
पुलिस के मुताबिक, इसी मंदिर के अंदर बच्ची को अगवा करके रखा गया. बच्ची 10 जनवरी, 2018 को अगवा की गई. 17 जनवरी को उसकी लाश मिली (फोटो: रॉयटर्स)
बच्ची को गांजा दिया गया, नींद की खूब सारी गोलियां भी खिलाईं ये फॉरेंसिक जानकारों की थिअरी है. कि बच्ची को गांजा-भांग दिया गया था. साथ में, ऐपिट्रिल (0.5 mg) टैबलेट्स भी दी गई थीं. ये नींद की दवा है. बच्ची को इसका ओवरडोज दिया गया था. और इसी टैबलेट की वजह से शायद वो कोमा में चली गई थी. अगर ये टैबलेट गांजे के साथ दिया जाए, तब क्या असर होता है? पुलिस ने इसका पता लगाने की भी कोशिश की. लेकिन डॉक्टर फिलहाल इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए हैं.

ये प्रवेश कुमार है. कठुआ गैंगरेप और मर्डर केस में जो आठ आरोपी हैं, उनमें से एक. ये तब की तस्वीर है, जब पुलिस उसे पठानकेट डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशन्स कोर्ट में पेश करने ले जा रही थी (फोटो: रॉयटर्स)
इस टैबलेट के ओवरडोज़ से क्या-क्या हो सकता है? जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच कठुआ गैंगरेप और मर्डर केस की तफ्तीश कर रही है. पुलिस ने जून में बच्ची का विसरा सैंपल फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा था. ये पता लगाने के लिए गांजा (जिसे यहां मन्नार कहा जाता है) और ऐपिट्रिल का उस बच्ची के शरीर पर क्या असर हुआ होगा? पुलिस ने फॉरेंसिक विशेषज्ञों को ये पता लगाने को भी कहा था कि अगर एक आठ साल की बच्ची को खाली पेट ये टैबलेट दी जाए, तो इसका उसके शरीर पर क्या असर पड़ता है. ऐपिट्रिल नाम के इस टैबलेट में क्लोनाजेपाम नाम का सॉल्ट होता है. ये दवा देने में काफी एहतियात बरतनी होती है. इसे डॉक्टर के कहने पर और उसकी निगरानी में ही मरीज को दिया जाता है. मरीज की उम्र, उसकी शारीरिक स्थिति, वजन जैसी चीजें देखकर डॉक्टर तय करता है कि मरीज को दवा की कितनी खुराक दी जानी चाहिए. डॉक्टरों का कहना है-
बच्ची का वजन 30 किलो था. ऐसे में अगर उसे ये दवा दी जाती, तो 0.1 से 0.2 mg की दवा दी जाती. वो भी दिन में तीन बार करके. मतलब, इतने mg को तीन खुराक में बांटकर दिया जाता. 11 जनवरी को आरोपियों ने बच्ची को 0.5 mg डोज़ वाली पांच टैबलेट्स खिलाईं. एक दिन के अंदर-अंदर. ये ओवरडोज़ है. इसके बाद उसे और टैबलेट्स दिए गए. इस दवा के ओवरडोज़ की वजह से इंसान को नींद आ सकती है. उलझन हो सकती है. उसके दिमाग का संतुलन बिगड़ सकता है. उसकी सांस धीमी या फिर बंद हो सकती है. वो कोमा में जा सकता है. और इससे उसकी मौत तक हो सकती है.

ये दीपक खजूरिया है. स्पेशल पुलिस ऑफिसर. ये भी कठुआ केस के आठ आरोपियों में शामिल है (फोटो: रॉयटर्स)
फिलहाल अदालतों में गर्मी की छुट्टियां चल रही हैं अब पुलिस के पास ये जवाब है. जो शायद साफ करता है कि बच्ची की आवाज मंदिर से बाहर कभी क्यों नहीं सुनाई दी. मेडिकल एक्सपर्ट्स की ये राय जिला एवं सेशन्स कोर्ट, पठानकोट के सामने पेश की जाएगी. इस केस की सुनवाई यहीं हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने इस केस की सुनवाई जम्मू के पठानकोट शिफ्ट करने का आदेश दिया था. फिलहाल कोर्ट बंद हैं. गर्मी की छुट्टियां हैं. अगले हफ्ते ये छुट्टियां खत्म होने वाली हैं.

कठुआ केस के आरोपियों का बचाव करने वालों की जमात इस सवाल पर जोर दे रही थी. कि अगर पुलिस की बात सही है और मंदिर के अंदर रखकर इतने दिनों तक बच्ची का गैंगरेप किया गया, तो फिर कभी किसी को ये बात मालूम क्यों नहीं हुई. क्यों किसी ने उसकी आवाज नहीं सुनी? क्यों बच्ची मदद के लिए नहीं चिल्लाई? इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए पुलिस ने मेडिकल विशेषज्ञों की मदद ली (फोटो: रॉयटर्स)
10 जनवरी को बच्ची अगवा हुई, 17 जनवरी को उसकी लाश मिली बच्ची बकरवालों की थी. बकरवाल चरवाहे होते हैं. गर्मियां शुरू होते ही भेड़-बकरियां लेकर चारागाहों की तलाश में ऊपर पहाड़ पर चले जाते हैं. फिर सर्दियों में घर लौट आते हैं. धर्म देखिए, तो ये मुसलमान होते हैं. 10 जनवरी को बच्ची अगवा की गई थी. 17 जनवरी को उसकी लाश मिली. पुलिस का कहना है कि इस अपराध के पीछे इसी गांव में रहने वाले सांजी राम, उसके भतीजे, बेटे और कुछ और लोगों का हाथ है. शुरुआत में इस केस पर ज्यादा बातें नहीं हो रही थीं. ये मामला देश-विदेश के लोगों और मीडिया के फोकस पर तब आया, जब कठुआ केस के आरोपियों के बचाव में तिरंगा रैली निकली. और जब वकीलों ने पुलिसवालों को चार्जशीट दाखिल नहीं करने दिया.
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