आज इरफ़ान भारतीय सिनेमा का अन्तरराष्ट्रीय चेहरा हैं. उनकी कमाल अदाकारी के मुरीद विश्व भर में फैले हैं. उनकी नई फिल्म 'मदारी' की चर्चा है. वे मुम्बई फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हैं, लेकिन हॉलीवुड के विशालकाय स्टूडियो सिनेमा को भी भीतर से देख रहे हैं. उन्होंने 'टाइम्स अॉफ इंडिया' को एक लम्बा साक्षात्कार दिया है, जिसमें विस्तार से हमारे सिनेमा में हो रही नई आकर्षित करती चीजों पर बातें हैं. अौर इरफ़ान ने हॉलीवुड की बढ़ती चुनौती से उपजे खतरों की भी खूब अच्छे से चर्चा की है.
यहां पढ़ें बातचीत से निकली खास बातें −
आर्ट सिनेमा vs मेनस्ट्रीम सिनेमा डिबेट पर
आज कोई 'कला सिनेमा' मौजूद नहीं है. मैं भी कला सिनेमा की देन नहीं हूं. मैं ऐसी फिल्मों की देन हूं जिसकी परिभाषा मीडिया ने अभी तक ढूंढी नहीं है. आज बहस 'कला' बनाम 'मुख्यधारा' वाली नहीं है. अब 'पीकू' को आप क्या कहोगे? या 'तलवार' को? क्या इन फिल्मों में आर्ट नहीं? हमारे समय की यही त्रासदी है कि जिन फिल्मों में गाना नहीं होता या जो शोर शराबा नहीं मचातीं, लोग उन्हें 'आर्ट फिल्म' कहने लगते हैं. दरअसल ये ही है नए किस्म का सिनेमा जो बीते सालों में उभर रहा है अौर जो हॉलीवुड की चुनौती का मुकाबला कर सकता है.
हॉलीवुड की दानवी चुनौती पर
हॉलीवुड इस तेज़ी से हमें निगल जाने के लिए आ रहा है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. 'जंगल बुक' ने इतना पैसा कमाया है. अौर ऐसा तो पहली बार हुआ है कि हॉलीवुड फिल्म के हिन्दी वर्जन ने ज़्यादा पैसा कमाया है. हमें ये समझना होगा कि अमेरिका की आत्मा मार्केटिंग में बसी है. वो पूरा मुल्क ही बाज़ार पर खड़ा है. अौर उनके खेलों पर बने उद्योग अौर सिनेमा पर बने उद्योग तो इसमें माहिर हैं. वो दूसरे बड़े देशों के सिनेमा उद्योगों को खा गए. यूरोपियन सिनेमा को खा गया है हॉलीवुड. यूके का सिनेमा खतम हो गया. फ्रांस का खतम हो गया. क्योंकि हॉलीवुड वाले जानते हैं कि लोगों को कैसे बांधना है.
क्या खास है हॉलीवुड में
हॉलीवुड का क्राफ्ट देखना चाहिए. जब वो बच्चों के लिए फिल्म बनाते हैं तो उन्हें सिर्फ बच्चे ही नहीं देखते, बड़े भी इंजॉय करते हैं. जैसे 'जुरासिक वर्ल्ड' या 'जंगल बुक'. हमने तो ऐसी एक भी सफल बच्चों की फिल्म या हॉरर फिल्म नहीं बनाई है. यहीं हम पिछड़ रहे हैं ... हमारे यहां अभिनेता स्टार नहीं है. हॉलीवुड में अभिनेता हमेशा से स्टार रहे हैं. क्लिंट ईस्टवुड को देख लीजिए, अल पचीनो को, रॉबर्ट डी नीरो को या मर्लिन ब्रांडो को. हमारे यहां भी पहले ऐसा होता था. लेकिन राजेश खन्ना के स्टारडम वाले दौर के बाद एक पतन का दौर आया. नायक आत्म-दया से भरी, मैलोड्रामा वाली भूमिकाएं करने लगे अौर हम गोविन्दा वाले दौर तक पहुंच गए. लेकिन इस पतन को हम बाकी चीज़ों से अलग कर के नहीं देख सकते. ये वो दौर (अस्सी का उत्तरार्ध) था जब सिनेमाहॉल मर रहे थे. वीसीआर पर फिल्में देखी जा रही थीं अौर मध्यवर्ग सिनेमाहाल से गायब था. सिर्फ़ एक खास किस्म के दर्शक फिल्में देखने आ रहे थे अौर फिल्में उन्हीं को ध्यान में रखकर बनाई जाने लगीं.
अस्सी अौर नब्बे के दशक में सिनेमा के पतन पर
उपभोक्ता वैसा हो गया था तो फिल्में वैसी बन रही थीं. एक बार 'कसूर' फिल्म की शूटिंग के दौरान भट्ट साब मेरे पे चिल्लाए, "अरे यार इरफ़ान, गंदी एक्टिंग कर. यहां दर्शक को सब मुंह में खिलाना पड़ता है. स्पून फीड कर उनको. ये अच्छी एक्टिंग से नहीं चलेगा. दुकान बंद हो जाएगी." अौर उनकी बात में दम था. वो उस दर्शक की मानसिकता को बखूबी समझ रहे थे जो सिनेमा में बारीकी देखने को उत्सुक ही नहीं था. अच्छा है, कि आज का दर्शक विश्व भर का सिनेमा देख रहा है. इससे वो खुद अपनी फिल्मों में भी ऐसी बारीकियां देखना चाहता है. इसी वजह से 'पीकू' अौर 'तलवार' जैसी फिल्में बन पाती हैं. चार करोड़ की फिल्म सत्तर करोड़ का बिजनस कर रही है.
बचपन में शूटिंग देखने से मिले सबक
मैंने बच्चन साब की शूटिंग देखी थी. अौर मुझे लगा जैसे मैं कोई हूं ही नहीं. बहुत बुरा लगा था. घर आकर ये बात मैंने अपनी मां को बताई. उन्होंने मुझे कहा कि उन्होंने भी एक बार आमेर के किले में चल रही शूटिंग देखी थी. दारा सिंह की शूटिंग थी. अौर उन्हें भी वहां बहुत बुरा लगा था. इससे मुझे ये तो समझ आया की हमारी भावनाएं मिलती हैं, पर उसकी वजह नहीं समझ आई. लेकिन उसके बाद मैं कभी वापस फिल्म की शूटिंग देखने नहीं गया. किसी के पास अॉटोग्राफ मांगने भी नहीं. बस एक बार बल्लेबाज ज़हीर अब्बास को देखकर भागा-भागा गया था. दोस्ताना मैच का मौका था, ज़्यादा सिक्योरिटी नहीं थी. उन्होंने मेरी अोर देखा अौर आगे बढ़ गए. फिर मैं किसी के पास अॉटोग्राफ मांगने भी नहीं गया.