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US वीजा जांच: कॉग्निजेंट के बहाने क्या फिर खतरे में है भारतीयों का 'अमेरिकन ड्रीम'?

US Visa Investigation: H-1B वीजा पर अमेरिकी सख्ती का असर क्या भारतीयों के सपनों पर पड़ेगा? वीजा फ्रॉड की जांच में Cognizant जैसी बड़ी IT कंपनी का नाम सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका में नौकरी का रास्ता अब और मुश्किल होने वाला है. जानिए H-1B वीजा सिस्टम, कथित धोखाधड़ी, जांच और उन हजारों भारतीय प्रोफेशनल्स पर पड़ने वाले संभावित असर की पूरी कहानी.

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H-1B वीजा में 'धोखाधड़ी' की जांच और कॉग्निजेंट का नाम (फोटो-AI)

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  • अमेरिकी न्याय विभाग ने H-1B वीजा प्रक्रिया में कथित दुरुपयोग और धोखाधड़ी की जांच शुरू की है, जिसमें आईटी कंपनी कॉग्निजेंट सहित कई कंपनियों के नियम उल्लंघन के आरोप शामिल हैं।
  • H-1B वीजा नियमों के उल्लंघन की जांच का कारण कुछ कंपनियों द्वारा फर्जी नौकरी के ऑफर देकर वीजा प्राप्त करना और शेल कंपनियों के माध्यम से गलत सूचना देना बताया गया है।
  • जांच में गड़बड़ी साबित होने पर अमेरिकी प्रशासन कंपनियों पर जुर्माना लगा सकता है और कर्मचारियों के वीजा की स्थिति प्रभावित हो सकती है, जिससे भारतीय आईटी पेशेवरों पर असर पड़ सकता है।

क्या अमेरिका जाने का सबसे बड़ा रास्ता अब मुश्किल होने वाला है? क्या H-1B वीजा, जिसे लाखों भारतीय अपना ड्रीम टिकट मानते हैं, अब पहले जैसा नहीं रहेगा? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि अमेरिका में H-1B वीजा के कथित दुरुपयोग और धोखाधड़ी को लेकर बड़ी जांच चल रही है. अमेरिकी न्याय विभाग (Department of Justice, USA) के मुताबिक इस जांच की जद में आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनी कॉग्निजेंट भी आ गई है. 

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मामला सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है जिसके भरोसे हर साल हजारों भारतीय प्रोफेशनल अमेरिका में नौकरी का सपना पूरा करते हैं. ऐसे में अमेरिकी प्रशासन की बढ़ती सख्ती का असर कितना बड़ा हो सकता है और क्या भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए नियम अब और कठिन होने वाले हैं, यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है.

जांच के घेरे में 'सिस्टम' और कॉग्निजेंट का नाम

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक पूरा विवाद H-1B वीजा नियमों के कथित उल्लंघन से जुड़ा है. अमेरिकी एजेंसियों को शक है कि कुछ आईटी कंपनियों ने वीजा प्रक्रिया में नियमों का ठीक से पालन नहीं किया. इसी वजह से कॉग्निजेंट का नाम भी जांच के दायरे में आया है. कंपनी इन आरोपों से इनकार कर रही है, लेकिन अमेरिकी जांच एजेंसियों का मानना है कि मामला किसी एक गलती का नहीं, बल्कि सिस्टम में लंबे समय से चली आ रही खामियों का हो सकता है. यही वजह है कि अब बहस सिर्फ कॉग्निजेंट तक सीमित नहीं रही. सवाल ये उठ रहा है कि कहीं H-1B वीजा प्रोग्राम का इस्तेमाल विदेशी कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह सस्ते विदेशी प्रोफेशनल्स को लाने के लिए तो नहीं कर रही थीं?

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बेंगलुरु में एचआर फर्म चलाने वाली सलोनी के मुताबिक यहीं से कहानी सबसे अहम मोड़ लेती है. लल्लनटॉप से बात करते हुए सलोनी सवाल उठाती हैं,

अगर जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो सबसे बड़ा झटका आखिर किसे लगेगा? कंपनियों को या उन हजारों भारतीय इंजीनियरों और आईटी प्रोफेशनल्स को, जो इस वक्त H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं? 

ये सिर्फ सलोनी के सवाल नहीं हैं. यही सवाल आज अमेरिका में बैठे हर भारतीय कर्मचारी के मन में घूम रहा है.

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USCIS के नियमों के मुताबिक अगर किसी कंपनी पर गंभीर वीजा उल्लंघन साबित होता है, तो उसका असर सिर्फ कंपनी तक सीमित नहीं रहता. ऐसे मामलों में कर्मचारियों का वीजा स्टेटस भी प्रभावित हो सकता है. अमेरिकी प्रशासन कंपनी पर भारी जुर्माना लगा सकता है, भविष्य में वीजा स्पॉन्सरशिप पर रोक जैसी कार्रवाई कर सकता है और कुछ मामलों में कर्मचारियों के वर्क परमिट पर भी असर पड़ सकता है. 

हालांकि, हर कर्मचारी का वीजा अपने आप रद्द नहीं हो जाता और हर मामले में अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाती है. फिर भी अगर बड़ी संख्या में कर्मचारियों की नौकरियां प्रभावित होती हैं, तो कई लोगों को नया स्पॉन्सर ढूंढना पड़ सकता है या अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है. यही वजह है कि इस जांच को सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य से जुड़ा मामला माना जा रहा है.

