हमारे पड़ोस में इस समय कूटनीति की एक ऐसी बिसात बिछी है, जिसके मोहरे बहुत खामोशी से लेकिन बेहद तेजी से चल रहे हैं. नेपाल के पहाड़ों से लेकर श्रीलंका के समुद्र तट तक, भारत सरकार अचानक बहुत ज्यादा एक्टिव हो गई है. पिछले कुछ सालों में भारत ने अपने पड़ोसी देशों में बिजली के प्रोजेक्ट्स, बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर, भारी-भरकम कर्ज और कनेक्टिविटी पर नोटों की जैसी बारिश की है, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई.
भारत का पड़ोसी कूटनीति गेम बदल रहा है? नेपाल से श्रीलंका तक मोदी सरकार आखिर चाहती क्या है?
India's Neighborhood First Policy: पिछले कुछ सालों में भारत ने पड़ोसी देशों में बिजली, इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्ज और कनेक्टिविटी पर बड़ा निवेश किया है. लेकिन सवाल है कि क्या ये सिर्फ दोस्ती है या चीन को रोकने की रणनीति?


मतलब कमाल है भाई! एक समय था जब हमारे इन पड़ोसियों के गलियारों में सिर्फ चीन का सिक्का चलता था. चीन अपनी भारी-भरकम तिजोरी लेकर आता था और कर्ज के जाल में फंसाकर श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह जैसी जगहें अपने नाम लिखवा लेता था. लेकिन अब पासा पूरी तरह पलट रहा है. भारत ने अपनी रणनीति को इतना आक्रामक बना दिया है कि ड्रैगन को भी अब पीछे हटना पड़ रहा है.
आखिर भारत सरकार की इस नई 'Neighbourhood First' यानी पड़ोसी पहले की नीति का पूरा हिसाब-किताब क्या है? क्या मोदी सरकार सिर्फ निस्वार्थ भाव से दोस्ती निभा रही है, या इसके पीछे चीन की घेराबंदी करने का कोई बहुत बड़ा और मास्टर प्लान छुपा हुआ है? तो चलिए इस पूरे इंटरनेशनल गेम का एक-एक पुर्जा अलग करके समझने की कोशिश करते हैं. और देखते हैं कि साउथ एशिया के इस कूटनीतिक अखाड़े में असली खेल क्या चल रहा है.
नेपाल से श्रीलंका तक भारत के निवेश की वो अंदरूनी कहानी
कूटनीति में कोई भी कदम बिना किसी ठोस वजह के नहीं उठाया जाता. भारत ने पिछले कुछ समय में अपने पड़ोसियों को जोड़ने के लिए जो काम किए हैं, वो सिर्फ कागजी वादे नहीं हैं बल्कि जमीन पर उतरते हुए प्रोजेक्ट्स हैं. नेपाल को ही देख लीजिए, जहां कभी चीन अपना दबदबा बढ़ा रहा था, वहां आज भारत नेपाल से बिजली खरीद रहा है और वहां हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में अरबों का निवेश कर रहा है.
कूटनीतिक थिंक टैंक 'इंडिया मैटर्स' के रोहित शर्मा इस बिजली खरीद को मदद के एक तरीके की तरह देखते हैं. उनका कहना है कि 2026 के बजट में भारत ने नेपाल के लिए 800 करोड़ रुपये की रकम यूं ही नहीं आवंटित की. रोहित ने लल्लनटॉप से फोन पर बात करते हुए कहा,
बिजली खरीद के बदले श्रीलंका को जो विदेशी मुद्रा मिल रही है, वो कहीं ना कहीं भारत पर उनकी निर्भरता को बढ़ाती है. नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत की जगह चीन पर निर्भर होने का खामियाजा क्या होगा.
यही कहानी श्रीलंका में भी दोहराई जा रही है. जब श्रीलंका आर्थिक तंगी से पूरी तरह कंगाल हो गया था और खाने-पीने के लाले पड़ गए थे, तब चीन ने अपनी आंखें मूंद ली थीं. उस बुरे वक्त में भारत संकटमोचक बनकर सामने आया और बिना देरी किए आर्थिक मदद भेजी. आज श्रीलंका में रिन्यूएबल एनर्जी से लेकर पोर्ट डेवलपमेंट तक के बड़े ठेके भारत की झोली में आ रहे हैं.
2026-27 के बजट में भारत ने श्रीलंका की मदद के लिए 400 करोड़ रुपये की रकम का आवंटन किया है. जाफना से लेकर त्रिंकोमाली तक के क्षेत्र को डेवलप करने में भारत मदद कर रहा है. ये वही इलाका है जो लंबे समय तक लिट्टे (LTTE) और श्रीलंका सेना के बीच संघर्ष का गवाह रहा है. लिहाजा विकास की दौड़ में पिछड़ गया. यहां के डेवलपमेंट में मदद करना एक साथ विदेश नीति और भारत की अंदरूनी तमिल राजनीति दोनों को साधने में मदद करता है. कूटनीतिक थिंक टैंक 'इंडिया मैटर्स' के रोहित शर्मा लल्लनटॉप से बात करते हुए कहते हैं,
राजपक्षे ब्रदर्स के पतन के बाद भारत ने श्रीलंका की छप्पड़ फाड़कर मदद की है. श्रीलंका के मौजूदा राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके इस बात को अच्छी तरह जान गए हैं कि चीन के कर्ज के जाल से निकलना है तो भारत को अपना दोस्त बनाना ही होगा.
