्ता थे. चार मुसलमान युवकों ने 3 जनवरी को उनकी हत्या कर दी. इसके बाद से ही मंगलुरु में माहौल काफी तनावपूर्ण बना हुआ है.
दीपक राव बजरंग दल के कार्यकर्ता थे. चार मुसलमान युवकों ने 3 जनवरी को उनकी हत्या कर दी. इसके बाद से ही मंगलुरु में माहौल काफी तनावपूर्ण बना हुआ है.

सरकार का काम तो बस मुआवजा बांटना होता है? अहमद को बचाने की काफी कोशिश की गई. मगर जख्म इतना गहरा था कि वो बच नहीं सके. उनकी हत्या के बाद जानने वाले उनको याद कर रहे हैं. उनके लिए अहमद बशीर उस शख्स का नाम है जो दिल खोलकर लोगों से मिलता था. दोस्ती में धर्म और जाति नहीं देखता था. मदद मांगने आए शख्स को खाली हाथ नहीं लौटाता था. मरने वाला तो मर चुका, उसका जिक्र रह गया है. इस सबके बीच सरकार क्या करती? उसने मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा देकर अपना पारंपरिक कर्तव्य पूरा कर लिया है. कर्नाटक में पिछले कुछ समय से लगातार इस तरह की घटनाएं हो रही हैं. हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों के बीच जोर आजमाइश चल रही है. लेकिन सरकार को क्या? सरकारों का काम बस मुआवजा बांटना ही होता है न! कानून-व्यवस्था नाम की चीजें तो बस उस किताब में लिखी बातें हैं जिसका नाम 'संविधान' है!


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