The Lallantop

सारी नदियां आपस में जुड़ जातीं तो क्या हमेशा के लिए मिट जाती बाढ़ और सूखे की तबाही?

Kalam's Water Grid Plan: भारत में बाढ़ और सूखे के बीच नदी जोड़ो परियोजना (River Interlinking Project) और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के वॉटर ग्रिड विजन पर बड़ा सवाल: क्या ये जल संकट का स्थायी समाधान है या पर्यावरण के लिए नया खतरा?

Advertisement
post-main-image
नदियों को जोड़ने का 'कलाम प्लान' (फोटो- PTI)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भारत में जल संकट के समाधान के लिए नदी जोड़ो परियोजना और राष्ट्रीय वॉटर ग्रिड की प्रस्तावना की थी, जिसका उद्देश्य नदियों को जोड़कर पानी का असमान वितरण ठीक करना है।
  • भारत में मानसून के दौरान कई राज्यों में बाढ़ आती है जबकि कुछ क्षेत्र सूखे और पानी की कमी से पीड़ित रहते हैं, जिससे नदी जोड़ो परियोजना जैसे बड़े जल प्रबंधन उपायों की मांग बढ़ी है।
  • केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट जैसे नदी जोड़ो प्रयासों में जलाशयों और बांधों का निर्माण स्थानीय समुदायों के विस्थापन और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी चुनौतियां उत्पन्न कर रहा है, जिससे परियोजना की प्रगति धीमी हुई है।

भारत में एक अजीब जल संकट खड़ा हो गया है. एक तरफ जहां मानसून की बारिश ने असम, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में बाढ़ का कहर बरपा रखा है, वहीं दूसरी तरफ देश के कई हिस्से आज भी सूखे और पानी की भारी कमी से जूझ रहे हैं. इसी विरोधाभास के बीच एक बड़ा सवाल फिर सामने आया है: क्या पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का देखा हुआ वॉटर ग्रिड और नदी जोड़ो परियोजना का सपना भारत की इस जल समस्या का स्थायी समाधान बन सकता है, या फिर इसके पीछे छिपे पर्यावरण संबंधी खतरे आने वाले समय में नई चुनौती खड़ी कर सकते हैं?

Advertisement

इस सवाल का सबसे बड़ा उदाहरण है केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट, जो भारत की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजनाओं में शामिल है. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर चल रहे इस प्रोजेक्ट के डूब क्षेत्र में स्थानीय किसान, आदिवासी समुदाय और पर्यावरणविद लगातार विरोध जता रहे हैं. उन्हें डर है कि बांध और जलाशय के लिए उनकी उपजाऊ जमीन, जंगल, चरागाह और पुश्तैनी संसाधन हमेशा के लिए खत्म हो सकते हैं.

दरअसल, भारत की जल कहानी सिर्फ बाढ़ और सूखे की नहीं, बल्कि पानी के असमान बंटवारे की भी है. जहां कुछ राज्यों में नदियां हर साल तबाही मचाती हैं, वहीं बुंदेलखंड जैसे इलाकों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करते हैं. ऐसे में नदी जोड़ो परियोजना (River Linking Project) को लेकर बहस तेज हो गई है कि क्या नदियों को जोड़ना भारत के जल संकट का समाधान है या फिर प्रकृति के संतुलन के साथ एक बड़ा प्रयोग?

Advertisement

क्या नदी जोड़ो परियोजना बदल सकती है भारत की जल तस्वीर?

भारत में बाढ़ और सूखे की दोहरी मार को खत्म करने का सपना देखने वालों में सबसे बड़ा नाम पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का था. साल 2002-03 के आसपास उन्होंने देश के जल संकट के स्थायी समाधान के तौर पर नदियों को आपस में जोड़ने यानी River Interlinking Project और एक विशाल National Water Grid का विचार सामने रखा था.

डॉ. कलाम का मानना था कि भारत में पानी की समस्या असल में पानी की कमी से ज्यादा उसके असमान वितरण की समस्या है. एक तरफ ब्रह्मपुत्र और गंगा जैसी नदियां हर साल मानसून के दौरान लाखों क्यूसेक अतिरिक्त पानी लेकर बाढ़ का कारण बनती हैं, वहीं दूसरी तरफ राजस्थान, बुंदेलखंड और दक्षिण भारत के कई इलाके गंभीर जल संकट से जूझते हैं. उनके विजन के मुताबिक, अगर हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों को एक बड़े नेटवर्क के जरिए जोड़ा जाए तो अतिरिक्त पानी को सूखे क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है.

