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सीकर ग्राउंड रिपोर्ट: 'सरकार को घुटनों पर ला दिया, जरूरत पड़ी तो मुंह के बल गिरा देंगे'

14 सितंबर 2017. सीकर की सब्जी मंडी में सुबह से किसान जश्न के माहौल में हैं. 13 सितंबर की रात करीब छह दौर की वार्ता के बाद देर रात 12.50 बजे किसान सभा और चार मंत्रियों की कमेटी के बीच समझौता-वार्ता सफल रही. सीकर के लिए ये खबर महत्वपूर्ण थी, चुनांचे अखबारों के स्थानीय संस्करण रोक लिए गए थे. सुबह हर आदमी इन खबरों को उलट-पलटकर पढ़ रहा था.

सीकर सब्जी मंडी में अखबार पढ़ता एक किसान
सीकर सब्जी मंडी में अखबार पढ़ता एक किसान

इस आंदोलन के नेता अमरा राम और पेमा राम रात को मंत्रियों से बातचीत करने के बाद जयपुर में ही रुक गए थे. उन्हें सुबह 10 बजे तक सीकर की सब्जी मंडी लौटना था. किसान 1 सितंबर से इस मंडी में पड़ाव डाले हुए थे. यहां करीब 300 फीट लंबे और 20 फीट चौड़े दो टीन शेड हैं. इसमें से एक पर किसान सभा का मंच लगा हुआ. ये जगह किसानों के लिए सभा करने के काम आ रही है.

सीकर सब्जी मंडी में टीन शेड के नीचे सजा मंच
सीकर सब्जी मंडी में टीन शेड के नीचे सजा मंच

दूसरे टीन शेड में हर 10 फीट की दूरी पर राशन से लदे ट्रैक्टर खड़े हैं. ट्रैक्टर के ऊपर लाल रंग के बैनर हैं, जिन पर ‘आल इंडिया किसान सभा’ लिखा हुआ है. ये मजमून दूसरी लाइन पर बदल जाता है, जहां गांव का नाम लिखा हुआ है. किसान सुबह की चाय पीकर खाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं. पिछले 13 दिनों से वो इसी सब्जी मंडी में टिके हुए हैं. ये इस महापड़ाव में उनका आखिरी भोजन है. आंदोलन की सफलता के बाद महापड़ाव को उठा लेने की घोषणा हो चुकी है.

सीकर सब्जी मंडी में टीन शेड के बाहर खड़ा ट्रैक्टर और उस पर लगा पोस्टर
सीकर सब्जी मंडी में टीन शेड के बाहर खड़ा ट्रैक्टर और उस पर लगा पोस्टर

इस बीच अखबार में दर्ज रिपोर्ट को बार-बार पढ़ा जा रहा है. बावड़ी गांव के मालीराम भी अखबार पढ़ने में लगे हुए हैं. वो चिल्ला तो नहीं रहे हैं, लेकिन उनका सुर थोड़ा ऊंचा है, ताकि आस-पास बैठे उम्रदराज अनपढ़ किसान भी जान पाएं कि उनके आंदोलन के बारे में अखबार में क्या छपा है. मालीराम पढ़ते हैं-

’13 दिन आंदोलन, 65 घंटे चक्काजाम, 11.30 घंटे वार्ता के बाद किसानों ने जीती पहली लड़ाई’

बीच में बैठे मालीराम और उनके बगल में जगमाल, जिनका जिक्र आपको आगे मिलेगा
बीच में बैठे मालीराम और उनके बगल में जगमाल, जिनका जिक्र आपको आगे मिलेगा

किसान बड़े ध्यान से उनकी बात सुन रहे हैं. मालीराम उन्हें समझाते हैं कि सरकार ने 50,000 रुपए तक का कर्ज माफ़ करने की घोषणा की है. इसके लिए सरकार की एक कमेटी बनेगी. कमेटी एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. इसके बाद हर किसान का 50,000 रुपए तक का कर्ज माफ़ होगा. ये किसान पिछले 13 दिनों से अपने घर-बार छोड़कर यहां पड़े हुए थे. कुछ ही घंटों के भीतर अखबार में छपी बातें हर किसान की जुबान पर चढ़ गईं.

