The Lallantop

फिल्म रिव्यू: शुभ मंगल ज़्यादा सावधान

ये एक गे लव स्टोरी है, जो बनाई इस मक़सद से गई है कि इसे सिर्फ लव स्टोरी कहा जाए.

Advertisement
post-main-image
फिल्म के एक सीन होमोफोबिया से जूझ रही जनता को सारकास्टिक टेड टॉक देते आयुष्मान खुराना. इस फिल्म को हितेश केवल्या ने डायरेक्ट किया है.
फिल्म 'शुभ मंगल ज़्यादा सावधान' एक गे लव स्टोरी है. लेकिन बनाई इस मक़सद से गई है कि इसे सिर्फ लव स्टोरी कहा जाए. अमन और कार्तिक नाम के दो लड़कों की कहानी जो दिल्ली में हैं. और एक-दूसरे के साथ प्रेम में भी. वहां ये एक लड़की को घर से भगाते हैं और फिर खुद ही भागकर अमन के घर इलाहाबाद पहुंच जाते हैं. यहां हो रही है अमन की बहन रजनी उर्फ गॉगल की शादी. एक लड़की, मम्मी-पापा ने अमन के लिए भी देखी हुई है. लेकिन अमन शादी में पहुंचता है अपने बॉयफ्रेंड के साथ. पहले तो लोग इन्हें दोस्त समझते हैं. लेकिन एक दिन इनके गे होने की बात सबके सामने आ जाती है. इसके बाद मचता है पूरे घर में कोहराम. मम्मी-पापा और सोसाइटी कार्तिक और अमन की जोड़ी को स्वीकार करती है कि नहीं? यही फिल्म की कहानी है.
फिल्म के एक सीन में अपने पिटते बॉयफ्रेंड को पिता से बचाता अमन. यानी जीतेंद्र कुमार.
फिल्म के एक सीन में अपने पिटते बॉयफ्रेंड को पिता से बचाता अमन. यानी जीतेंद्र कुमार.

आयुष्मान खुराना ने फिल्म में कार्तिक नाम के लड़के का रोल किया है. वो जो कर सकते हैं, उस लिहाज़ से अब भी वो अपने कंफर्ट ज़ोन में खेल रहे हैं. लेकिन अच्छा खेल रहे हैं. इस फिल्म में नाक में बढ़िया नोज़रिंग वगैरह डालकर फिज़िकल लेवल पर वो थोड़े ज़्यादा एक्टिव लगते हैं. बाकी स्वैग तो है ही. उनके बॉयफ्रेंड अमन का रोल किया है जीतेंद्र कुमार ने. जीतेंद्र फिल्म को रिलेटेबल बनाते हैं. उनकी पर्सनैलिटी बिलकुल बॉय नेक्स्ट डोर वाली है. उन्हें देखकर लगता है कि ये वाकई किसी भी रेगुलर बंदे की कहानी हो सकती है. साथ में गजराज राव और नीना गुप्ता की हिट जोड़ी भी है. जो बिलकुल बुल्स आई हिट करती है. जिस आदमी को स्क्रीन पर आप सबसे ज़्यादा एंजॉय करेंगे, वो हैं मनु ऋषि चड्ढा. ये भाई साहब पूरी फिल्म कुछ भी कह रहे हों. उस पर आपको हंसी न आए, ऐसा हो नहीं सकता. इन्होंने अमन के चाचा का रोल किया है.
गजराज राव और नीना गुप्ता. इनका पर्सनल इक्वेशन और बैकस्टोरी भी फिल्म की काफी मदद करती है.
गजराज राव और नीना गुप्ता. इनके किरदारों का पर्सनल इक्वेशन और बैकस्टोरी भी फिल्म की काफी मदद करती है.

आज कल किसी भी सोशल मसले पर बनी फिल्म में हर बात वन-लाइनर हो जाती है. कभी-कभी वो वन-लाइनर्स क्लिक करते हैं, तो कई बार रह जाते हैं. जिस फिल्म में इस कॉमिक एलीमेंट के साथ थोड़ी गंभीरता रहती है, वो फिल्म दूसरे लेवल पर चली जाती है. अगर आप शूजीत सरकार की 'अक्टूबर' देखेंगे, तो ये चीज बेहतर तरीके से पकड़ में आएगी. 'शुभ मंगल...' में ये बात थोड़ी सी खलती है. लेकिन आप एंजॉय करते हैं. आपकी एंजॉयमेंट में खलल डालता है फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर. ऐसा लगता है, वो हर पंचलाइन के बाद आपको बताता है कि इस पर हंसना था. कम से कम ये तो हमें तय करने दीजिए कि कहां हंसना है. फिल्म का म्यूज़िक काफी औसत है. यहां भी टोटल चार में से दो रीमिक्स गाने हैं. जिसमें से 'अरे प्यार कर ले', फिल्म के माहौल से मैच करता है.
आयुष्मान को स्टेशन छोड़ने जाते मनु ऋषि चड्ढा. इसी रास्ते में वो सवाल पूछा जाता है, जो होमोसेक्शुएलिटी के बारे में सबसे ज़्यादा पूछा जाता है.
आयुष्मान को स्टेशन छोड़ने जाते मनु ऋषि चड्ढा. इसी रास्ते में वो सवाल पूछा जाता है, जो होमोसेक्शुएलिटी के बारे में सबसे ज़्यादा पूछा जाता है.