डॉ. कलाम के वॉटर ग्रिड कॉन्सेप्ट में विशाल नहरों, जलाशयों और टनल के नेटवर्क की कल्पना की गई थी, जिसके जरिए बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के पानी को जल संकट वाले इलाकों तक पहुंचाया जा सके. उनका मानना था कि ये परियोजना सिर्फ सिंचाई और पेयजल की समस्या को कम नहीं करेगी, बल्कि भारत को बाढ़ और सूखे के लगातार चक्र से बाहर निकालने में भी मदद कर सकती है.

Advertisement

यही वजह है कि डॉ. कलाम का नदी जोड़ो का सपना आज भी भारत की सबसे महत्वाकांक्षी जल परियोजनाओं में चर्चा का विषय बना हुआ है. हालांकि, इस सोच के साथ पर्यावरण, विस्थापन और नदियों के प्राकृतिक संतुलन को लेकर कई गंभीर सवाल भी जुड़े हुए हैं.

दशकों बाद भी क्यों अटकी है भारत की वाटर ग्रिड योजना?

भारत की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना (River Interlinking Project) का सपना जितना बड़ा है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही मुश्किल साबित हो रहा है. नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी (NWDA) की रिपोर्ट्स के मुताबिक, नदियों को आपस में जोड़ने की कई योजनाएं दशकों की चर्चा, सर्वे और कागजी प्रक्रिया के बाद भी पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर पाई हैं.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट है, जिसे भारत की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना के तौर पर देखा जा रहा है. केंद्र सरकार से इसे जरूरी मंजूरियां मिल चुकी हैं, लेकिन जमीन पर काम की रफ्तार, पुनर्वास, स्थानीय विरोध और राज्यों के बीच सहमति जैसे मुद्दे अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं.

दरअसल, नदी जोड़ो योजना सिर्फ इंजीनियरिंग का प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि राज्यों के बीच पानी के अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा मामला है. देश में प्रस्तावित कई अन्य नदी लिंक परियोजनाएं भी जल बंटवारे के विवाद, भारी आर्थिक लागत, पर्यावरणीय मंजूरियों और राज्यों की आपत्तियों के कारण वर्षों से आगे नहीं बढ़ पाई हैं.

इन परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती है जमीन अधिग्रहण और विस्थापन. हजारों हेक्टेयर जमीन, जंगल और आबादी वाले इलाकों पर असर पड़ने की संभावना के कारण स्थानीय समुदायों की सहमति हासिल करना आसान नहीं है. यही वजह है कि अरबों रुपये के बजट वाली ये योजनाएं अक्सर तकनीकी मंजूरी मिलने के बाद भी सामाजिक और राजनीतिक अड़चनों में फंस जाती हैं.

क्या विकास की कीमत चुकाएगा प्रकृति?

River Interlinking Project को लेकर सबसे बड़ी चिंता सिर्फ पानी के बंटवारे की नहीं, बल्कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले असर की है. विशेषज्ञों का मानना है कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बड़े पैमाने पर बदलाव और हजारों किलोमीटर लंबे नहर नेटवर्क का निर्माण जंगलों, वन्यजीवों और जैव विविधता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट है, जिसके तहत मध्य प्रदेश के पन्ना इलाके में बड़े पैमाने पर बदलाव की आशंका जताई गई है. इस परियोजना से जुड़े डूब क्षेत्र को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है कि इससे पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है. जंगलों के नुकसान के साथ-साथ वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्ते यानी Wildlife Corridors भी प्रभावित होने का खतरा है.

मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट की फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज (MoEFCC) स्टडी के मुताबिक, जंगलों के बीच बने ये प्राकृतिक गलियारे बाघ, हाथी और दूसरे जानवरों के आवागमन, प्रजनन और जेनेटिक विविधता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं. अगर ये रास्ते टूटते हैं तो जानवरों के अलग-अलग समूहों के बीच संपर्क कम हो सकता है, जिससे लंबे समय में उनकी आबादी और अस्तित्व पर असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है.

नदी जोड़ने की परियोजनाओं का असर सिर्फ जमीन और जंगलों तक सीमित नहीं रहता. नदियों के प्राकृतिक बहाव में बदलाव का असर समुद्र तक पहुंचने वाले मीठे पानी की मात्रा पर भी पड़ सकता है. इससे डेल्टा क्षेत्रों, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और उन लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है, जो मछली पालन और समुद्री संसाधनों पर निर्भर हैं.