इसी तरह प्रो-चाइना पॉलिसी लेकर आने वाले मालदीव के राष्ट्रपति डॉ. मोहम्मद मुइज़्ज़ू के तेवर भी अब बदलने लगे हैं. वो भारत से संबंध बेहतर बनाने को आतुर हैं. ‘हनी मधु एयरपोर्ट’ के जरिए भारत अब भी माले के विकास में बराबर योगदान दे रहा है. 2026 के केंद्रीय बजट में भारत ने मालदीव की सहायता के लिए भी 550 करोड़ रुपये की राशि का आवंटन किया है.
यहां तक की अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को भी अपने देश में विकास कार्य चलाने के लिए भारत डेढ़ सौ करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता दे रहा है. 2026 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसके लिए बाकायदा अलग से राशि आवंटित की है.
दरअसल ये पूरा गेम असल में 'कनेक्टिविटी' और 'डिपेंडेंसी' का है. भारत अब सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें नहीं करता, बल्कि सीधे चेकबुक कूटनीति और समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने की ताकत दिखा रहा है. हाल ही में कई बड़ी राजनीतिक रिपोर्टों में इस बात पर मुहर लगी है कि भारत की ये 'Neighbourhood First Policy' क्षेत्रीय पहुंच को एक बिल्कुल नए और मजबूत स्तर पर ले जा रही है.
क्या ये सिर्फ पड़ोसियों से प्यार है या चीन को रोकने का चक्रव्यूह?
अब असली सवाल ये उठता है कि भारत अचानक इतना दरियादिल क्यों हो गया है? तो गुरु, इसके पीछे का सबसे बड़ा सच ये है कि भारत अपने घर के आंगन में चीन को पैर पसारने का कोई मौका नहीं देना चाहता. चीन की एक बहुत पुरानी नीति रही है जिसे 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' यानी मोतियों की माला कहा जाता है. इसके तहत वो भारत के चारों तरफ मौजूद देशों में अपने सैन्य और कमर्शियल ठिकाने बना रहा था.
मालदीव हो, बांग्लादेश हो, श्रीलंका हो या नेपाल, चीन ने हर जगह अपनी कम्युनिस्ट तिजोरी खोल दी थी. भारत को बहुत अच्छे से समझ आ गया था कि अगर इन पड़ोसियों को अपने साथ नहीं रखा, तो कल को सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा.
इसीलिए भारत ने अपनी रणनीति बदली. अब भारत इन देशों को सिर्फ कर्ज नहीं दे रहा, बल्कि उन्हें अपने साथ बिजनेस पार्टनर बना रहा है. नेपाल की बिजली भारत के ग्रिड से जुड़ रही है, बांग्लादेश तक पाइपलाइन से डीजल जा रहा है, और श्रीलंका के साथ सीधे आर्थिक गलियारा बन रहा है. जब इन देशों का आर्थिक फायदा भारत से जुड़ जाएगा, तो वो चाहकर भी चीन की गोद में नहीं जा पाएंगे. ये भारत का वो कूटनीतिक चक्रव्यूह है जिसने बीजिंग की रातों की नींद उड़ा रखी है.
राजनीतिक नूराकुश्ती के बीच भारत की साख की परीक्षा
लेकिन इस खेल में चुनौतियां भी कम नहीं हैं. पड़ोसियों के साथ कूटनीति करना जलते हुए अंगारों पर चलने जैसा होता है. मालदीव जैसे देशों में जब भी सत्ता बदलती है, वहां की राजनीति का रुख अचानक चीन की तरफ झुक जाता है. नेपाल में भी अंदरूनी राजनीति के चलते आए दिन भारत विरोधी सुर उठते रहते हैं.
ऐसे में भारत की इस 'Neighbourhood First' पॉलिसी की असली परीक्षा यही है कि वो सरकारों के बदलने से अपने रिश्तों को प्रभावित न होने दे. भारत को ये साबित करना होगा कि वो एक ऐसा बड़ा भाई है जो मुसीबत में सबसे पहले बिना किसी छिपे हुए एजेंडे के मदद के लिए दौड़ता है, न कि चीन जैसा कोई साहूकार जो मदद के बदले जमीन हड़पने की फिराक में रहता है.
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अंत में सच यही है कि साउथ एशिया का ये पावर गेम अब एक बहुत ही दिलचस्प मोड़ पर आ चुका है. भारत ने बिजली, इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के दम पर अपनी कूटनीति का गियर पूरी तरह बदल दिया है. जब तक भारत अपने प्रोजेक्ट्स को रफ्तार से पूरा करता रहेगा, तब तक पड़ोस की इस बिसात पर चीन के लिए हवाई किले बनाना बहुत मुश्किल रहेगा.
वक्त आ गया है कि इस कूटनीतिक बढ़त को और मजबूत किया जाए ताकि भारत का ये इलाका पूरी तरह से सुरक्षित और समृद्ध बना रहे.
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