गोरख पांडे ने शायद चमचों-चाटुकारों के लिए लिखी थीं ये पंक्तियां. हमने आज इसका इस्तेमाल अलग संदर्भ में किया है. भावुक होकर झूठ को सच मान लेने वालों के लिए. सुनी-सुनाई बातों पर आपा खो देने वालों के लिए. उनके लिए, जिन्होंने बिना पड़ताल किए मान लिया कि भारतीय सेना ने अपने शहीद सैनिकों का अपमान किया है.राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है ये सुबह-सुबह की बात है - गोरख पांडे
भारतीय सेना के सात शहीद. सातों के शव प्लास्टिक की बोरियों में भरे हुए. बोरियां गत्ते में रखी हुईं. ये तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब चल रही है. सेना की लानत-मलानत की जा रही है. आरोप है कि सेना ने इन शहीदों का अपमान किया. आपने भी देखा होगा इन तस्वीरों को. आपके भी मन में टीस उठी हो शायद. ये तस्वीर आधी ही सच्ची है लेकिन. पूरी नहीं. सुनी-सुनाई बातों पर हवा में घूंसे चलाने जैसा मामला है ये.
कल सात जवान सूरज की रोशनी में बाहर निकले. अपनी मातृभूमि भारत की सेवा करने के लिए. वापस अपने घर वो इस तरह लौटे हैं.
लोग भड़क गए, सेना को खरी-खोटी सुनाने लगे पनाग के इस ट्वीट के बाद तहलका सा मच गया. लोग इस तस्वीर को शेयर करने लगे. नाराजगी जताई. सेना को खरी-खोटी सुनाई. जाहिर है. देश की सेवा में शहीद होने वालों को सबसे ऊंचे स्तर का सम्मान मिलना चाहिए. (अव्वल तो किसी की ऐसे मौत भी नहीं होनी चाहिए.) खूब कड़ी प्रतिक्रियाएं आईं. आमतौर पर सेना आलोचना से परे मानी जाती है. अंतिम सत्य टाइप. इस मामले में उस पर भी भरोसा नहीं किया गया. मान लिया गया कि सेना ने जान-बूझकर ऐसा किया है. मामले ने खूब तूल पकड़ लिया. सेना को सामने आकर सफाई देनी पड़ी. बोलना पड़ा कि हर शहीद को पूरा सैन्य सम्मान दिया जाता है.

भारतीय सेना के अडिशनल डायरेक्टरेट जनरल ऑफ पब्लिक इंफॉर्मेशन ने एक ट्वीट कर ये तस्वीर साझा की.
सच जाने बिना भावुक हो जाना बेवकूफी है जहां ये हादसा हुआ, वो पहाड़ी इलाका है. ऐसे ऊंचे इलाकों में हेलिकॉप्टर्स को बहुत सावधानी बरतनी होती है. वो सीमित वजन उठा सकते हैं. वैसे भी, ताबूत बहुत भारी होते हैं. हर जगह मौजूद नहीं होते. उन्हें हर जगह नहीं ले जाया जा सकता है. लोग अक्सर अधूरी जानकारी रखते हैं. फिर बेमतलब भावुक हो जाते हैं. बेवकूफी और भावना दो अलग-अलग शब्द हैं. सच जाने बिना भावुक हो जाना बेवकूफी है. कई लोग किसी भी मौके पर राजनीति करने में माहिर होते हैं. सिद्धहस्त. वो इस मौके पर भी राजनीति कर रहे हैं. शहीदों के शवों के बहाने सेना को घेर रहे हैं. सेना के बहाने सरकार को निशाने पर ले रहे हैं. सवालों से परे कोई नहीं हो सकता, लेकिन बेमतलब आलोचना तो नहीं की जानी चाहिए. ऐसा करने वालों का कुछ नहीं हो सकता. समझाना उनको है, जो सच में भावुक हैं. ऐसे लोगों से कहना है. संवेदनशील होना अच्छी बात है. मगर बिना सच जाने नहीं. बिना पूरी बात सुने फैसला सुना देना बेवकूफी मानी जाती है.

सेना ने कहा है कि शहीदों को हमेशा समुचित सैन्य सम्मान दिया जाता है. शहीदों के शवों को ले जाने के लिए बॉडी बैग्स, लकड़ी के बॉक्स और ताबूतों का इस्तेमाल होता है. सेना ने इस मामले को असामान्य बताया है.
सुनिए दो जांबाज़ पुलिसवालों को, एक ने वीरप्पन को मारा, एक ने ददुआ को:
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