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कासगंज: 5 किलोमीटर भर के शहर में पुलिस हिंसा नहीं रोक पा रही, वजह क्या है?

PAC और RAF की टुकड़ी और सैकड़ों पुलिसवालों की मौजूदगी के बावजूद कासगंज रह-रहकर सुलग रहा है.

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मृतक चंदन (बाएं), पथराव करते लोग (दाएं ऊपर) और कासगंज में जलती बस.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले कासगंज में 26 जनवरी को हुई सांप्रदायिक हिंसा दो दिन बाद भी थमी नहीं है. गणतंत्र दिवस पर विश्व हिंदू परिषद और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की तिरंगा यात्रा में हुए इस विवाद में चंदन गुप्ता नाम के एक लड़के की मौत हो गई, जबकि नौशाद नाम का लड़का घायल हो गया. अभी यहां धारा 144 लागू कर दी गई है, लेकिन PAC और RAF की एक-एक टुकड़ी और सैकड़ों पुलिसवालों की मौजूदगी के बावजूद कासगंज रह-रहकर सुलग रहा है.

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कर्फ्यू के बाद कासगंज
कर्फ्यू के बाद कासगंज

कासगंज हिंसा का सबसे बुरा पहलू ये है कि लोगों को इसके बारे में सटीक जानकारी नहीं मिल रही है. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में झगड़े की अलग-अलग वजहें बताई गई हैं. ऐसे में सोशल मीडिया पर भड़के हुए लोग इसकी दादरी और अलवर हत्याकांड से तुलना कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया ऐसी है, जैसे चंदन की मौत से ज़्यादा दुखद ये हो कि सभी मुस्लिमों को एक सुर में कोसा क्यों नहीं जा रहा.


फेसबुक पर लोगों के रिएक्शंस की एक बानगी
फेसबुक पर लोगों के रिएक्शंस की एक बानगी

26 जनवरी की सुबह कासगंज में हुआ क्या था

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कासगंज में ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे इंडिया टुडे के रिपोर्टर मुनीष के मुताबिक 26 जनवरी की सुबह करीब 10 बजे ABVP और VHP कार्यकर्ता तिरंगा रैली निकाल रहे थे. कासगंज में हिंदू और मुस्लिम लगभग बराबर की तादाद में हैं, लेकिन दोनों के इलाके बंटे हुए हैं. तो जब रैली मुस्लिम बहुल इलाके बलीराम गेट पर पहुंची, तो रैली निकाल रहे लड़कों ने नारेबाजी ज़ोर कर दी. स्थानीय लोगों के मुताबिक ऐसे नारे भी लगाए गए कि 'हिंदुस्तान में रहना है, तो वंदे मातरम कहना है.'

रैली निकाल रहे लड़कों ने कुछ मुस्लिमों के चेहरे और कान के पास जाकर भी ज़ोर से नारे लगाए. ऐसे में वहां के हालात खराब हो गए और मोहल्ले को लोगों ने पथराव शुरू कर दिया. जो लोग घरों के भीतर थे, वो छतों से पथराव कर रहे थे. इसी बीच किसी ने फायर कर दिया. जिसकी ज़द में 20 साल का लड़का चंदन गुप्ता आ गया.


कासगंज में हिंसा भड़कने के बाद पथराव करते युवक
कासगंज में हिंसा भड़कने के बाद पथराव करते युवक

पथराव भी हुआ. इस पथराव में नौशाद नाम का एक लड़का भी घायल हुआ, जो अभी हॉस्पिटल में है. चंदन की मौत की खबर फैलने के बाद कासगंज के अलग-अलग इलाकों में पथराव और आगजनी शुरू हो गई. हालात कंट्रोल से बाहर होते देख पुलिस ने कर्फ्यू लगा दिया.

27 जनवरी तक किसी का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ था

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इंडिया टुडे के रिपोर्टर मुनीष के मुताबिक 27 तारीख को कासगंज में PAC और RAF की एक-एक टुकड़ी तैनात कर दी गई और ढेर सारे पुलिसवाले गश्त लगाते रहे. कासगंज में अब तक चार बसें, तीन कारें और पांच दुकानें जलाई जा चुकी हैं. सात कारों को तोड़ा-फोड़ा गया है. आगजनी करने वाले लोग पुलिस के साथ लुका-छिपी खेल रहे हैं, जिससे पुलिस की क्षमता और मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं. 27 जनवरी की शाम तक कासगंज से कर्फ्यू हटा लिया गया और धारा 144 लागू कर दी गई.


