संविधान का अनुच्छेद 164 (4) कहता है कि किसी भी सदन का सदस्य हुए बिना व्यक्ति 6 महीने से ज़्यादा राज्य में किसी भी मंत्री पद पर नहीं रह सकता. उद्धव ने 28 नवंबर,-2019 को सीएम पद की शपथ ली थी. 28 मई को छह महीने पूरे हो रहे हैं. तब तक किसी सदन के सदस्य नहीं बने, तो मुख्यमंत्री पद जा सकता है.

उद्धव ठाकरे नवंबर-2019 में महाराष्ट्र के सीएम बने थे. अब छह महीने होने को हैं और वो अब तक किसी सदन के सदस्य नहीं बन सके हैं. (फोटो- Mandar Deodhar for India Today)
उद्धव की क्या प्लानिंग थी?
उद्धव ने विधानसभा चुनाव तो लड़ा ही नहीं था. लेकिन अब महाराष्ट्र के विधान परिषद के नौ सदस्यों का कार्यकाल 24 अप्रैल को खत्म हो रहा है. इन्हीं में से एक सीट पर उद्धव ने चुनाव लड़ने की सोच रखी थी. लेकिन उनके लिए दिक्कत तब हो गई, जब कोरोना वायरस के चलते चुनाव अनिश्चितकाल तक के लिए टल गए. इसी के साथ उद्धव का विधान परिषद सदस्य बनना भी अनिश्चितकाल के लिए टल गया. आगे क्या विकल्प हैं?
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं –
“उद्धव ठाकरे के पास दो विकल्प हैं.सुभाष कश्यप साफ कर देते हैं कि इन दोनों में से कोई भी तरीका नैतिकता के लिहाज से सही नहीं है. फिर भी कम अनैतिक तरीका पहला वाला ही है.
1- राज्यपाल कोटे से उनके नाम की सिफारिश कर दी जाए और वो विधान परिषद के सदस्य बन जाएं.
2- 28 मई को छह महीने पूरे होते ही उद्धव इस्तीफा दे दें. एक-दो दिन के भीतर ही राज्यपाल की सहमति से दोबारा मुख्यमंत्री चुन लिए जाएं. इस तरह उन्हें फिर छह महीने का वक्त मिल जाएगा.”
और एक बात. इन दोनों विकल्पों में एक बात डिसाइडिंग फैक्टर रहेगी कि राज्यपाल क्या चाहते हैं? उनका स्व-विवेक क्या कहता है? अब राज्यपाल की तरफ से कोई जवाब न मिलता देख उद्धव ने पीएम से मदद मांगी है. पीएम की तरफ से कितनी मदद मिलती है, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
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