क्यों हो रही है हड़ताल?

किसानों ने तय किया है कि वो भले ही दूध फेंक देंगे, लेकिन इसे शहर में नहीं पहुंचने देंगे. जिसे ज़रूरत है वो गांव में आएगा और किसान की तय कीमत पर दूध खरीदेगा.
किसानों ने इस देश में जब भी आंदोलन किया है, उनकी कुछ ही मांगें रही हैं. किसानों की ऋण माफी, फसलों की लागत के आधार पर डेढ़ गुना कीमत, छोटे किसानों की आय तय करना, एक उम्र के बाद किसानों को हर महीने एक निश्चित रकम देना, फल, सब्जी और दूध के दाम भी लागत के आधार पर डेढ़ गुना कीमत और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना. जब भी देश में आंदोलन हुआ है, इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रखकर किया गया है. इस बार के आंदोलन में भी यही मांगें हैं.
हर बार से क्यों अलग है इस बार का किसान आंदोलन

अपनी इन्हीं मांगों को लेकर तमिलनाडु के किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दे रहे थे. कई दिनों के धरने के बाद उनकी आधी-अधूरी मांगे मानी गईं और उन्होंने धरना खत्म कर दिया था.
कहने के लिए तो पूरे देश में किसानों के 100 से ज्यादा छोटे-बड़े संगठन हैं. हर बार ये संगठन अलग-अलग अपने-अपने कार्यक्षेत्र में आंदोलन करते हैं. कई बार इन्हें आश्वासन मिलता है, कई बार इनकी कुछ मांगें मान ली जाती हैं और कई बार बर्बरता के साथ इनके आंदोलन को कुचल दिया जाता है. लेकिन इस बार राष्ट्रीय किसान महासंघ की अगुवाई में 100 से ज्यादा किसान संगठनों ने इस हड़ताल को समर्थन दिया है. इसके अलावा इस बार का किसान आंदोलन देश के 21 राज्यों में शुरू हुआ है. इनमें मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और महाराष्ट्र के अलावा यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल और कई दूसरे राज्यों के किसान भी शामिल हैं. किसान सब्जियां, फल और दूध मुफ्त में गांववालों को बांट रहे हैं. वहीं कुछ जगहों पर किसान दूध को एक जगह पर इकट्ठा करके उससे मिठाइयां बनवा रहे हैं और उसे किसानों में बांट रहे हैं.
फिर मध्यप्रदेश की चर्चा क्यों हो रही है?

मंदसौर में पिछले साल 6 जून को किसानों का आंदोलन हिंसक हो गया था. इसके बाद पुलिस ने गोलियां चला दी थीं, जिसमें छह किसानों की मौत हो गई थी.
इसकी दो वजहें हैं. पहली वजह तो ये है कि मध्यप्रदेश में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं. दूसरी सबसे बड़ी वजह 6 जून 2017 की तारीख है. इस दिन मध्यप्रदेश के मंदसौर में पुलिस की गोली से सात किसानों की मौत हो गई थी. ये किसान अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे थे. सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए गोलियां चलाई थीं, जिसमें 6 की मौत हुई थी और सैकड़ों किसान घायल हो गए थे.
क्या है किसानों की रणनीति