यही वजह है कि नदी जोड़ो परियोजना को लेकर बहस सिर्फ विकास बनाम पर्यावरण की नहीं, बल्कि इस सवाल की भी है कि क्या भारत पानी की समस्या का समाधान प्रकृति के संतुलन को बनाए रखते हुए खोज सकता है.

क्या नदी जोड़ो परियोजना वाकई है स्थायी समाधान?

भारत में बाढ़ और सूखे की समस्या को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ नदियों को जोड़ देने से इस दोहरी चुनौती का समाधान निकाला जा सकता है? देश के कई जल विशेषज्ञों और पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका जवाब इतना आसान नहीं है. उनका कहना है कि मानसून के कुछ हफ्तों में आने वाली अचानक और बेहद तेज बाढ़ को सीधे नहरों या पाइपलाइनों के जरिए सूखाग्रस्त इलाकों तक पहुंचाना तकनीकी रूप से बेहद जटिल चुनौती है.

दरअसल, बाढ़ का पानी कुछ दिनों के लिए आने वाला तेज और अनियंत्रित प्रवाह होता है. इसे सुरक्षित तरीके से रोकने और बाद में इस्तेमाल करने के लिए विशाल जलाशयों, बांधों और स्टोरेज सिस्टम की जरूरत पड़ती है. लेकिन इतने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण अपने साथ जमीन अधिग्रहण, लोगों के विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान जैसी कई नई चुनौतियां भी लेकर आता है.

दूसरी तरफ, सूखा सिर्फ पानी की कमी की समस्या नहीं है, बल्कि ये जल प्रबंधन की कमजोरियों से भी जुड़ा हुआ है. भूजल का लगातार गिरता स्तर, पानी की बर्बादी, खराब सिंचाई व्यवस्था और स्थानीय जल स्रोतों की अनदेखी ने कई इलाकों में संकट को और गहरा किया है.

इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (IWMI) की रिसर्च में तर्क दिया गया है कि केवल नदियों का रास्ता बदल देना या उन्हें आपस में जोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा. भारत के जल संकट का स्थायी समाधान नदी जोड़ो परियोजनाओं के साथ-साथ बेहतर जल प्रबंधन, वर्षा जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जल स्रोतों को मजबूत करने जैसे उपायों पर भी निर्भर करेगा.

यानी असली चुनौती सिर्फ ज्यादा पानी वाले क्षेत्रों से कम पानी वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने की नहीं, बल्कि देश में पानी के इस्तेमाल और संरक्षण के पूरे सिस्टम को बदलने की है.

क्या टिकाऊ जल समाधान का रास्ता स्थानीय स्तर से निकलेगा?

भारत के जल संकट का समाधान सिर्फ बड़े बांधों, लंबी नहरों और River Interlinking Project जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स में ही छिपा है, ये जरूरी नहीं है. नीति आयोग का मानना है कि देश को बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन (Decentralized Water Management) पर भी उतना ही ध्यान देना होगा.

इसके लिए Rainwater Harvesting यानी वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों जैसे तालाब, बावड़ी और जोहड़ों का पुनर्जीवन, छोटे बांधों और चेक डैम का निर्माण, जल संरक्षण तकनीकों का इस्तेमाल और भूजल रिचार्ज जैसे उपाय बेहद प्रभावी साबित हो सकते हैं. ये तरीके कम लागत वाले होने के साथ-साथ स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ज्यादा टिकाऊ भी माने जाते हैं.

भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में हर इलाके की पानी की समस्या अलग है. कहीं बाढ़ से निपटने की जरूरत है तो कहीं भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है. ऐसे में एक ही बड़े समाधान के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जल प्रबंधन की रणनीति बनाना ज्यादा कारगर हो सकता है.

आखिरकार, पानी सिर्फ इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा मुद्दा है. जब तक गांव और शहर अपने जल स्रोतों को बचाने, बारिश के पानी को संजोने और भूजल को दोबारा भरने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक कोई भी महंगा प्रोजेक्ट भारत को स्थायी जल सुरक्षा नहीं दे पाएगा.

शायद भविष्य का सही रास्ता कुदरत से टकराने में नहीं, बल्कि उसके जल चक्र को समझकर उसके साथ तालमेल बिठाने में है. 

वीडियो: संगम के पानी पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट, प्रयागराज की नदियों का पानी नहाने लायक नहीं?

Advertisement