गृह मंत्रालय के आदेश के मुताबिक आईटी एक्ट, 2000 की धारा 69 के सब सेक्शन 1 के अनुसार देश की 10 सुरक्षा एजेंसियों को किसी कंप्यूटर में जेनरेट, ट्रांसमिट, रिसीव और स्टोर की गई किसी जानकारी को इंटरसेप्ट, मॉनिटर और डिक्रिप्ट करने के की अनुमति दी गई है. कुछ ज्यादा भारी भरकम शब्द हो गए न? चलिए आसान भाषा में बताते हैं.
तो बात ये है कि सरकार ने खुफिया एजेंसियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किसी भी कंप्यूटर की जांच का अधिकार दे दिया है. सरकार के इस फैसले के बाद केवल अधिसूचित एजेंसीज ही आपके कंप्यूटर की इस तरह की जांच कर सकती हैं. आदेश के मुताबिक सभी सर्विस प्रोवाइडर्स और कंप्यूटर से जुड़े लोगों को जांच करने वाली एजेंसी का सहयोग करना पड़ेगा. अगर ऐसा नहीं किया गया तो सजा और जुर्माने का प्रावधान है.

सरकार द्वारा जारी अधिसूचना.
पहले जान लीजिए कि वो 10 एजेंसीज कौनसी हैं जिन्हें सरकार ने ये अधिकार दिया है:
1. इंटेलीजेंस ब्यूरो 2. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो 3. प्रवर्तन निदेशालय 4. सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज 5. डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस 6. सीबीआई 7. एनआईए 8. कैबिनेट सचिवालय (रॉ) 9. डायरेक्टोरेट ऑफ सिग्नल इंटेलीजेंस 10.दिल्ली पुलिस कमिश्नर
ये अधिसूचना जारी किए जाने के बाद से ही पूरा विपक्ष सरकार के फैसले के खिलाफ हंगामा कर रहा है. विपक्षी पार्टियों के टॉप लीडर्स ने ट्वीट कर इस मामले पर अपनी राय रखी है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट करते हुए इसे निजता के अधिकार पर हमला बताया. उन्होंने कहा,'अबकी बार, निजता पर वार.'
कांग्रेस देश को गुमराह कर रही है. अच्छा होता विपक्ष कोई मुद्दा उठाने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल कर लेता. जिन नियमों के आधार पर हमने यह कदम उठाया है, वह 2009 में यूपीए सरकार के वक्त बने थे. आतंकवाद और देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला लिया गया है.

अरुण जेटली ने ट्वीट कर सरकार की तरफ से स्थिति साफ़ की.
अरुण जेटली ने कहा कि इस तरह के नियम पहले से हैं. इस आदेश में केवल ये बताया गया है कि वो एजेंसीज कौन सी हैं जो इस तरह की निगरानी कर सकती हैं. अरुण जेटली का कहना सही है, लेकिन अगर इस पावर का मिसयूज़ किया गया तो निश्चित तौर पर ये घातक सिद्ध हो सकता है. अरुण जेटली का कहना है कि अगर एजेंसीज के नाम नहीं नोटिफाई किए जाते तो कोई भी पुलिस अधिकारी जांच करने के इस अधिकार का प्रयोग कर सकता था. ऐसी किसी भी कंप्यूटर की निगरानी से पहले होम सेक्रेटरी की मंज़ूरी ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि यूपीए 2 के दौरान पी. चिदंबरम ने टैक्सेशन अथॉरिटी को इस तरह की जांच के अधिकार दिए जाने का समर्थन किया था. अरुण जेटली का मानना है कि कांग्रेस पार्टी बोलती पहले है और सोचती बाद में है. यहां किसी की ऐसे ही जांच के आदेश नहीं दिए गए हैं. राष्ट्रहित में इस तरह के नियम पहले से मौजूद हैं लेकिन अब सिर्फ उन एजेंसीज के नाम जारी किए गए हैं जिनके पास ऐसा करने का अधिकार होगा. ये नियम यूपीए के दौरान भी मौजूद थे. अगर ऐसा नहीं होगा तो उन आतंकवादियों को कैसे ट्रेस किया जा सकेगा जो आईटी में माहिर हैं.

भारत के राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना.
क्या है आईटी एक्ट की धारा-69?
आईटी एक्ट 2000 की धारा 69 के मुताबिक अगर केंद्र सरकार को लगता है कि देश की सुरक्षा, अखंडता, दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण रिश्ते बनाए रखने या अपराध रोकने के लिए किसी डेटा की जांच की जरूरत है, तो वह संबंधित एजेंसी को इसके निर्देश दे सकती है. और इस फैसले का भी यही मतलब है कि सरकार संदेह होने पर किसी भी शख्स के कंप्यूटर में घुसकर देख सकती है कि वो क्या कर रहा है, क्या देख रहा है, क्या सुन रहा है और उसके कंप्यूटर में कौन सी ऐसी चीजें हैं, जो देश के लिए खतरा हो सकती हैं.
तो अब बात ये है कि सरकार आपका कंप्यूटर कभी भी और कहीं से भी चेक कर सकती है. आप उसको मना भी नहीं कर सकते हैं. फैसले के निहितार्थ क्या हैं, आप खुद समझ लीजिए, क्योंकि आप खुद समझदार हैं.
























