
सुप्रीम कोर्ट ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बाद तमिलनाडु में बड़े स्तर पर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए.
इन मौतों की खबर कमल हसन और रजनीकांत को मिली तो होगी न उम्मीद करते हैं कि ये खबर कमल हसन और रजनीकांत को भी मालूम चली होगी. बाकी जिन सिलेब्रिटीज ने जल्लीकट्टू को 'संस्कृति' और 'परंपरा' बताते हुए इसकी वकालत की थी, उन सबके भी पास पहुंची होगी. कमल हसन ने तो बकायदा कहा था कि वो जल्लीकट्टू नाम के इस 'खेल' के बहुत बड़े फैन हैं. खुद भी कई बार ये खेल चुके हैं. अब उनसे पूछा जाना चाहिए. क्या इन चार मौतों की जिम्मेदारी लेंगे? या ये कहेंगे कि संस्कृति के नाम पर लोगों का मरना चलता है? क्या संयोग है कि रजनीकांत और कमल हसन अब राजनीति में भी आ गए हैं. रजनीकांत ने अपनी अलग पार्टी बना भी ली. कमल हसन भी 21 फरवरी को अपनी पार्टी बना रहे हैं. कहावत है- जे रोगिया के भावे, वो वैधा फरमावे. ये लोग भी ऐसे ही होंगे. समर्थन के चक्कर में लोगों को खुश करने वाली बातें करेंगे. जैसा कि नेता आमतौर पर करते हैं. जिधर हवा बहती है, उधर बह लेते हैं. स्टैंड लेने से डरते हैं. स्टैंड लेते भी हैं, तो इतना बुरा.

कमल हसन ने कहा था कि जिन लोगों को जल्लीकट्टू से दिक्कत है, उनको बिरयानी पर भी बैन लगा देना चाहिए. कई अन्य कलाकार, खासतौर पर दक्षिण भारतीय सिलेब्रिटीज ने जल्लीकट्टू का समर्थन किया था. रजनीकांत ने भी इसका समर्थन किया था.
खेल के नाम पर जानवरों के साथ हद बुरा सलूक किया जाता है जैसे इधर मकर संक्राति मनाई जाती है, वैसे तमिलनाडु में पोंगल मनाते हैं. बड़ा जश्न रहता है. जल्लीकट्टू इसी जश्न का हिस्सा है. इसको मांजू विरट्टू भी बोलते हैं. इस हिंसक खेल के लिए लोग खासतौर पर सांड पालते हैं. गांवों में मेला सा माहौल रहता है. जल्लीकट्टू दो शब्दों से बना है- जली और कट्टू. इन शब्दों का मतलब समझिए तो यूं होगा कि सांड के सींग में बंधे हुए सोने/चांदी के सिक्के. जो कि सांड की जीत का इनाम होते हैं. इस 'खेल' में लोग सांड से लड़ते हैं. जो लड़ते हैं, उनके लिए ये बहादुरी दिखाने का मौका होता है. जो देखते हैं, उनके लिए मनोरंजन होता है. सांड चूंकि जानवर है इसीलिए उसकी मर्जी नहीं पूछी जाती. उसे उत्तेजित करने के लिए उसे नशे की चीजें दी जाती हैं. उसे मारा-कोंचा जाता है. मानते हैं कि सांड जितना आक्रामक हो, खेल में उतना मजा आता है.

जिन सांडों और बैलों का इस खेल में इस्तेमाल किया जाता है, उनके साथ बेहद बुरा सलूक किया जाता है. उन्हें उत्तेजित करने लिए एक से एक अमानवीय यातनाएं दी जाती हैं. ज्यादातर जानवर इतने घायल हो जाते हैं कि मर जाते हैं.
जान लेने के आयोजन को खेल कैसे कहा जा सकता है? इस खेल के कई नाम हैं. हर नाम में खेल थोड़ा-बहुत बदल जाता है. सांड और उससे होने वाली लड़ाई सबमें कॉमन है. इस खेल के चक्कर में हर साल कई सारे लोग मारे जाते हैं. जानवरों पर जो बीतती है, वो अलग है. इसी चक्कर में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर बैन लगा दिया था. बैन के बाद तमिलनाडु में बवाल हो गया. लगा कि लोगों से उनकी सांस छीन ली गई है. सरकार ने भी उन्हें सहलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. और कमल हसन जैसे कलाकार तो इसकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे. ऐसा लग रहा था कि जल्लीकट्टू बंद हो जाने पर तमिलनाडु जी नहीं पाएगा. जान चली जाएगी. वैसे जान गई तो है. दो दिन में चार लोगों की. इसी खेल ने जान ली है उनकी. बाकी कितने जानवर मरे, इसका आंकड़ा है नहीं. मरे होंगे, ये तय है. लेकिन अभी कोई हो-हल्ला नहीं हो रहा. अजीब लोग हैं. जहां बोलना चाहिए वहां चुप रहते हैं. जहां चुप रहना चाहिए, वहां तलवार भांजने लग जाते हैं. जान लेने के आयोजन को खेल कैसे कहा जा सकता है?
ये भी पढ़ें:
देश के इस हिस्से में बैलों को दी जाती है कोकेन, कहां हैं योगी आदित्यनाथ?
कमल हसन ने बताया अपना सीक्रेट जिसमें वो बैलों के साथ लड़ते थे
जयललिता के एरिया में PM मोदी की वजह से दौड़ेंगे बैल
तमिलनाडु में नहीं होगी बैलों की दौड़, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
जमे हुए बालों वाला बच्चा, जिसकी एक तस्वीर ने सोशल मीडिया को रुला दिया