कुछ चीज़ें फिल्म देखते वक्त समझ नहीं आती हैं. जैसे फिल्म का ओपनिंग सीक्वेंस. यहां दो लड़के एक लड़की को भगा रहे हैं. उसके पीछे कि क्या कहानी थी या आगे क्या हुआ, ये बताने का लोड ही नहीं लिया गया. ऐसे में वो सीन फिल्म में एक्स्ट्रा और बेमाना लगता है. वो भी तब जब उस लड़की रोल में आपने एक बड़े नाम को कास्ट किया है. फिल्म में काली गोभी का अविष्कार करने वाले सबप्लॉट का क्या मतलब था? पता चले तो बताइएगा. ये फिल्म इलाहाबाद में बेस्ड है. लेकिन रेलवे स्टेशन के अलावा कैमरा आपको कहीं ये महसूस नहीं होने देता. इलाहाबाद में कई सारी जगहें हैं, जो तिग्मांशु धुलिया ने पहले ही पॉपुलर कर रखी हैं. यहां कैमरा घर से बाहर निकलता ही नहीं है. और घर में भी फ्रेम लोगों से पटा पड़ा रहता है.
क्रांतिकारी सीन. लेकिन इसे फिल्म में बहुत रिपीटिटीव तरीके से इस्तेमाल किया जाता है.
क्रांतिकारी सीन. लेकिन इसे फिल्म में बहुत रिपीटिटीव तरीके से इस्तेमाल किया जाता है.

ये फिल्म एक ज़रूरी और प्रासंगिक मुद्दे को पब्लिक में ले जाना चाहती है. ताकि उस पर और बात हो. जैसे फिल्म में एक सीन है, जहां अमन और कार्तिक बाइक पर जा रहे होते हैं. उनकी गाड़ी रेड लाइट पर रुकती है. उनकी बगल में एक दूसरा कपल भी बाइक पर है. ये बहुत ही प्यारा सीन है. कुछ एक सीक्वेंस काफी रियल और फनी लगते हैं. जैसे एक सीन में मनु ऋषि शर्ट पहनते हुए कमरे से बाहर निकलते हैं और गजराज को आवाज़ लगाकर कहते हैं- ''भाई साहब, बाहर लाठीचार्ज होने वाला है, आइए देखने चलते हैं". इस फिल्म को देखने के बाद 'परेशानी' शब्द का मतलब मेरे लिए बदल चुका है.
फिल्म का सबसे प्यारा बाइक वाला सीन. जिसके बारे में ऊपर अपन ने बात की थी.
फिल्म का सबसे प्यारा बाइक वाला सीन. जिसके बारे में ऊपर अपन ने बात की थी.

'शुभ मंगल ज़्यादा सावधान' अपने नाम की ही तरह बहुत सारी सावधानियां बरतती हुई चलती है. इसे गेशिप या होमोसेक्शुएलिटी का मुद्दा भी अच्छे से कैरी करना है. और उसे बहुत बड़ी जनता तक भी पहुंचाना है. इस फिल्म की तुलना आप हितेश केवल्या की ही लिखी हुई फिल्म 'शुभ मंगल सावधान' से कर सकते हैं. यहां का सेट अप भी काफी सेम है. छोटे शहर की फैमिली, जिसके लिए सबसे बड़ा इशू ये है कि चार लोग क्या कहेंगे. भरा-पूरा परिवार. रोज सुबह-शाम का फैमिली ड्रामा. ये सब यहां भी है. लेकिन पिछले वाक्य में जो 'भी' है, सारी बात वहीं आकर अटकती है. लेकिन ये फिल्म जो करना चाहती थी, वो कर देती है. आपको हंसाना. हंसाते हुए बताना कि गे होना कोई बीमारी या अप्राकृतिक चीज़ नहीं है. जैसे आप आईएएस ऑफिसर बनते हैं, वैसे आप गे नहीं बन सकते. आप अपनी उन्मुखता लेकर पैदा होते हैं. सिर्फ किसी के कह देने या मान लेने से कोई बात गलत नहीं हो जाती. अगर फिर भी कोई नहीं मानता, तो उन्हें इस गाने का स्पॉटिफाई लिंक भेजकर चिल मारिए!

Advertisement
Advertisement