सीकर सब्जी मंडी में बैठे बतियाते किसान
सीकर सब्जी मंडी में बैठे बतियाते किसान

आप किसी भी किसान से बात करते, तो ’13 दिन, 65 घंटे और 11.30 घंटे की वार्ता’ का जिक्र उसकी बात में जरूर होता. ये सुबह का वक़्त था और ऐसा होने में अभी कुछ घंटों का समय था. हमने किसानों की गोलबंदी से इस आंदोलन के बारे में जानने की कोशिश की. मालीराम बताते हैं,

‘हम पिछले ढाई महीने से फसलों के भाव और कर्जे की माफ़ी के लिए प्रदर्शन कर रहे थे. जब अगस्त तक हमारी कोई सुनवाई नहीं हुई, तो किसान सभा ने महापड़ाव का निर्णय लिया. हम लोगों से इस महापड़ाव की तैयारी करने को कहा गया. हम अपने गांव के हर घर गए और हर घर से आटा जुटाया. गैस के सिलेंडर और भट्टी जुटाई. तेल-मसाले इकट्ठा किए. सोने के लिए जाजम ली. हम एक महीने की तैयारी के साथ आए थे. हमें पता था कि हमारी लड़ाई हमें अपने बूते पर लड़नी होगी. यहां बैठा हर आदमी घर से अपना राशन लेकर चला था. आज भी हमारे ट्रैक्टर में तीन बोरा आटा पड़ा हुआ है. हम आर-पार की लड़ाई के मूड में यहां आए थे.’

सीकर सब्जी मंडी में एक किसान
सीकर सब्जी मंडी में एक किसान

जब उनसे पूछा गया कि इस बचे हुए सामान का क्या किया जाएगा, तो उनका जवाब था कि बचे हुए का हलवा-पूरी बनाएंगे और इस जीत की ख़ुशी में सारे गांव के लोग मिलकर खाएंगे.

इस महापड़ाव में कितने लोग मौजूद थे, इसके बारे में हमारे सामने अलग-अलग दावे आए. 13 दिनों के इस महापड़ाव को समाज के दूसरे तबकों का भी समर्थन हासिल हुआ. पांच दफे अगल-अलग व्यापारी यूनियनों ने इस महापड़ाव में आए हुए लोगों के एक समय के खाने की व्यवस्था की. सीकर से 10 किलोमीटर दूर स्वामी केशवानंद सीनियर सेकेंडरी स्कूल है. इन्होंने सीकर के प्रिंस स्कूल के साथ मिलकर 7 तारीख की सुबह का खाना दिया था.

सीकर सब्जी मंडी में महापड़ाव में बैठे किसान
सीकर सब्जी मंडी में महापड़ाव में बैठे किसान

केशवानंद स्कूल के संचालक रामनिवास ढाका ने हमें बताया कि वो खुद किसान परिवार से आते हैं और उनके स्कूल में ज्यादातर किसानों के बच्चे पढ़ते हैं. ऐसे में प्रदर्शन में आए किसानों को खाना खिलाना उन्होंने अपना नैतिक कर्तव्य समझा.

सीकर की वो सब्जी मंडी, जहां किसानों ने महापड़ाव डाला था
सीकर की वो सब्जी मंडी, जहां किसानों ने महापड़ाव डाला था

इस खाने को बनाने वाले थे हलवाई शिवरतन. उन्होंने बताया कि कुल 35,000 चपातियां बनाई गईं. इसी अनुपात में सब्जी और मीठे के तौर पर बूंदी. शिवरतन कहते हैं कि कुल साढ़े पांच सौ किलो बूंदी बनाई थी. ये करीब छह हजार लोगों के लिए पर्याप्त खाना था. लोगों की गिनती के मामले में आप हलवाई पर जनगणना अधिकारी से ज्यादा भरोसा कर सकते हैं.