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अमेरिकी सपने को ग्रहण? (फोटो- बिजनेस टुडे)

'एनालिटिकल स्टोरी' - वीजा फ्रॉड का खेल कैसे चलता है?

अब सवाल ये है कि आखिर H-1B वीजा फ्रॉड होता कैसे है? इसके लिए अक्सर जिस तरीके की चर्चा होती है, उसे आसान भाषा में 'शेल कंपनी' का खेल कहा जाता है. यानी ऐसी कंपनी, जो कागजों में तो मौजूद होती है, लेकिन असल में उसका कारोबार या तो बहुत सीमित होता है या होता ही नहीं. ऐसी कंपनियां कथित तौर पर फर्जी जॉब ऑफर तैयार करती हैं. उम्मीदवार उन दस्तावेजों के आधार पर H-1B वीजा के लिए आवेदन करता है. अगर वीजा मिल भी जाए, तो अमेरिका पहुंचने पर कई बार पता चलता है कि जिस नौकरी का वादा किया गया था, वह है ही नहीं या फिर उसकी शर्तें पूरी तरह अलग हैं. इसी तरह के कथित नेटवर्क को कई बार 'वीजा मिल' भी कहा जाता है, जहां असली कारोबार नौकरी नहीं, बल्कि वीजा हासिल कराना होता है.

अमेरिकी एजेंसी ICE के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई छोटी कंपनियां जांच के दायरे में आई हैं, जिन पर फर्जी जॉब पोर्टल और नकली भर्ती प्रक्रिया के जरिए वीजा हासिल कराने का आरोप लगा. जांच एजेंसियों का कहना है कि ऐसे नेटवर्क कथित तौर पर उम्मीदवारों से मोटी रकम वसूलते हैं और उन्हें अमेरिका में नौकरी का भरोसा दिलाते हैं. ऐसे में अगर कोई कंपनी या एजेंट बिना उचित चयन प्रक्रिया के H-1B वीजा की 'गारंटी' देने लगे, बदले में लाखों रुपये मांगे या जल्दी वीजा दिलाने का दावा करे, तो इसे खतरे की घंटी समझिए. क्योंकि H 1B वीजा किसी एजेंट की गारंटी से नहीं, बल्कि अमेरिकी नियमों और वैध नियोक्ता की स्पॉन्सरशिप के आधार पर मिलता है. ऐसे वादे अक्सर धोखाधड़ी का शुरुआती संकेत साबित हो सकते हैं.

भारतीयों के लिए क्यों है चिंता की बात?

H-1B वीजा की इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा किरदार भारतीय प्रोफेशनल्स का है. Pew Research Center के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल जारी होने वाले H-1B वीजा में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे बड़ी रहती है. यानी अमेरिका की टेक इंडस्ट्री में भारतीय टैलेंट की मौजूदगी कितनी मजबूत है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है. लेकिन यही बड़ी हिस्सेदारी अब एक चुनौती भी बन रही है.

क्योंकि जब भी अमेरिका में H-1B वीजा के नियमों पर बहस छिड़ती है, उसकी सबसे तेज आंच भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स तक पहुंचती है. अमेरिका में 'बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन' जैसी नीतियों को लेकर चर्चा पहले से तेज है. ऐसे में अगर जांचों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी साबित होती है, तो सरकार वीजा प्रक्रिया को और सख्त कर सकती है, कंपनियों की निगरानी बढ़ा सकती है या नियमों में ऐसे बदलाव कर सकती है जिनका असर भविष्य में अमेरिका जाने का सपना देखने वाले हजारों भारतीय युवाओं पर पड़े.

सवाल सिर्फ H-1B वीजा की संख्या का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का भी है जिसके दम पर लाखों युवा अपनी पढ़ाई, करियर और भविष्य की योजनाएं अमेरिका से जोड़ते हैं.

युवाओं के लिए आगे की राह

अगर आप भी अमेरिका में करियर बनाने का सपना देख रहे हैं, तो इस वक्त सबसे जरूरी चीज है सावधानी. किसी भी कंपनी, एजेंट या कंसल्टेंट के बड़े-बड़े दावों पर आंख बंद करके भरोसा मत कीजिए. अमेरिका के विदेश विभाग की सलाह भी यही है कि वीजा प्रक्रिया को खुद समझें, अपने दस्तावेजों की पूरी जांच करें और ऐसे किसी भी रास्ते से बचें जहां नियमों को तोड़कर जल्दी सफलता का लालच दिया जा रहा हो. क्योंकि वीजा के सफर में एक गलत दस्तावेज या एक गलत फैसला सिर्फ आवेदन को नहीं, बल्कि पूरे करियर को प्रभावित कर सकता है.

लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भी है. H-1B सिर्फ एक वीजा नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की उम्मीद है जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई, मेहनत और भविष्य को इससे जोड़ा है. अगर सिस्टम में मौजूद खामियों को दूर करने के लिए सख्ती होती है, तो शुरुआत में कुछ परेशानियां जरूर आ सकती हैं, लेकिन लंबे समय में एक साफ और पारदर्शी व्यवस्था उन्हीं लोगों के लिए बेहतर होगी जो अपनी योग्यता और मेहनत के दम पर आगे बढ़ना चाहते हैं.

अमेरिका का सपना अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन अब इस सपने तक पहुंचने का रास्ता पहले से ज्यादा समझदारी, तैयारी और ईमानदारी मांगता है. नियमों को समझिए, सही जानकारी रखिए और याद रखिए, दुनिया में कोई भी शॉर्टकट उस भरोसे से बड़ा नहीं होता जो आपकी मेहनत और आपकी काबिलियत बनाती है.

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