हिमालय में एक ऐसी तबाही हुई है, जिसने सिर्फ नेपाल और चीन के बीच कारोबार का रास्ता नहीं मिटाया, बल्कि चीन के उस बड़े रेलवे सपने पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसे बीजिंग करीब एक दशक से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्यिरोंग लैंड पोर्ट का बड़ा हिस्सा बाढ़, मलबे और चट्टानों की चपेट में आकर तबाह हो गया. कभी यहां से सामान, पर्यटक और कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्री गुजरते थे, अब तस्वीरों में सिर्फ मलबा नजर आ रहा है.
नेपाल की बाढ़ में बहा चीन का 'काठमांडू रेलवे' वाला सपना! भारत के लिए क्यों खतरनाक है ये प्रोजेक्ट?
Nepal-Tibet Border Flood 2026: नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्यिरोंग पोर्ट की तबाही ने चीन के काठमांडू रेलवे प्रोजेक्ट पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 72 किलोमीटर से ज्यादा लंबे नेपाली हिस्से का करीब 98.5 फीसदी हिस्सा सुरंगों और पुलों से गुजरना है. ऐसे में हिमालय की बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़े जोखिम इस महत्वाकांक्षी BRI प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं.

एक बंदरगाह गया, तो सवाल रेलवे पर क्यों?
इस तबाही की गंभीरता को समझने के लिए 26 अगस्त की घटना पर लौटना होगा. लैंगटांग इलाके में ग्लेशियर और चट्टानों से जुड़ी घटना के बाद पानी, कीचड़ और मलबे का तेज बहाव नदियों में आया और नेपाल के कई इलाकों को अपनी चपेट में ले गया. चीन की तरफ ग्यिरोंग पोर्ट भी बुरी तरह प्रभावित हुआ. रॉयटर्स (Reuters) की रिपोर्ट के मुताबिक इस आपदा में नेपाल और चीन के इलाकों में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और 5,000 से अधिक लोग अभी लापता हैं.
ग्यिरोंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2015 के नेपाल भूकंप के बाद झांगमु-कोदारी मार्ग को नुकसान पहुंचने पर चीन-नेपाल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते की तरफ शिफ्ट हुआ. इंडिया टुडे (India Today) की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 तक ग्यिरोंग चीन-नेपाल व्यापार के करीब 30 फीसदी हिस्से को संभाल रहा था. यानी ये सिर्फ सीमा चौकी नहीं थी, बल्कि नेपाल की चीन से जुड़ी आर्थिक लाइफलाइन थी.
2016 का रेलवे प्लान, लेकिन जमीन पर कितना काम?
अब असली सवाल उस रेलवे का है, जिसका सपना 2016 में देखा गया था. चीन की योजना तिब्बत के शिगात्से से रेलवे को ग्यिरोंग होते हुए नेपाल की राजधानी काठमांडू तक लाने की है. 2018 में इसे BRI के ‘ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क’ (Trans-Himalayan Multi-Dimensional Connectivity Network) का हिस्सा बनाया गया और 2019 में BRI फोरम के स्तर पर भी इसे आगे रखा गया.
नेपाल वाला हिस्सा करीब 72.25 किलोमीटर का है. लेकिन इसकी मुश्किल लंबाई में नहीं, भूगोल में है. चीन की प्री-फीजिबिलिटी स्टडी के मुताबिक करीब 98.5 फीसदी हिस्सा सुरंगों या पुलों से गुजरना होगा. नेपाल सेक्शन की अनुमानित लागत 2.75 अरब डॉलर रखी गई थी. काठमांडू पोस्ट (The Kathmandu Post) के मुताबिक 2026 में भी फीजिबिलिटी स्टडी का काम चल रहा था और निर्माण शुरू नहीं हुआ था.
अब सवाल सिर्फ इंजीनियरिंग का नहीं
ग्यिरोंग की तबाही ने दिखा दिया है कि हिमालय में सड़क, सुरंग, पुल, हाइड्रोपावर और रेलवे को सिर्फ इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट मानना कितना जोखिम भरा हो सकता है. यहां भूस्खलन, भूकंपीय गतिविधि, ग्लेशियर और अचानक आने वाली बाढ़ एक ही सिस्टम का हिस्सा हैं.
यही वजह है कि विशेषज्ञ अब सीमा पार हाइड्रोलॉजिकल स्टडी, ग्लेशियल झीलों की निगरानी और रियल टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत बता रहे हैं. सवाल ये नहीं है कि चीन रेलवे बना सकता है या नहीं. सवाल ये है कि क्या ऐसी संवेदनशील जगह पर रेलवे बनाने से पहले प्रकृति के सबसे खराब संभावित परिदृश्य को पर्याप्त गंभीरता से समझा गया है.
क्योंकि हिमालय में गलती सिर्फ एक पुल या सुरंग नहीं बहाती. उसका असर नेपाल से निकलकर भारत तक पहुंच सकता है. और ग्यिरोंग की तबाही शायद चीन-नेपाल रेलवे के लिए पहला बड़ा संकेत है कि कागज पर बनी कनेक्टिविटी और जमीन की हकीकत में बहुत बड़ा फर्क होता है.
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