सीकर के महापड़ाव में आई महिलाएं
सीकर के महापड़ाव में आई महिलाएं

राजस्थान का गांधी है

लोग अमरा राम के जयपुर से लौटने का इंतजार कर रहे हैं. सभा-स्थल पर दर्जनों जगहों पर लोगों ने गोल घेरे बना लिए हैं और ताश खेलकर वक़्त गुजार रहे हैं. इस बीच सब्जी मंडी के दो नंबर गेट पर शोर सुनाई देता है. मंच की तरफ से ऐलान होता है कि आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कामरेड अमरा राम हमारे बीच आ चुके हैं. ताश की चलती बाजी समेट ली जाती है.

सीकर सब्जी में खड़ा डीजे
सीकर सब्जी में खड़ा डीजे

दो नंबर गेट से अमरा राम का काफिला सब्जी मंडी के भीतर घुसता है. सबसे आगे एक डीजे चल रहा है. इस पर तेज आवाज में गाना बज रहा है-

‘ध्यान लगाकर सुन’जो साथी,
बात बता दी रे, थाने बात बता दी रे.
बिजली माफ़ करावण खातर सभा लगा दी रे,
पेमो जी अमरो जी तगड़ी लहर चला दी रे.’

(ध्यान लगाकर सुनना साथी, आपको एक बात दी रे. बिजली माफ़ करवाने के लिए सभा लगा दी रे. पेमा राम और अमरा राम ने जबरदस्त लहर चला दी रे.)

गाड़ी के ऊपर अमरा राम
गाड़ी के ऊपर अमरा राम

इसके बाद एकाध गाड़ी और हैं. अमरा राम और पेमा राम एक काले रंग की खुली जीप में खड़े हैं. पीछे एक बोलेरो कैंपर पर नौजवान सवार हैं. नौजवान पूरा जोर लगाकर नारा लगा रहे हैं, ‘कामरेड अमरा राम को लाल सलाम.’ कुछ ही लोग इस नारे के जवाब दे पाते हैं. दरअसल डीजे पर बज रहे ‘पेमा जी-अमरा जी देखो सभा लगा दी रे’ के शोर में लाल सलाम का नारा कहीं दब गया है. हालांकि, नौजवान इससे कत्तई हताश नहीं दिखते और लगातार नारे लगाए जा रहे हैं.

सीकर सब्जी मंडी में नाचता एक किसान
सीकर सब्जी मंडी में आंदोलन की सफलता से खुश होकर नाचता एक किसान

इस बीच अमरा राम किसी समर्थक से माला पहनने के लिए गर्दन नीचे झुकाते हैं. वो माला पहनाता और बुलंद आवाज में नारा लगाता है, ‘अमरा नहीं ये आंधी है, राजस्थान का गांधी हैं.’ आंधी और गांधी की तुकबंदी वाला ये नारा राजनीतिक जलसों का सबसे बूढ़ा नारा होगा, लेकिन मार्क्सवादियों की सभा में ये नारा चौंकाने वाला है.

सीकर की मंडी में लहराता CPM का झंडा
सीकर की मंडी में लहराता CPM का झंडा

विभाजन को छोड़कर इतिहास का ऐसा कोई मौका नहीं है, जब इस देश का मार्क्सवादी आंदोलन गांधी का कड़ा आलोचक न रहा हो. मार्क्सवादी सत्याग्रह को लड़ाई का उपयोगी हथियार नहीं मानते. गांधीजी के ह्रदय का सिद्धांत मार्क्सवादियों के लिए मखौल का विषय रहा है.