कासगंज में जलती बस
कासगंज में जलती बस

28 जनवरी को भी हालात नहीं बदले

28 जनवरी की सुबह भी कासगंज सुलग ही रहा था. इस दिन सुबह 8 बजे एक दुकान में आग लगा दी गई. मुनीष बताते हैं कि कासगंज का शहरी इलाका 4-5 किलोमीटर में ही खत्म हो जाता है. इतना छोटा इलाका और इतने पुलिसबल होने के बाद भी हालात काबू में नहीं आ रहे हैं. यहां तक कि पुलिस चौकी से आधे-आधे किलोमीटर की दूरी पर आगजनी हो रही है. पुलिस अब तक कुल 50 लोगों को अरेस्ट कर चुकी है. इनमें से चार वो हैं, जिनके नाम चंदन के पिता ने पुलिस को बताए थे. 6 वो हैं, जिन पर 26 जनवरी के विवाद में शामिल होने का आरोप है और 40 लोग लॉ ऐंड ऑर्डर खराब करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं.


बवाल करने वाले को पकड़कर ले जाती पुलिस
बवाल करने वाले को पकड़कर ले जाती पुलिस

झगड़ा क्यों हुआ?

आईजीपी ध्रुवकांत ठाकुर और स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कासगंज में दोनों ही पक्षों के पास तिरंगा था, लेकिन विवाद रास्ते से निकलने को लेकर हुआ था. रिपोर्ट के मुताबिक गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने के लिए मुस्लिमों ने बद्दू नगर में एक रास्ते पर कुर्सियां रखी थीं. तिरंगा रैली में शामिल लड़कों ने उनसे वो कुर्सियां हटाने के लिए कहा, जिस पर उनसे झंडा फहराने जाने तक इंतज़ार करने के लिए कहा गया और इसी बात पर दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट

बीबीसी की रिपोर्ट में साफ नहीं वजह

कासगंज पर बीबीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि कासगंज में कुछ युवक बाइक पर तिरंगा रैली निकाल रहे थे, जिनकी बद्दू नगर इलाके में किसी बात पर मुस्लिमों से झड़प हो गई. कुछ ही देर बार ये भीषण हिंसा में तब्दील हो गई. अभी कासगंज किसी छावनी जैसा नज़र आ रहा है, जहां बार-बार हिंसा भड़क रही है और तनाव बना हुआ है.

आग में घी डाल रहा सोशल मीडिया


ये कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया ने कासगंज हिंसा को और बुरा बना दिया. अलग-अलग रिपोर्ट्स और पोस्ट्स में कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. जो पूरी तरह से भड़काऊ और अपुष्ट हैं.

कासगंज पर एक रिपोर्ट
कासगंज पर एक रिपोर्ट

पुलिस ऐसे दावों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही है और न ही स्थानीय लोग इसकी पुष्टि कर रहे हैं.


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कासगंज हिंसा पर एक अन्य रिपोर्ट

तो पुलिस कह क्या रही है

पुलिस ने ये तो पहले ही साफ कर दिया है कि ये तिरंगा रैली प्रशासन की इजाज़त के बगैर निकाली जा रही थी. एसपी सुनील कुमार सिंह ने इंडिया टुडे के मुनीष से राजनीतिक साजिश की आशंका की बात कही. सुनील कुमार ने कहा, 'इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे राजनीतिक साजिश हो सकती है.' अभी कासगंज में ड्रोन से निगरानी की जा रही है.


कासगंज में ड्रोन से निगरानी करती पुलिस
कासगंज में ड्रोन से निगरानी करती पुलिस

एडीजी अजय आनंद ने बीबीसी को बताया कि इस पूरे मामले में अब तक दो FIR दर्ज की गई हैं और इन्हीं के आधार पर 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. एक FIR चंदन गुप्ता की मौत पर हुई है, जिसमें पुलिस ने हत्या के आरोपी को गिरफ्तार किया है, लेकिन अभी तक उसका नाम ज़ाहिर नहीं किया है. हिंसा रोकने में पुलिस की विफलता पर अजय ने बीबीसी से कहा, 'देखिए हर व्यक्ति पर तो निगरानी नहीं रखी जा सकती है, लेकिन प्रशासन मुस्तैद है. हिंसा के दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी.'

