फिर हमने पूरी बात पता की. अब आपसे बांट रहे हैं
10 जुलाई को अमरनाथ यात्रियों को ले जा रही बस पर अनंतनाग के पास आतंकी हमला हो गया. सात लोगों की जान चली गई. इसके बाद जब तक 11 जुलाई का सूरज निकलता तब तक कुछ आतंकवादियों की करतूत का हिसाब कई लोग देश के मुसलमानों से मांगने लगे. फेसबुक पर भी, और कुछ मामलों में, दहलीज़ पर जाकर
भी. कश्मीर के मुसलमानों पर डबल गाज गिरी. उन्हें गद्दार और न जाने क्या-क्या कह दिया गया. राजनाथ सिंह ने देश के गृहमंत्री की हैसियत से उनका बचाव किया तो उन्हें ट्रोल कर दिया गया. विशुद्ध बेवकूफी चल रही थी.
तो हमने सोचा, उम्मीद का दीया जलाया जाए
फिर आया दिन 13 जुलाई का. हमें याद आया कि इसी दिन पिछले साल अमरनाथ यात्रियों की एक बस का अनंतनाग में एक्सीडेंट हो गया था. तब कश्मीर में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद शुरू हुई हिंसा में 34 लोगों की जान जा चुकी थी. एहतियातन कर्फ्यू लगा था. लेकिन बस एक्सीडेंट की बात सुनकर लोग कर्फ्यू तोड़कर घरों से निकले और लोगों की मदद की. हमें लगा कि इस वाकये को जानकर लोगों के मन में नफरत कुछ कम होगी, वो चीज़ो को कुछ अलग नज़र से देखेंगे, कश्मीरियत के मायने समझेंगे.
तो हमने वो खबर अपने फेसबुक पेज पर शेयर कीः
इस खबर में घटना का पूरा ब्योरा था. असल तस्वीरें आई नहीं थीं, तो हमने समय रहते पाठकों तक खबर पहुंचाने के लिए एक सांकेतिक तस्वीर इस्तेमाल की. मकसद था कि खबर को एक बार देख-भर लेने से हमारे दोस्त जान जाएं कि खबर एक बस हादसे के बारे में है. यही फेसबुक पेज पर बने खबर के थंबनेल पर नज़र आ रही है.
इस खबर के पोस्ट होने पर सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने हल्ला मचाना शुरू किया कि लल्लनटॉप को एक्सपोज़ कर दिया हैः

जिस तरह से ट्वीट किया गया था, उस से ऐसा लग रहा था कि 'दी लल्नटॉप' ने जानबूझ कर एक खबर की तस्वीर दूसरे में इस्तेमाल की है. कुछ ट्वीट्स में दावा किया गया कि हम इस्लामिस्ट प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए ऐसा कर रहे हैं और हम आदतन मुसलमानों को अच्छा दिखाने की कोशिश करते हैं. बाकी लोगों ने वही सब बोला जो हमारे फेसबुक पेज पर कमेंट्स में दिखता रहता है.
असल बात क्या है?
ये बात सही है कि अमरनाथ यात्रा वाली खबर में इस्तेमाल की गई तस्वीर असल में साल 2011 में तिरुवरूर के पास हुई दुर्घटना की थी, जिसमें पांच लोगों की मौत हो गई थी. लेकिन पूरी खबर में ये दावा कहीं नहीं किया गया था कि तस्वीर अमरनाथ यात्रा की ही है. इसके अलावा घटना का पूरा ब्योरा वही था, जो देश के तमाम ज़िम्मेदार मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट किया थाःद हिंदू

इंडियन एक्सप्रेस

हिंदुस्तान टाइम्स

नवभारत टाइम्स

आखिरी तीन स्क्रीनशॉट में भी सांकेतिक फोटो का इस्तेमाल किया गया है. जैसा कि हम कह चुके हैं, ये सिर्फ पाठकों को एक आइडिया देने के लिए होता है. ये एक सामान्य प्रक्रिया है.
जैसे-जैसे तस्वीरें आईं, मीडिया संस्थान अपनी खबरों में उन्हें लगाने लगेः

'दी लल्लनटॉप' ने अपनी ओर से घटना के ब्योरे में कोई घटा-जोड़ नहीं किया था. कश्मीरी लोगों ने इंसानियत की मिसाल कायम की थी, तो वही लिखा. हमारी गलती ये रही कि हमने तस्वीर के कैप्शन में 'सांकेतिक इस्तेमाल' नहीं लिखा था. हमें इसका अहसास है और भूल का अंदाज़ा होते ही हमने वहां कैप्शन लगा दिया था. अब हमारे थंबनेल को क्लिक करने पर खबर कुछ ऐसी दिखती हैः

लाल चौकोर में जो दिख रहा है वो कैप्शन है.
'दी लल्लनटॉप' पर हम आप तक वही कहानियां लेकर आते हैं जिनमें हम यकीन करते हैं. हर खबर पूरी तस्दीक के बाद ही प्रकाशित की जाती है. इसीलिए हमने फेसबुक पोस्ट डिलीट नहीं की. लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि हमसे गलतियां नहीं होतीं. खूब होती हैं. और उनमें से कई हम आपके सहयोग से ही सुधार पाते हैं. इसलिए आपकी राय हमारे लिए बहुत मायने रखती है.
हमारी बस एक गुज़ारिश है. हम गलती मानेंगें काहे कि काम करने वाले से गलती होती ही है, और उसको मान लेने से कोई छोटा नहीं होता. तो हम गलती बताने पर कट्टी नहीं होंगे. उलटा आपका ऐतराज़ भी सर-आंखों पर रखेंगे. लेकिन ये तभी हो पाएगा, जब आपकी शिकायत तर्क की ठोस ज़मीन पर खड़ी होगी.
अगर आप 'दी लल्लनटॉप' प्रकाशित किसी खबर पर कोई फीडबैक देना चाहते हों, तो हमें lallantopmail@gmail.com पर मेल ठेल दें.






















