पश्चिम बंगाल सरकार को कलकत्ता हाई कोर्ट से झाड़ पड़ी है. बेवजह मुसलमानों को खुश करने की कोशिश के लिए! ममता सरकार ने दुर्गा पूजा के बाद मूर्तियों के विसर्जन के लिए एक टाइम लिमिट तय किया था. लेकिन कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया. डांट पिलाई, सो अलग. सरकार से कहा कि आप अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए ये कर रहे थे. बात ये है कि दशहरा है मंगलवार को. दुर्गा पूजा के बाद मूर्तियों का विसर्जन होता है, लेकिन मंगलवार को विसर्जन नहीं किया जा सकता. इसलिए ये बुधवार को होना था. इसी दिन मुहर्रम भी है, जिस दिन मुसलमान जुलूस निकालकर मोहम्मद साहब के नवासे हुसैन की शहादत का मातम मनाते हैं. तारीखें भिड़ रही थीं. इसलिए सरकार ने मूर्ति विसर्जन की टाइम लिमिट तय कर दी.
सरकार ने कोर्ट के सामने सफाई दी कि दोनों धार्मिक त्योहारों के साथ होने पर 'लॉ एंड ऑर्डर' का खतरा पैदा हो सकता था. इसलिए ये फैसला लिया. कोर्ट ने कहा कि सरकार ने मौखिक आदेश देकर गुपचुप तरीके से काम किया और इसे कागजों पर अंकित नहीं करवाया. जस्टिस दिपांकर दत्ता ने ये भी कहा कि वैसे भी जुलूस मुहर्रम का अभिन्न हिस्सा नहीं है.
उन्होंने कहा कि विजय दशमी के बाद विसर्जन हिंदुओं के लिए ऐसा रिवाज है, कि इसे प्रदेश सरकार की सनक के आधार पर नहीं बदला जा सकता. 30 अगस्त को ममता ने मौखिक आदेश में कहा था कि मूर्तियों का विसर्जन 11 अक्टूबर को सिर्फ शाम 4 बजे तक होगा. तीन लोगों ने इसके खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में अर्जी डाली थी. अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण पश्चिम बंगाल में एक स्थायी राग बना हुआ है. इससे पहले 34 साल तक जब वाम मोर्चे की सरकार थी, इस तरह के छिटपुट आरोप लगे थे. लेकिन ममता बनर्जी के खिलाफ ये आरोप ज्यादा जोर-शोर से लगाए गए हैं. वे प्रकट तौर पर मुसलमानों को रिझाने में ज्यादा नजर आती हैं. कोलकाता के एक बड़े ट्रैफिक जंक्शन पर उनका होर्डिंग देखा जा सकता है, जिसमें वो हिजाब पहनकर नमाज पढ़ती दिख रही हैं. ममता की मुस्लिम इलाकों में होने वाली रैलियां जब 'अल्लाह हो अकबर' जैसे नारों के साथ खत्म होती हैं, तो कई हिंदू परिवार नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं. ममता के सरकार में आने के बाद धर्म और राजनीति के घालमेल का प्रकटीकरण बढ़ा हुआ ही लगता है.
ममता का मुस्लिम प्रेम प्रदेश में उनकी जनसंख्या की वजह से ही है. प्रदेश की आबादी में उनकी हिस्सेदारी 30 परसेंट है, जबकि हिंदू वोट बंटा हुआ है. अगर 30 परसेंट वोटों पर पकड़ पक्की हो जाए तो लंबी राजनीतिक पारी तय मानिए. जब वाम मोर्चे की मुसलमानों पर पकड़ कमजोर हुई, तभी से ममता ने मुसलमानों को बड़े पैमाने पर अपनी पार्टी में शामिल करना शुरू कर दिया था.
इसीलिए बीजेपी ने बीते लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी सरकार पर आतंकियों को शह देने के आरोप लगाए. बर्दवान धमाकों से इन आरोपों को बल मिला. लेकिन ज्यादा बुरी बात ये है कि तमाम तुष्टिकरण के बावजूद पश्चिम बंगाल के मुसलमान बेहद खराब हालत में रहते हैं. अमर्त्य सेन की रिपोर्ट के मुताबिक, बाकी प्रदेशों के मुकाबले पश्चिम बंगाल में मुसलमान आर्थिक तौर पर ज्यादा बुरी हालत में हैं.