सीकर मंडी में आंदोलन की सफलता खुश नाचते किसान
सीकर मंडी में आंदोलन की सफलता खुश नाचते किसान

इस आंदोलन को CPM का किसान मोर्चा ‘आल इंडिया किसान सभा’ लीड कर रहा था. बार-बार ये बात कही गई कि पूरे आंदोलन में एक भी लाठी नहीं चली. एक भी आदमी को खरोंच तक नहीं आई और अहिंसक तरीके से ये लड़ाई जीती गई. भीड़ में खड़े एक किसान ने हमें बताया,

‘जब एक तारीख को महापड़ाव में जुटने के बाद हम कलेक्ट्रेट का घेराव करने के लिए निकले, तो सब्जी मंडी के बाहर पुलिस ने बैरिकेड्स लगा रखे थे. मैंने एक से ज्यादा बार किसान सभा के प्रदर्शनों में भाग लिया है. पहले ऐसा होता था कि हम बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ जाते थे. उधर से पुलिस हमारे ऊपर लाठियां भांजती थी. इस बार हमारे नेताओं ने हमसे कहा कि हम कलेक्टर को घेरने के लिए जा रहे थे. लेकिन सरकार बैरिकेड लगाकर खुद हमारे पास आ गई है. इसके बाद हम बैरिकेड के पास ही बैठ गए. एक भी किसान बैरिकेड के पार नहीं गया और एक भी पुलिसवाला इस पार नहीं आया. इसके बाद हम पड़ाव में लौट आए. वो बैरिकेड प्रशासन और किसानों के बीच की सरहद थी. न कोई पुलिसवाला सब्जी मंडी के भीतर आता और न ही कोई किसान शहर में प्रदर्शन के लिए जाता.’

सीकर सब्जी मंडी में एक किसान
सीकर सब्जी मंडी में एक किसान

कितना सफल रहा ये किसान आंदोलन

अमरा राम मंच से बोल रहे थे और सामने खड़े लोग उनकी हर बात पर ताली बजा रहे थे. उन्होंने मंच से कहा, ‘आपकी इस 13 दिन की तपस्या के कारण आज सीकर ही नहीं, सूबे के हर किसान का 50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ़ हो जाएगा.’ अमरा राम का भाषण देने का अपना तरीका है. उनकी हिंदी में राजस्थानी शब्दों का पर्याप्त घालमेल है. उन्होंने जोश के साथ कहा,

‘फिर भी ये सरकार बड़ी मक्कार है. एक बार जानवर फाड़ने वाले कुत्ते के मुंह में लोही (खून) लग जाता है, तो फिर वो सुधरता नहीं है. उसके दांत ही तोड़ने पड़ते है.’

अपने दफ्तर में दी लल्लनटॉप के साथ बातचीत के दौरान अमरा राम
अपने दफ्तर में दी लल्लनटॉप के साथ बातचीत के दौरान अमरा राम

जानवर-खोर कुत्ता या ऊंट के मुंह में जीरा

अमरा राम की ये बात सुनकर भीड़ में बैठे जगमाल दोनों हाथ उठाकर ताली बजाते हैं. सभा से पहले हमसे बात करते हुए उन्होंने बताया था कि उनके पास कुल 16 बीघा जमीन है. किसान क्रेडिट कार्ड पर वो 3.57 लाख रुपए का कर्ज ले चुके हैं. जब उनसे पूछा गया कि 50 हजार रु. की कर्जमाफी से उन्हें कितनी राहत मिलेगी, इस पर उनका कहना था, ‘हमें उम्मीद थी कि सरकार हमारा सारा कर्ज माफ़ करेगी. फिर भी 50 हजार रुपए एक बड़ी राहत है.’ पास ही बैठा एक किसान बीच में बोल पड़ा, ’50 हजार रुपए से क्या होना है, इससे तो दाढ़ भी गीली नहीं होगी’.