पर सियासत में कोई कमी नहीं है

कासगंज में इतना संवेदनशील माहौल होने के बावजूद नेताओं की छिछली बयानबाजी में कोई कमी नहीं है. हिंसा भड़कने के बाद कासगंज पहुंचे एटा के सांसद राजवीर सिंह ने कहा,


'जितना आक्रोश कासगंज में आज है, मैंने कभी नहीं देखा है. इस घटना में हमारे लोगों की कहीं कोई कमी नहीं है. ये झगड़ा योजनाबद्ध तरीके से किया गया है, जिसमें से हमारा एक आदमी स्वर्गवासी हो गया. मैंने मालूम कर लिया है, चंदन हमारा लड़का स्वर्गवासी हो गया है. इस घटना की जांच हम यहां के किसी भी अधिकारी से नहीं कराएंगे. उन्हें हम अपनी तरह से डील करेंगे.'

कासगंज में भड़के हुए लोगों को संबोधित करते सांसद राजवीर सिंह
कासगंज में भड़के हुए लोगों को संबोधित करते सांसद राजवीर सिंह

उधर विश्व हिंदू परिषद के स्टेट सेक्रेटरी नेता नरेंद्र तोमर ने बयान दिया है, 'अगर वो एक मारें, तो तुम 10 मारो. जो करना चाहते हो, करो. पुलिस नौकर है. वो हमारे इशारे पर काम करेगी.' इन्हीं नरेंद्र तोमर ने 26 जनवरी को ही एक सभा में बयान दिया था, 'अरे उनके यहां लड़कियां ज़्यादा हैं. हमारे तो लड़के बैठे हैं तैयार. सब अपने में खपा लेंगे. जिस दिन तुम्हारे लट्ठ में जान पैदा हो गई, उस दिन ये हिंदू शरणम गच्छामि होने में देर नहीं लगाएंगे. वो आपकी एक लेकर जाएं, तो तुम उनकी 10 लाने की तैयारी रखो.'


नरेंद्र तोमर
नरेंद्र तोमर

नरेंद्र तोमर का बयान सुनने के लिए यहां क्लिक करें

अपने विवादित बोलों के लिए चर्चा में रहने वाली साध्वी प्राची भी 27 जनवरी को चंदन के परिवार से मिलने कासगंज जा रही थीं. लेकिन पुलिस ने तनाव के चलते उन्हें सिकंदराराऊ में ही रोक लिया. वहां साध्वी और पुलिस के बीच बहस हुई, जिसके बाद वो चौराहे पर धरने पर बैठ गईं. करीब घंटेभर के हंगामे के बाद साध्वी प्राची दिल्ली वापस लौट गईं.


चौराहे पर धरने पर बैठीं साध्वी प्राची
चौराहे पर धरने पर बैठीं साध्वी प्राची

आप खुद सोचिए कि जिन्हें आप वोट देते हैं या अपना रहनुमा मानते हैं, वो आपकी रोजमर्रा की ज़िंदगी के साथ कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं.

चंदन के परिवार का क्या रिएक्शन है

26 जनवरी को परिवार ने चंदन का अंतिम संस्कार तब तक नहीं किया, जब तक उनकी स्थानीय नेताओं से बातचीत नहीं हो गई. बंद कमरे में हुई इस बातचीत के बाद बताया जा रहा है कि परिवार ने 50 लाख रुपए मुआवजे और एक बेटे को सरकारी नौकरी का आश्वासन मिलने के बाद चंदन का अंतिम संस्कार किया.


मरने वाला चंदन गुप्ता
मरने वाला चंदन गुप्ता

प्राइवेट हॉस्पिटल में कंपाउंडर चंदन के पिता सुशील गुप्ता ने कहा कि अगर हिंदुस्तान ज़िंदाबाद बोलना अपराध है, तो उन्हें भी गोली मार दी जाए. वहीं चंदन की मां संगीता गुप्ता ने कहा कि उनके बेटे की मौत वंदे मातरम कहते हुए हुई है, इसलिए उसे शहीद का दर्जा दिया जाना चाहिए.


अपने माता-पिता के साथ चंदन
अपने माता-पिता के साथ चंदन

क्या कासगंज की फितरत ही यही है?


कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि कासगंज संवेदनशील इलाका है, जहां पहले भी कई बार ऐसी सांप्रदायिक हिंसा हो चुकी हैं. लेकिन इंडिया टुडे के मुनीष एक दूसरी सूरत बयां करते हैं. कासगंज के एक स्थानीय रेलवे कर्मचारी ने उन्हें बताया कि वो 2006 से कासगंज में हैं, लेकिन ऐसी सांप्रदायिक हिंसा वो पहली बार देख रहे हैं.

विरोध प्रदर्शन करते लोग
विरोध प्रदर्शन करते लोग

कासगंज में दिहाड़ी मज़दूर काफी तादाद में हैं. छोटा इलाका है, करोड़पति किस्म के लोग नहीं हैं और सपा-बसपा ने इसे जिला घोषित करने को लेकर खूब सियासत की है.




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