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कुंठित लड़कों की वो बीमारी जो पूरा देश तबाह कर सकती है

इन लड़कों की भीड़ के बीच खड़े होकर आज के भारत को समझना थोड़ा आसान होगा.

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जिन नौजवानों की नौकरी नहीं लगती, वो कुंठा और निराशा से भर जाते हैं. (सांकेतिक फोटो)
gaurav solanki
गौरव सोलंकी IIT रुड़की से पढ़कर इंजीनियर हुए, लेकिन मन किस्सों-कहानियों और कविताओं में रमा रहा. तहलका में काम कर चुके हैं. हिंदी के चर्चित युवा कवियों और कहानीकारों में उनकी गिनती होती है. उनकी कविताओं का शिल्प खुरदुरा है और कलेवर तीखा. सोशल टैबूज़ पर उनका लिखा पढ़ने लायक है. फिलहाल मुंबई में पाए जा रहे हैं. आज पढ़िए उनका लिखा एक लेख जो उन्होंने अपनी फेसबुल वॉल पर पोस्ट किया था.



तो बात यह है कि हिंदुस्तान में अगर किसी वक़्त 10 GB इंटरनेट इस्तेमाल हो रहा हो तो एक अनुमान के मुताबिक उसमें से करीब 7 GB तक पॉर्न के लिए होगा. दिलचस्प बात यह भी है कि हमारे कॉलेजों से हर साल करीब 10 लाख इंजीनियर निकलते हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत - यानी करीब 7 लाख के लिए कोई नौकरी नहीं है. और बात नौकरियों की ही चली है तो याद रहे कि भारत को हर साल कम से कम 2 करोड़ नई नौकरियों की ज़रूरत है, लेकिन फ़ॉर्मल सैक्टर में काम है बस 2 लाख लोगों के लिए. इस तरह पीछे छूटते जाते हैं करोड़ों लोग - जिनमें लड़के ज़्यादा हैं - नाराज़ और कभी-कभी आवारा लड़के. लड़कियां भी हैं पर उनकी अलग मुश्किलें हैं, उन पर कमाने की अभी इतनी ज़िम्मेदारी नहीं.
इन लड़कों की भीड़ के बीच खड़े होकर आज के भारत को समझना थोड़ा आसान होगा और तब शायद इतना अजीब नहीं लगेगा कि 15000 से ज़्यादा लोग 'बोल ना आंटी आऊं क्या' के फ़ेसबुक इवेंट पेज पर कहते हैं - आई एम गोइंग. उनमें से कई सौ कनॉट प्लेस जाकर चिल्ला-चिल्लाकर यह गाना गाते भी हैं. वे उस लकीर पर खड़े हैं, जहां किसी का मज़ाक उड़ाना और उसका फ़ैन बनना एक हो जाता है. और इस लकीर पर बहुतों को पता नहीं कि यह गाना रेप की धमकी के करीब खड़ा है. बहुतों को पता भी है, पर तब यही तो है जो वे चाहते हैं.
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हम भीड़ बनकर किसी भी पागलपन में शामिल हो जाते हैं (सांकेतिक फोटो)

फिर क्विंट की एक रिपोर्टर जवाब में रैप बनाती है और आख़िर पूरा प्रोग्रेसिव तबका गाने को यूट्यूब से हटवाने में कामयाब भी हो जाता है और लॉजिकली तो पागलपन यहां ख़त्म होना था, लेकिन ठीक यहीं से शुरू होता है. फ़ेसबुक पर और बड़ी भीड़ जुटती है, क्विंट को डाउनरेट किया जाता है और 2 दिन के अंदर उस लड़की को मिलते हैं 50,000 से ज़्यादा एब्यूसिव मैसेज जिनमें करीब इतनी ही बार रेप या हत्या की धमकियां भी हैं.
यह बस एक किस्सा है. ऐसे दर्जनों किस्से हर हफ़्ते हैं और है करोड़ों लड़कों की भीड़. भारत दुनिया का सबसे जवान देश है, औसत उम्र - करीब 29. और प्लान तो ये था कि हमें महान होना था. अभी कुछ साल पहले ही तो आईएमएफ़ ने कहा था कि भारत इतना जवान है कि अगले 20 साल तक जीडीपी हर साल एक्स्ट्रा 2 प्रतिशत बढ़ सकती है.
पर हम पागल हो गए हैं. अब तो इसमें कोई शॉक वैल्यू भी नहीं कि हम भयानक तरह से भटक गए हैं. इक्कीसवीं सदी कम से कम उस देश की तो नहीं हो सकती जिसे हर साल 2 करोड़ नौकरियां चाहिए पर उसके पास हैं बस 2 लाख.
A worker separates casting joints of gearboxes inside a small-scale automobile manufacturing unit in Ahmedabad, India, October 12, 2015. REUTERS/Amit Dave/File Photo
भारत में बेकारी के चलते कई लोगों को छोटे-मोटे काम करने पड़ते हैं. (फोटोःरॉयटर्स)

