डॉक्टर्स के मुताबिक प्लाज़्मा डोनर्स के ब्लड टेस्ट में हीमोग्लोबिन की मात्रा चेक की जाती है, जो कि 12.5 से ऊपर होनी चाहिए. उनका वजन 50 किलो से ज़्यादा होना चाहिए. और डोनर को डायबिटीज़, मलेरिया या सिफिलिस जैसी बीमारियां नहीं होनी चाहिए. अगर पेशेंट, जो कि अब डोनर है, इन सभी बाधाओं को पार कर लेता है, तब उसे अपना प्लाज़्मा डोनेट करने की परमिशन मिलती है.

एक इंटरव्यू से ठीक पहले कनिका.
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी से डॉक्टर्स की टीम कनिका के घर उनके फिटनेस टेस्ट के लिए पहुंची. लेकिन जांच में पता चला कि कनिका के खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा की कमी है. केजीएमयू के वीसी एम.एल.बी भट्ट ने बताया कि जब तक कनिका के हीमोग्लोबिन के स्तर में सुधार नहीं हो जाता, वो अपना प्लाज़्मा डोनेट नहीं कर सकतीं.
प्लाज़्मा डोनेशन को लेकर कनिका के संपर्क में संजय गांधी पोस्ट-ग्रैजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी दोनों थीं. लेकिन कनिका पहले अपना प्लाज़्मा केजीएमयू को डोनेट करने वाली थीं. हालांकि उन्होंने एसजीपीजीआई से भी डोनेशन का वादा किया था. दो प्लाज़्मा डोनेशन के बीच कम से कम दो महीने का अंतर होना चाहिए. और अब तो स्थिति ऐसी बन गई है कि कनिका एक बार भी अपना प्लाज़्मा डोनेट नहीं कर सकतीं.

अपने तीनों बच्चों के साथ कनिका कपूर.
न्यूज़ एजेंसी आईएएनएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक
केजीएमयू ने 26 अप्रैल को अपना पहला प्लाज़्मा ट्रांसफ्यूज़न किया. ये ट्रांसफ्यूज़न उरई के रहने वाले 58 साल के पेशेंट में किया गया, जिनकी हालत काफी नाज़ुक थी. लेकिन अब उनके स्वास्थ्य में सुधार आ रहा है. इस यूनिवर्सिटी को अब तक कुल तीन प्लाज़्मा डोनेशन में मिल चुके हैं. दो डॉक्टर्स से और लखीमपुर के एक पेशेंट से.
20 मार्च को लखनऊ के संजय गांधी पोस्ट-ग्रैजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ में भर्ती हुई थीं. वहां हुए टेस्ट में वो कोरोनावायरस पॉज़िटिव पाई गईं. तबसे उनका इलाज चल रहा था. दो हफ्ते से कुछ ज़्यादा समय अस्पताल में गुज़ारने के बाद कनिका 6 अप्रैल को डिस्चार्ज हुईं. पिछले तीन हफ्तों से अपने घर पर क्वॉरंटीन में थीं. 26 अप्रैल को वो पूरी तरह से रोग मुक्त हो गईं.
वीडियो देखें: कनिका ने अस्पताल से डिस्चार्ज होने के 21 दिन बाद इंस्टाग्राम पोस्ट में क्या लिखा?














