मुझे ऐसे महाटुच्चे कथित राजपूतों को तालिबानी कहने में एक पैसे का संकोच नहीं है और न ही कोई डर है.
अव्वल तो ये कि पद्मावती कभी थी ही नहीं. वो एक कोरी कल्पना है जैसे हर धर्म का हर भगवान है. मनगढ़ंत कहानियों के ऊपर जीने वालों की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है. मगर जिस तरह से मानसिक रूप से विक्षिप्त इंसान को भी जीने का पूरा हक मिलता है वैसे ही हर धर्म को मानने वाले को जीने का पूरा हक है. ये हक़ उससे कोई भी छीन नहीं सकता. लेकिन अपने विश्वास को दूसरे पर थोपने के लिए वो अगर ऐसी नीचता पर उतर आए कि बच्चों से भरी बस पर पत्थर बरसाने लगे तो उसके पृष्ठ भाग को लाठियों से इतना लाल कर दिया जाए कि उसे देख दुनिया की सभी ट्रेनें अपनी जगह रुक जाएं. मुझे नहीं मालूम है कि ये कौन से किस्म के राजपूत होंगे जिन्होंने वो पत्थर फेंके होंगे. वो बच्चे थे वो बच्चे जिन्हें शायद इस सब से कोई सरोकार भी नहीं है. अगर कोई सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहा है तो एक अलग ही लेवल पर जाकर उसके सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने को समझा जा सकता है. (वो लेवल एक गजब ही लेवल होगा लेकिन हां, समझा जा सकता है. समझा जाए ही, ये ज़रूरी नहीं है) मगर बच्चों पर पत्थर बरसाने में कौन सी बहादुरी है. क्या ये वही हैं जो राह में चलते किसी कुत्ते को पत्थर मार के अपनी मूंछ ऐंठते हैं और खुद को राजपूत कहने लगते हैं? कुछ रोज़ पहले मध्य प्रदेश के रतलाम में केजी के बच्चों को पीट दिया. करणी सेना ने. मैं थूंकता हूं ऐसी सेना पर. सेनाओं के अपने नियम होते हैं. अपने उसूल होते हैं. वो झुंड जो जाकर 5-6 साल के बच्चों को एक गाने पर नाचने की वजह से पीट आए, सेना नहीं बल्कि चमड़े की चप्पल में लगी फफूंद की कॉलोनी कहलाती है जिसके ऊपर सवा सौ ग्राम कड़ुआ तेल डालकर उसे धूप में सुखाया जाता है. इस वक़्त ज़रुरत है तो उस सवा सौ ग्राम तेल की. हर उस लाठी के लिए जो पुलिसिया पैसे से खरीदी गई है. ये बेहद शर्म की बात है कि प्रदेशों के मॉल्स के बाहर जितने लोग नहीं हैं उससे ज़्यादा पुलिस बल तैनात है क्यूंकि इन शूरवीरों की हालात एक फ़िल्म के रिलीज़ होने से खराब है. मुझे नहीं लगता है कि राजा रतन सिंह अलाउद्दीन के हमले से इतना घबराएंगे होंगे जितना ये कमज़ोर, खोखले और नीच कथित राजपूत एक फ़िल्म को सामने देख घबराए हुए हैं. बच्चों की बस पर पत्थर फेंके जा रहे हैं. बच्चों को पीटा जा रहा है. हरयाणा प्रदेश में हफ़्ते भर में आधा दर्जन रेप की खबरें आईं जिसपर किसी की रूह नहीं कांपी. लेकिन राजपूताना अस्मत दीपिका पादुकोण की कमर में छिपी बैठी थी जिसे कम्प्यूटर ग्राफ़िक्स की मदद से लुटने से बचा लिया गया. एक राजपूत राजा एक आताताई से हार जाता है. उसकी पत्नी को अपनी जान देनी पड़ती है. और उसकी पीढ़ी के लोग अपनी हार को एक औरत के जौहर करने से छिपा लेते हैं, उसे देवी बनाते हैं और उसकी आबरू को उसका रूप धरने वाली की कमर में ढूंढते हैं. मानसिक दिवालियेपन का इससे अच्छा नमूना और कहां मिलेगा? अगर ये काफ़ी नहीं है तो इस वीडियो को देखिये. बस में बच्चे हैं, उनको पढ़ाने वाले हैं. नीचे छिपे बैठे हैं. क्यूंकि सड़क पर जानवरों के साथ इंसान रुपी खोखले जानवर जो खुद को राजपूत कहते हैं, भी घूम रहे थे. उनके हाथ में पत्थर थे. उन्होंने वो पत्थर उठाये और दे मारे उस बस पर.अलाउद्दीन जब राजा रतन सिंह से मिलने आया था तो ऐसा मौका भी आया जब रतन की तलवार अलाउद्दीन की गर्दन पर थी. एक झटका और दिल्ली अपना शाह खो देती. (जैसा कि फ़िल्म में दिखाया गया है.) लेकिन रतन सिंह ने ऐसा नहीं किया. क्यूंकि अलाउद्दीन अकेला आया था और निहत्था था. उसी की पीढ़ी को आगे बढ़ाने वाले आज बच्चों की बसों पर पत्थर फेंक रहे हैं और उन्हें पीट रहे हैं. ये राजपूत नहीं हो सकते. ये फफूंद से ज़्यादा कुछ भी नहीं हो सकते. चाहिए तो बस सवा ग्राम तेल, हर पुलिसिया पैसों से खरीदी गई लाठी पर.Video of school bus attacked today in Gurugram by anti-Padmavati cowards. This is the aukat of groups like the Karni Sena: attackers of little kids. May the men responsible for this never be able to walk again. pic.twitter.com/4ZFKvJboKc
— Shiv Aroor (@ShivAroor) January 24, 2018












