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शहबाज शरीफ सच बोलिए, जम्मू-कश्मीर का 'काला दिन' 27 अक्टूबर नहीं, 22 अक्टूबर है

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक्स पर एक पोस्ट लिखी है. पोस्ट में बताया गया है कि 27 अक्टूबर जम्मू-कश्मीर के इतिहास का 'काला दिन' है. क्योंकि साल 1947 में इसी दिन इंडियन एयर फोर्स श्रीनगर में दाखिल हुई थी.

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पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ (बाएं) का खुला झूठ. महाराजा हरि सिंह और उनकी पत्नी महारानी तारा देवी (दाएं). (Courtesy-इंडिया टुडे)

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  • पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 27 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के इतिहास का 'काला दिन' बताया और अपनी तारीफ में एक्स पर एक पोस्ट लिखी।
  • 1947 में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा ऑपरेशन गुलमर्ग के तहत कबायली हमलों के कारण भारतीय वायु सेना को श्रीनगर में प्रवेश करना पड़ा था।
  • भारत ने हरि सिंह के भारत में विलय के Instrument of Accession पर हस्ताक्षर के बाद 27 अक्टूबर को श्रीनगर में वायुसेना को प्रवेश दिया, जिसके बाद पूरा क्षेत्र भारतीय नियंत्रण में आ गया।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक्स पर एक लंबी-चौड़ी पोस्ट लिखी है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री दफ्तर से किए गए इस पोस्ट का मजमून ये है कि 27 अक्टूबर जम्मू-कश्मीर के इतिहास का ‘काला दिन’ है. क्योंकि साल 1947 में इसी दिन इंडियन एयर फोर्स श्रीनगर में दाखिल हुई थी.

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शहबाज शरीफ ने पोस्ट में आधा सच लिखा. उन्होंने ये नहीं लिखा है कि 27 अक्टूबर, 1947 को भारत की एयर फोर्स को श्रीनगर में आखिर दाखिल क्यों होना पड़ा था. सच्चाई शहबाज शरीफ को भी पता है, पूरे पाकिस्तान को भी और हिंदुस्तान को भी, कि ये पाकिस्तान की ही कारस्तानी थी. उसने जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन गुलमर्ग के तहत कबिलाई पश्तूनों से हमला करवाया था और जिसका जवाब भारतीय वायु सेना को देना पड़ा था.

जम्मू-कश्मीर के इतिहास का काला दिन किसे बताया?

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अपनी सत्ता बचाने के लिए अपनी अवाम को धोखा दे रहे हैं. और बता रहे हैं कि 27 अक्टूबर जम्मू-कश्मीर के इतिहास का ‘काला दिन’ है, जबकि हकीकत ये है कि जम्मू-कश्मीर के इतिहास का काला दिन 22 अक्टूबर है. वो तारीख, जब आजादी के बाद भी जम्मू-कश्मीर हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं था. 

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वो एक स्वतंत्र रियासत थी, जिसके राजा महाराज हरि सिंह थे. 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ था तो इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट के तहत रियासतों के शासकों को अपनी मर्जी से भारत या पाकिस्तान के साथ जाने का अधिकार दिया गया था. लेकिन जम्मू-कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह ने तय किया कि वो किसी के साथ नहीं जाएंगे. तब उन्होंने यही सोचा था कि दोनों देशों के साथ उनक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट बना रहेगा. यानी कि दोनों देशों के साथ वो यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे. तब पाकिस्तान ने भी उस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए थे.

लेकिन पाकिस्तान बना ही था धर्म के आधार पर. और जम्मू-कश्मीर में इस्लाम धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में थे, जबकि उन पर शासन एक हिंदू राजा का था. तो उस माहौल में कुछ मुस्लिम नेताओं ने टैक्स न देने का अभियान चलाया और खासकर पुंछ क्षेत्र में सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया. वहीं पाकिस्तान ने भी जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते माहौल का फायदा उठाया और हथियारबंद भाड़े के सैनिकों के जरिए सीमावर्ती गांवों में छापामार हमले शुरू कर दिए. तब राजा हरि सिंह ने पाकिस्तान सरकार को संदेश भेजा और कहा कि पाकिस्तान को उन घुसपैठियों को रोकना चाहिए जो रियासत में हमले कर रहे हैं.