कुछ ऐसा ही राहुल गांधी ने कहा हाल में - और कहा उन्होंने सॉरी वाले लहजे में ही - पर उस ग़लती के सॉरी पर कोई क्या रीएक्ट करे जिसने एक पूरे देश से उसका भविष्य और वर्तमान छीन लिया हो. वही ग़लती जो पिछले 3 साल में और भी बड़ी होती गई. और हममें से करोड़ों ऐसे हो गए, जो काम कर सकते हैं, जो काम करना चाहते हैं - पर कोई काम है कहां?
बलात्कार की धमकियां देने वाली और बलात्कार करने वाली, कभी गाय के नाम पर - कभी कुरान के नाम पर पागल होती इस भीड़ को कोसना ज़रूरी तो है पर हम अक्सर इसी पर क्यों रुक जाते हैं? क्या इसलिए कि इसकी मूल वजह बहुत डरावनी है? क्या हमीं सबसे बड़े विक्टिम हैं? ख़ुद को समझदार समझने वाले हम - जो इन ट्रोल्स से नफ़रत करते हैं, अपने तबके के लोगों की हत्याओं पर भड़क उठते हैं, नए कानून बनाने की जुनूनी मांगें करते हैं और हिंसा का विरोध करते-करते हर दिन ज़्यादा हिंसक होते जाते हैं.
कितनी बार पूछते हैं हम ख़ुद से या किसी और से - कि यह नाराज़ और आवारा भीड़ बढ़ती क्यों जा रही है? खाली बरतन की तरह इधर से उधर घूमते बहुत सारे लड़के जो ख़ुद भी इसी मर्दवादी समाज के विक्टिम हैं. जो सिर्फ़ इसलिए अपने परिवार और समाज की परिभाषा में ठीक से मर्द नहीं हैं क्योंकि शाम को 100 रुपए भी कमाकर नहीं ला पाते. जो सेक्शुअली कुंठित हैं क्योंकि शादियों के बाज़ार में उनका खरीददार कोई नहीं. क्योंकि उनमें ऐसा कुछ नहीं जो उन्हें प्रगतिशील या पारम्परिक, किसी भी परिभाषा में लड़कियों के लिए डिज़ायरेबल बनाए. और हैरत नहीं कि वे अपने भीतर समूची इंसानियत से नफ़रत करते हैं और कभी-कभी रोते भी हैं.
हम हर साल कितने लाख सोश्योपैथ बनाते हैं, किसी को नहीं मालूम.
भारत में पढ़ाई का स्तर लगातार गिरा है
भारत में पढ़ाई का स्तर लगातार गिरा है

हर 2 में से 1 बच्चा कुपोषण का शिकार है और यह समझने के लिए विज्ञान की डिग्री नहीं चाहिए कि क्यों इनमें से बहुत सारे बच्चे बड़े होकर तर्क नहीं कर पाते और तर्क नहीं समझ पाते. क्यों इन्हें बरगलाना आसान होता है, क्यों ये झूठे इतिहास पर गर्व करते हैं और धर्म की छाया चुनते हैं, भले ही वह इन्हें मार डाले. हम वॉट्सऐप पर ज़्यादा भरोसा करते हैं क्योंकि एजुकेशन का तो भट्टा सरकारों ने ऐसा बिठाया है कि उस पर बौखलाए बिना बात करना बहुत मुश्किल है. दुनिया के 75 देशों के छात्रों पर किए गए एक सर्वे में भारत 74वें नम्बर पर रहा. सर्व शिक्षा अभियान का बेड़ा नेताओं और अधिकारियों ने इस कदर गर्क किया है कि सरकारी स्कूलों के पांचवीं क्लास के आधे बच्चे 75 में से 74 नहीं घटा सकते. इसीलिए बड़े होकर पूछ भी नहीं सकते कि वर्ल्ड बैंक से मिले हज़ारों करोड़ कहां गए?
ऐसी बहुत सारी बातें हैं और ये धीरे-धीरे ज़्यादा बोरिंग होती जाती हैं. इसीलिए हम अक्सर इन पर बात नहीं करते. हम अपने-अपने हिस्से का पैसा कमाते हैं और तभी बोलते हैं, जब यह भीड़ हममें से किसी को घेर लेती है या मार डालती है.

बुक रिव्यू: लिंकन इन द बारदो

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