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वोट की बात करते-करते 'बेटियों की इज्जत' को बीच में घुसा गए शरद यादव

कर्पूरी ठाकुर के जन्मदिन पर कल पटना में भक्क से मुंह खोलकर बोल गए हैं.

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फोटो - thelallantop
जेडीयू के लीडर हैं. शरद यादव. पटना में कल बोल रहे थे. कर्पूरी ठाकुर के जन्मदिन के मौके पर. नेताओं का तो ऐसा है कि मुंह खोला भक्क से बोला. वही किए. कहा वोट की इज्जत बेटी की इज्जत से बड़ी है. उसके पहले कहा कि बैलेट पेपर के बारे में बड़े पैमाने पे सब जगह समझाने की ज़रूरत है. इनकी पहली ही बात गलत है, बैलेट पेपर कहां यूज होते हैं. अब ईवीएम का जमाना है. जाने ये कहां जी रहे हैं. कब की बात कर रहे हैं, कैसी बात कर रहे हैं. एक सवाल मन में उठता है. इन्हें नेता किसने बना दिया. क्यों बना दिया? कैसे हम लोग इतने साल से ऐसे नेताओं को ढो रहे हैं? शरद यादव पहले जेडीयू के नेशनल प्रेसिडेंट रहे हैं. एनडीए के कन्वेयर रहे हैं. ऐसे 'अनुभवी नेता' की ओर से ऐसा दकियानूसी बयान आना हताश करता है. चुनाव आयोग में ही खोट है. चुनाव लड़ने से पहले नेता को एक बार बुलवाकर देख लेना चाहिए. समझ के हिसाब से चुनाव लड़ने की योग्यता तय होती तो हमारे कई नेता कभी पार्षदी भी न लड़ पाते. ये इतने सीनियर नेता है, लेकिन समझ इनकी इत्ती सी है. अपने हिसाब से ये बड़ी सही बात कह रहे थे. वोट की कीमत बता रहे थे. लेकिन किस तरीके से. क्या कहा वो सुनिए. 'बेटी की इज्जत जाएगी तो गांव-मोहल्लों की इज्जत जाएगी, वोट एक बार बिक गया तो देश की इज्जत और आने वाला सपना पूरा नहीं हो सकता.' https://twitter.com/ANI_news/status/824081108325146624 शरद यादव बता सकते हैं. बेटी की इज्जत कैसे जाती है? घर में रखी हुई चीज है जो बस चली जाती है? क्या शरद यादव ये टर्म समझा सकते हैं? अगर नहीं तो बोल कैसे दिया? उनके ही तर्कों पर जाएं तो भी वोट से एक महिला के सम्मान की तुलना करने से ज्यादा मूर्खतापूर्ण कुछ नहीं हो सकता. दुखद और सबसे बुरा ये है कि उन्हें इसमें कोई बुराई नहीं नज़र आएगी. बुरा ये है कि उन्हें कभी समझ नहीं आएगा कि वो क्या बक गए हैं. बुरा ये है कि उन्हें लग रहा होगा वो कोई अच्छी बात कह रहे हैं. दो चीजें होती हैं. उनसे जुड़े हजार तर्क होते हैं. हजार बातें होती हैं. उनका आपस में कोई संबंध नहीं होता. और एक रोज़ शरद यादव जैसा कोई नेता उठाकर दोनों चीजों को एक साथ रख देता है. वहीं से रास्ते खुल जाते हैं कि किसी एक बात की महत्ता खत्म हो जाए. शरद यादव एक औसत भारतीय नेता हैं. जिनकी सोच एक सीमित दायरे में ही टहलती है. उदाहरण के लिए दक्षिण भारतीय महिलाओं के रंग और शरीर की बनावट के बारे में उनका बयान याद किया जा सकता है. ये रहने क्यों नहीं देते? जैसी पॉलिटिक्स ये सालों से कर रहे हैं, उसी में व्यस्त रहें. नए प्रयोग न करें क्योंकि  और छिछिया रहे हैं.
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