पाकिस्तान का ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’

पाकिस्तान ने तब फिर से महाराजा हरि सिंह को प्रस्ताव दिया कि वो पाकिस्तान के साथ आ जाएं. खुद मोहम्मद अली जिन्ना ने इसकी पेशकश की थी. इसके लिए बाकायदा अपने प्राइवेट सेक्रेटरी खुर्शीद अहमद खुर्शीद को अक्टूबर की शुरुआत में ही श्रीनगर भेजा गया था. लेकिन हरी सिंह नहीं माने तो खुर्शीद ने 12 अक्टूबर 1947 को जिन्ना को संदेश भेजा कि हरि सिंह नहीं मान रहे हैं और श्रीनगर पर कब्जे के लिए पाकिस्तान को जंग ही करनी पड़ेगी. तब कबायलियों को हथियार देकर जम्मू-कश्मीर में दाखिल करवाने का आइडिया भी खुर्शीद ने ही दिया था और बताया था कि इस काम के लिए रावलपिंडी में तैनात मेजर खुर्शीद अनवर मुफीद आदमी हैं.

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इसके बाद पाकिस्तान ने एक ऑपरेशन लॉन्च किया जिसका नाम रखा गया ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’. ऊपरी तौर पर पाकिस्तान ने दिखावा किया कि ये कबायली हमलावरों की करतूत थी, जबकि असल बात ये थी कि पाकिस्तान इस खुफिया ऑपरेशन के जरिए जम्मू-कश्मीर पर हमला करके श्रीनगर पर कब्जा करना चाहता था.

पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर 22 अक्टूबर को ये हमला किया था, जिसमें हजारों कबायली लड़ाकों के साथ पाकिस्तान की सेना ने मुजफ्फराबाद की ओर बढ़ना शुरू किया. तब उस मिलिट्री प्लान का अहम हिस्सा रहे और पाकिस्तानी सेना से रिटायर्ड मेजर जनरल अकबर खान ने भी अपनी किताब में इस बात की तस्दीक की है.

जब राजा हरि सिंह ने मांगी भारत से मदद

इंडिया टुडे में छपी प्रभाष के दत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना का अंतिम लक्ष्य श्रीनगर पर कब्जा था. तब हरि सिंह के पास इतनी बड़ी सेना नहीं थी कि वो पाकिस्तान का मुकाबला कर सकें. जो सेना थी, उसमें भी बहुत से लोग पाकिस्तान का ही साथ देने लगे और अपने ही लोगों पर अत्याचार करने लगे.

तब आम लोगों को लूटा गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हत्याएं की गईं और यहां तक कि अस्पतालों को भी निशाना बनाया गया. कश्मीरी प्रतिरोध के नायकों में से एक शहीद मकबूल शेरवानी की सिर्फ इसलिए बेरहमी से हत्या कर दी गई, क्योंकि हमलावरों ने शेरवानी से श्रीनगर हवाई अड्डे का रास्ता पूछा था और उनके मंसूबे भांपकर शेरवानी ने पाकिस्तानी सेना को रास्ता भटका दिया था. जब हमलावरों को धोखे का पता चला, तो उन्होंने शेरवानी की हत्या कर दी.

जब हरि सिंह को इस बात का यकीन हो गया कि उनकी सेना अब ये हमला नहीं संभाल पाएगी तो उन्होंने भारत से मदद मांगी. भारत सरकार तैयार हुई. हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की संधि पर हस्ताक्षर किए जिसे तकनीकी भाषा में इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन कहा जाता है. इसके साइन होने के बाद भारत की वायु सेना 27 अक्टूबर को श्रीनगर में दाखिल हुई और फिर वो हुआ, जिसे पाकिस्तान कभी भूल नहीं पाया. 8 नवंबर तक पूरा श्रीनगर भारतीय सेना के नियंत्रण में आ गया और पाकिस्तान के मंसूबे ध्वस्त हो गए.

लेकिन उसकी टीस पाकिस्तान को अब भी सालती है. लिहाजा जब जम्मू-कश्मीर के लोग पाकिस्तान के हमले वाली तारीख यानी कि 22 अक्टूबर को अपने राज्य का काला दिन मानते हैं तो पाकिस्तान चाहता है कि दुनिया उसके झूठ पर भरोसा करे और कहे कि 22 अक्टूबर नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर के लिए 27 अक्टूबर काला दिन है. 

यही मनवाने के लिए अभी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने एक्स पर ये लंबा-चौड़ा पोस्ट भी किया है. लेकिन वो इस पोस्ट में ये बताना भूल गए हैं कि 27 अक्टूबर से पहले 22 अक्टूबर की भी एक तारीख आती है. और 27 अक्टूबर, 22 अक्टूबर को हुई उसी गुस्ताखी का नतीजा है. 

ये स्टोरी अविनाश राय ने लिखी हैं. 

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