सीकर सब्जी मंडी में समूह में बैठे किसान, पास में आटा गूंथा जा रहा है
सीकर सब्जी मंडी में समूह में बैठे किसान, पास में आटा गूंथा जा रहा है

मार्च 2015 में बर्फीले तूफ़ान ने पूरे उत्तर भारत को अपनी जद में ले लिया था. इससे पहले 2015 की खरीफ की फसल सूखे की भेंट चढ़ चुकी थी. फसल खराबे की वजह से पूरे उत्तर भारत में किसान आत्महत्या की खबरें अखबारों में छपने लगीं. उस समय खड़े हुए किसान आंदोलन में कर्ज-माफ़ी की मांग उठ रही थी.

तब केंद्र सरकार ने कर्ज-माफी तो नहीं की, लेकिन किसान क्रेडिट कार्ड पर मिलने वाले लोन की राशि बढ़ा दी. जून 2015 में केंद्र सरकार की तरफ से घोषणा की गई कि जहां पहले किसानों को प्रति हैक्टेयर 1.24 लाख रुपए फसली ऋण मिलता था, उसे बढ़ाकर 1.46 लाख रुपए कर दिया गया.

सीकर सब्जी मंडी में टीन शेड के नीचे बैठे हजारों किसान
सीकर सब्जी मंडी में टीन शेड के नीचे बैठे हजारों किसान

लगातार दुष्काल भुगत चुके किसानों के हाथ खाली थे. उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड पर इस योजना का भरपूर लाभ लिया. किसान क्रेडिट कार्ड पर लोन लेकर सूदखोरों के पैसे चुकाए. पिछली दो फसलों के पिट जाने के बाद ये कर्ज उन पर भारी पड़ रहा है. हमें ऐसे किसान भी मिले, जिन पर बैंकों का 6 से 8 लाख रुपए बकाया था. ऐसे में 50 हजार की माफ़ी एक फौरी राहत तो जरूर है, लेकिन इससे कोई स्थायी समाधान नहीं निकलने वाला.

सीकर सब्जी मंडी में एक बच्चा
सीकर सब्जी मंडी में एक बच्चा

आंदोलन की दूसरी बड़ी मांग थी ‘स्वामीनाथन कमेटी’ की सिफारिश लागू करवाना. सरकार ने किसान सभा को ये आश्वासन दिया कि वो इसके लिए केंद्र सरकार को लिखेगी. बहुत से राज्यों की सरकार पहले भी लिख चुकी है. सरकार का आश्वासन कोई नतीजा देगा, इसमें संदेह कायम है.

सीकर पहुंची महिलाओं को संबोधित करती एक महिला
सीकर पहुंची महिलाओं को संबोधित करती एक महिला

आंदोलन का तीसरा समझौता बिजली के दामों को लेकर हुआ है. फ़रवरी में बिजली की बढ़ी हुई कीमतों पर किसान सभा पहले ही सफल आंदोलन कर चुकी है. सरकार ने भी बिजली की बढ़ी हुई कीमतें रोलबैक कर ली थीं. इसे प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी लागू कर दिया गया है. इसे आंदोलन की जीत के रूप में दर्ज किया किया जा सकता है. लघु और सीमांत किसानों के खेत में ट्यूबवेल नहीं मिलते हैं. ऐसे में हाशिए के किसानों को बिजली की बढ़ी कीमतें घटाने से कोई ख़ास फायदा नहीं हुआ है.

ये किसान पहले खेतों में जूझते हैं और फिर सड़क पर सत्ता से.
ये किसान पहले खेतों में जूझते हैं और फिर सड़क पर सत्ता से.

सरकार ने किसान सभा को ये आश्वासन दिया है कि कर्ज न चुका पाने की वजह से किसी भी किसान की जमीन नीलाम नहीं होगी. ये इस आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है. अकेले सीकर में करीब 40,000 किसानों को बैंक की तरफ से जमीन नीलाम करने का नोटिस मिल चुका है. बैंक कर्ज न चुका पाने की वजह से नीलामी को फिलहाल टालने पर मजबूर हुए हैं.