मान लीजिए कि एक कंपनी फ्रिज बनाती है. तो उस फ्रिज के दाम तय करने का अधिकार उस कंपनी को ही तो होता है. कोई और तो उसके दाम नहीं तय कर सकता. इसी तरह से अगर गेहूं, धान, दाल, सब्जियां, दूध, फल या फिर कोई भी अनाज अगर किसान पैदा करता है, तो फिर उसके दाम तय करने का अधिकार भी तो किसानों के पास ही होना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है. वहीं किसान कोई मनमानी रकम भी नहीं मांग रहे हैं. उनका कहना है कि किसी भी अनाज, फल, सब्जी या दूध को तैयार करने में जितनी लागत लगती है, उसका डेढ़ गुना उन्हें दे दिया जाए. लेकिन इसके लिए न तो सरकार तैयार है और न ही लोग. किसान भी इस बात को जानते हैं. इसी को देखते हुए किसानों ने नई रणनीति अपनाई है.
किसानों ने तय किया है कि-
-एक जून से लेकर छह जून तक शहरों को भेजी जाने वाली सब्जी, फल और दूध की खेप नहीं भेजी जाएगी. भले ही किसानों को इसका नुकसान उठाना पड़े, लेकिन शहर में लोगों को इसकी आपूर्ति नहीं होने देंगे.
-6 जून को मंदसौर में मारे गए किसानों की बरसी है. उस दिन देश भर के किसान मंदसौर पहुंचकर मारे गए किसानों को श्रद्धांजलि देंगे और विरोध दर्ज कराएंगे.
-8 जून को असहयोग दिवस मनाया जाएगा. किसान सरकार की किसी बात को मानने से इन्कार करेंगे, लेकिन इस दौरान किसी तरह की हिंसा नहीं होगी.

6 जून 2017 की हिंसा में कई किसान घायल हो गए थे.
-10 जून को दोपहर दो बजे तक पूरा भारत बंद करवाया जाएगा.
-इस पूरे आंदोलन के दौरान फल, दूध और सब्जी की आपूर्ति बंद ही रहेगी.
-अगर किसी को फल, दूध और सब्जी चाहिए होगी, तो वो गांव में आएंगे. उनके लिए स्टॉल लगे होंगे, जहां किसान अपने लिहाज से कीमतें तय कर अपना सामान बेचेंगे.
और सरकार हर तरह के हथकंडे अपना रही है

पिछली बार गोलीकांड से बैकफुट पर आई सरकार ने इस बार किसानों के आंदोलन से निपटने के लिए लाठी-डंडे, आंसू गैस और वॉटर कैनन का इंतजाम किया है.
किसानों का आंदोलन देश के 21 राज्यों में है, लेकिन सबसे ज्यादा सतर्कता मध्यप्रदेश में बरती जा रही है. इसकी वजह 6 जून 2017 की वो तारीख ही है, जिस दिन मंदसौर में पुलिस की गोली से 6 किसानों की मौत हो गई थी. इस बार किसानों के आंदोलन में फायरिंग न करनी पड़े, इसके लिए मध्यप्रदेश पुलिस ने राज्य के 35 संवेदनशील जिलों के लिए 10,000 लाठी और डंडे खरीदे हैं. इसके अलावा इन जिलों में 5,000 पुलिस के अतिरिक्त जवान तैनात किए गए हैं. उन्हें हेलमेट, चेस्ट गार्ड और सुरक्षा के तमाम उपकरण मुहैया करवाए गए हैं. इसके अलावा पुलिस ने मध्यप्रदेश के 1200 लोगों को प्रतिबंधात्मक नोटिस जारी किया है. इस नोटिस के तहत ये लोग आंदोलन में शामिल नहीं हो सकते हैं. इसके लिए उनसे 25-25 हजार रुपये का बॉन्ड भी भरवाया गया है. कई जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. इसको लेकर सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ गुस्सा भी देखने को मिल रहा है.
क्या कर रहा है विपक्ष

यूपी के भट्टा पारसौल में किसानों के मुद्दे पर राहुल गांधी ने पदयात्रा की थी. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इसी मुद्दे पर राहुल गांधी को घेरा है.
विपक्षी पार्टियों ने कहने के लिए तो किसानों के आंदोलनों का समर्थन कर दिया है. हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने किसानों के इस आंदोलन को पूरी तरह से समर्थन दिया है. राहुल गांधी 6 जून को मंदसौर जाएंगे. वहां वो पीपलीमंडी में मारे गए किसानों के परिवारों से मुलाकात करेंगे और जनसभा करेंगे. वहीं सरकार ने इस पूरे आंदोलन को कांग्रेस प्रायोजित करार दिया है. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि जब भी चुनाव आते हैं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ऐसे आंदोलन करते रहते हैं.
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