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IMEEC के लिए 3.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश करने जा रहा भारत, सभी बंदरगाहों को जोड़ेगा

देश के किसी भी हिस्से से इन 8 बंदरगाहों तक 36 घंटे के अंदर पहुंचने का इंतज़ाम हो रहा है.

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भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुई G20 समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने IMEEC की घोषणा की थी. (फोटो क्रेडिट -पीटीआई)

भारत - मध्य पूर्व - यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEEC) का काम शुरू होने जा रहा है. भारत में इसके तहत 3.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ कई परियाजनाएं शुरू होंगी. इन्हें हाल ही में मंजूरी मिली है. इसमें सोन नगर-अंडाल लिंक अपग्रेड परियोजना को भी शामिल कर लिया गया है. पहले सोन नगर से अंडाल होते हुए दानकुनी तक ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर EDFC के तहत 540 किलोमीटर लंबी डबल रेलवे लाइन डाली जानी थी. लेकिन DFC के बाकी सेक्शंस की तरह कर्ज़ लेने की जगह केंद्र ने इसे पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप से बनाना चाहा. लेकिन 2006 में DFCCIL के गठन के बाद से अब तक सोनगर से दानकुनी के बीच EDFC एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाया. अब खबर आई है कि रेलवे इस सेक्शन को खुद बनाएगा. प्रोजेक्ट की लंबाई कुछ कम कर दी गई है. अब ये सोन नगर से दानकुनी की बजाय अंडाल पर खत्म होगा. लंबाई 540 की जगह 400 किलोमीटर रह गई है.

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लौटते हैं IMEEC पर. टाइम्स ऑफ इंडिया ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के हवाले से बताया कि भारत अपने 8 अहम बंदरगाहों तक पहुंचने के रास्ते को सुधारने के लिए अपना निवेश बढ़ाएगा. ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि देश के किसी भी हिस्से से इन बंदरगाहों तक 36 घंटे के अंदर पहुंचा जा सके. फिर IMEEC के जरिए अपना माल पश्चिमी एशिया और यूरोप में तेजी से भेजा जा सके.

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क्या है IMEEC?

IMEEC एक आर्थिक कॉरिडोर होगा. ये कॉरिडोर भारत को मध्य एशिया और यूरोप तक जोड़ने का काम करेगा. सबसे पहले भारतीय बंदरगाहों से जहाज के जरिए संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह तक माल भेजा जाएगा. फिर यहां से ट्रेन के जरिए इजरायल के हाइफा तक माल जाएगा. आखिर में ये सामान फिर जहाज़ पर सवार होकर इटली, फ्रांस, ब्रिटेन के साथ ही पूरे यूरोप और आगे अमेरिका में पहुंचाया जाएगा.

IMEEC की घोषणा दिल्ली में G20 Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की थी. इस परियोजना में भारत के साथ अमेरिका, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, यूरोपियन यूनियन (EU), इटली और फ्रांस शामिल हैं. दावा किया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट के पूरे होने से भारत और यूरोप के बीच व्यापार लगभग 40 प्रतिशत तक ‘तेज’ हो सकता है.

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हमने इस मुद्दे पर एक्सपर्ट्स से भी बात की. मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान MPIDSA में एसोसिएट फेलो डॉ. स्वस्ति राव ने हमें बताया कि इस प्रोजेक्ट से जियोपॉलिटिक्स पर क्या असर पड़ेगा.

"पिछले 2-3 साल से हम सुनते आ रहे हैं कि हमें अपने सप्लाई चेन्स को मजबूत करना है. उसको ध्यान में रखते हुए ही ये प्रोजेक्ट प्लान किया गया है. चीन का 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' सिर्फ एक इकोनॉमिक प्रोग्राम नहीं है. इसके द्वारा चीन ने एक पॉलिटिकल पकड़ भी बनाई है. अलग-अलग देशों की जमीन को लीज़ पर ले लिया गया है. जब दुनिया को ये समझ में आया, तब सोचा गया कि इसके विकल्प के रूप में हम क्या दे सकते हैं. ये India-Middle East-Europe Economics Corridor इसका ही एक विकल्प है. G7 देश ऐसे कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं."

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