14 दिनों की तपस्या के बाद इन किसानों को ये मुस्कान नसीब हुई है
14 दिनों की तपस्या के बाद इन किसानों को ये मुस्कान नसीब हुई है

इसके अलावा सरकार ने SC, ST और OBC के छात्रों की दो साल से रुकी हुई छात्रवृत्ति को फिर से बहाल करने की बात कही है. इसके लिए सरकार की तरफ से 1000 करोड़ का फंड रिलीज किए जाने की बात कही गई है. ये मांग 11 सूत्री मांगपत्र का हिस्सा नहीं थी. नौजवानों के रोजगार की मांग के बदले में इसे सांत्वना पुरस्कार के तौर पर समझा जा सकता है.

सीकर में महिलाओं के बीच एक बच्ची
सीकर में महिलाओं के बीच एक बच्ची

किसानों के लिए पेंशन भी इस आंदोलन की महत्वपूर्ण मांग थी. आंदोलनकारी 60 साल से अधिक उम्र के किसानों के लिए 5000 रुपए मासिक पेंशन की मांग कर रहे थे. सरकार की तरफ से 2 हजार रुपए की पेंशन पर विचार करने की बात कही गई है. ‘विचार करेंगे’ शब्द अपने-आप में संदिग्ध है.

इसके अलावा 60 साल से अधिक आयु के नागरिक के लिए सरकार पहले से वृद्धावस्था पेंशन योजना चला रही है. अभी तक ये साफ़ नहीं है कि जिस किसान पेंशन पर सरकार ने विचार करने की बात कही है, वो वृद्धावस्था पेंशन से अलग होगी या उसी में नत्थी कर दी जाएगी.

सीकर सब्जी मंडी में एक बुजुर्ग किसान
सीकर सब्जी मंडी में एक बुजुर्ग किसान

इसके अलावा आवारा पशुओं पर भी सरकार की तरफ से कुछ ठोस निकलकर नहीं आया है. सरकार ने सिर्फ उनका बेहतर बंदोबस्त करने की बात कही है. गाय के बछड़े को बेचने की उम्र तीन साल से घटाकर दो साल करने की बात सरकार ने मान ली है. दी लल्लनटॉप से बात करते हुए आंदोलन के नेता कामरेड अमरा राम ने कहा, ‘सरकार ने आवारा पशुओं संबंधी हमारी मांग पर पूरी तरह से हैंड्स-अप कर दिया.’

सरकार से हुई बातचीत के बारे में दी लल्लनटॉप को बताते अमरा राम
सरकार से हुई बातचीत के बारे में दी लल्लनटॉप को बताते अमरा राम

समझौता-पत्र पर किसानों की बहुत मांगे मानी नहीं गई हैं. हम इस बात से मुंह नहीं मोड़ सकते कि इस आंदोलन को चलते हुए ढाई महीने बीत चुके हैं. महापड़ाव में हजारों किसान सूबे में 13 दिन से घर-बार छोड़कर बैठे हुए थे. जब किसान सभा के नेता समझौते करके पहुंचे होंगे, तो इस आंदोलन को किसी तार्किक अंत तक ले जाने का दबाव उन पर भी काम कर रहा होगा.

सीकर सब्जी मंडी में CPM का झंडा
सीकर सब्जी मंडी में CPM का झंडा

फिर भी सूबे के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि किसानों के आंदोलन के दबाव में सरकार को कर्ज माफ़ी का ऐलान करना पड़ा है. लेकिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी कामयाबी किसानों पर पड़ने वाला मनोवैज्ञानिक असर है. किसान का आंदोलन पर भरोसा कायम हुआ है. सीकर के पास के ही गांव रसीदपुरा में एक महिला ने बड़े ताव के साथ कहा,

‘हमने सरकार को घुटनों के बल आने पर मजबूर किया है, अगर आगे फिर ऐसी जरूरत पड़ी, तो हम फिर से सरकार को मुंह के बल गिरा देंगे.’

सीकर के किसान महापड़ाव में एक महिला
सीकर के किसान महापड़ाव में एक महिला

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