रायन स्कूल में बच्चे का मर्डर. फिर दिल्ली के स्कूल में चपरासी ने बच्ची का रेप किया. इन ख़बरों ने बच्चों की हिफाज़त पर सवाल खड़े कर दिए. लेकिन ये समस्या कोई एक दो दिन पहले नहीं पनपी है. समाज में सेक्स एजुकेशन की कमी इसकी बड़ी वजह है. बच्चों के साथ अगर कुछ गलत होता है तो वो घर में डर की वजह से कुछ बता नहीं पाते.इसी साल जुलाई में 10वीं की एक स्टूडेंट ने दिल्ली के सरकारी स्कूल में एक बच्चे को जन्म दिया था. क्योंकि उसका पड़ोसी रेप करता था. लड़की का पेट फूला तो घर वाले यही समझते रहे थे कि उसे कोई बीमारी है. लड़की ने टाइम से पहले ही एक बच्चे को जन्म इसलिए दे दिया था, क्योंकि आरोपी ने उसे प्रेग्नेंसी ख़त्म करने के लिए दवाई खिला दी थी. जब बच्चे को जन्म दिया तो घर वाले भी पूरा मामला जानकर दंग रह गए थे.
NCERT ने एक फैसला लिया है. फैसला ये है कि NCERT अब किताबों के ज़रिए बच्चों को बैड टच और गुड टच के बारे में बताएगी, ताकि बच्चों को हिंसा और सेक्शुअल हमलों से बचाया जा सके. NCERT के निदेशक ऋषिकेश श्रीवास्तव का कहना है कि सिलेबस में बदलाव नए सेशन से दिखेगा. इसके तहत NCERT की सभी किताबों में कवर पेज के पीछे बैड टच और गुड टच के बारे में जानकारी रहेगी.

दिल्ली सरकार ने 2015 में गुड टच और बैड टच के बारे में तीन हिंदी पोस्टर जारी किए थे (Source : @apki_sakhi Twitter)
बहुत अच्छा. NCERT को ये काम बहुत पहले शुरू कर देना चाहिए था. दिल्ली सरकार ने एक बार गुड टच और बैड टच के बारे में पोस्टर जारी किए थे. ऐसे प्रयास लगातार किए जाने चाहिए ताकि बच्चों को इन हालातों से निपटने में मदद मिले. अब किताबों में तो बच्चों को पढ़ा दिया जाएगा लेकिन उन रिश्तेदारों का क्या जो घर में ही मौजूद होते हैं. बच्चों को इज्ज़त का हवाला देकर बहला लेते हैं. NCERT अपना काम तो कर देगी लेकिन आगे ज़िम्मेदारी पेरेंट्स की भी है.
सेक्शुअल हैरेसमेंट पर हुआ एक सर्वे
ह्यूमन राइट्स के लिए काम करने वाली संस्था 'वर्ल्ड विजन इंडिया' ने इसी साल एक रिपोर्ट पेश की. इस संस्था ने बच्चों के साथ होने वाले सेक्शुअल हैरेसमेंट पर एक सर्वे किया. इस सर्वे में देशभर के विभिन्न हिस्सों के 45,844 बच्चों को शामिल किया गया था. इस सर्वे के मुताबिक हर 5 में से 1 बच्चा खुद को यौन उत्पीड़न के प्रति महफूज नहीं महसूस करता. 4 में से 1 परिवार ने बच्चे के साथ हुए यौन शोषण की शिकायत नहीं की और 12-18 साल का हर दूसरा बच्चा सेक्शुअल हैरेसमेंट का शिकार है.इस सर्वे पर यकीन किया जाए तो कितनी खतरनाक है ये स्थिति. मुस्लिम समाज से आता हूं. अक्सर गांवों में देखा है, मां-बाप ये तो ध्यान रखते हैं कि बच्चा स्कूल गया है या नहीं. लेकिन ये ध्यान नहीं रखते कि आज उसने स्कूल में क्या किया. रास्ते में कौन लोग उसे मिले. किसी ने तंग तो नहीं किया. बल्कि बच्चे के अंदर इतना खौफ भर दिया जाता है जैसे उसे स्कूल नहीं भेजा जा रहा बल्कि सज़ा दी जा रही है.

एक सर्वे के मुताबिक 12 से 18 साल का हर दूसरा बच्चा सेक्शुअल हैरेसमेंट का शिकार है. (Photo : REUTERS)
अगर लड़की स्कूल जाती है तो घर में बाप तो बेटी से बात भी नहीं करता. लड़की खाना परोसती है. बाप उससे डांटकर कहता है खाना दे दिया, पानी कौन रखेगा. पानी लेकर आ. लड़की दौड़ी जाएगी और पानी रखकर अंदर बैठ जाएगी. क्या मजाल जो बाप से ये कह सके कि पापा मुझे ये दिक्कत है या वो आदमी मुझे परेशान करता है.बच्ची के दिमाग में इतना खौफ भरा होता है कि अगर उसके साथ कुछ गलत हो भी जाए तो वो बताएगी नहीं. डरेगी कि उसका बाप उसे ही डांटेगा. ये सिर्फ लड़कियों के साथ ही नहीं होता लड़कों के साथ भी होता है. क्योंकि बाल मन है. उनको ये तो समझा दिया जाता है कि घर की इज्ज़त क्या होती है. ये नहीं बताया जाता कि अगर कोई रिश्तेदार उनको गलत तरीके से टच करता है तो ये घर की इज्ज़त से जुड़ा मसला नहीं बल्कि क्राइम है. उसे छिपाए नहीं. बल्कि घर में बताएं ताकि वो रिश्तेदार दोबारा ऐसी हरकत न करे. इस सिचुएशन में गलती रिश्तेदार की है. बच्चे की नहीं. मगर सेक्शुअल हैरेसमेंट के शिकारी बच्चों को धमका देते हैं कि घर में न बताना नहीं तो पापा मारेंगे तुम्हारे या फिर मैं सबको बता दूंगा या जान से मार दूंगा.
सेक्शुअल हैरेसमेंट के शिकार बच्चे की मानसिक स्थिति बहुत गंभीर होती है. ऐसे में अगर उन्हें डांटा जाए या फिर किसी तरह का दबाव बनाया जाए तो अपनी बात शेयर करते हुए घबराएंगे. बच्चे को इस घिनौने अपराध का शिकार होने से बचाने के लिए उसके साथ दोस्त जैसा व्यवहार करें. उससे समय-समय पर स्कूल में क्या हो रहा और उसके प्रति शिक्षक का कैसा व्यवहार है, ये जानने की कोशिश करें.
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