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नई सिविलाइज्ड दुनिया है, यहां शर्म भी आयोजित की जाती है

अजमल सिद्दीकी ने मसूरी के एक होटल में जो देखा, साझा किया है, पढ़ा और समझा जाना चाहिए.

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साभार- फेसबुक
1979589_851034934913605_1163271835_nअजमल सिद्दीकी लिखने-पढ़ने वालों में से हैं, दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं. अपने परिवार के साथ मसूरी घूमने गए थे. उन्होंने वहां जो देखा, उसे फेसबुक पर लिखा. वो पढ़ना जरुरी है. उससे ज्यादा जरुरी सब तक पहुंचना और ये समझना है कि हम किस ओर को बढ़ रहे हैं. और इस सबमें क्या छूट रहा है. क्या भूल रहे हैं. फेसबुक पर लिखी उनकी पोस्ट यहां पढ़िए.
पहली क़तार के तमाशबीनों के नाम! अक्सर हम जब कहीं घूमने जाते हैं तो होटलों में अपना कुछ सामान भूल आते हैं. मेरे साथ भी यही हुआ, और अब की बार वो छोड़ के आया हूं कि जिसे कोई चुरा तो नहीं सकता लेकिन उसे मेरे लिए संभालकर भी नहीं रख सकता. मसूरी के दीप होटल में मैं अपनी बीवी और दो बच्चों के साथ रुका था, 24 मई 2016 की सुबह थी, टैरेस से किसी के वॉयलिन बजाने की आवाज़ आई, हम सब गए तो देखा एक तक़रीबन 65/70 साल का प्यारा सा आदमी, सफ़ेद मलमल का कुर्ता और सफ़ेद धोती पहने हुए वॉयलिन के तारों को छेड़ रहा था और अपना कान वो वॉयलिन पर ऐसे लगाए हुए था जैसे वॉयलिन उसकी हर छेड़छाड़ पर कुछ फुसफुसाता हो जिसे वो सुनकर खिल उठता था. पहाड़ों को आवाज़ मिल चुकी थी, कैमल्स बैक रोड आज वॉयलिन के ज़रिए ख़ुद की तर्जुमानी/express कर पा रहा था, धूप नाच रही थी, हवा बावली हो चुकी थी. और हम इंसान? हमारे लिए यह एक तमाशा भर था. ख़ैर, तालियां बजीं, सबने रस्मी सा थैंक्यू कहा. फिर उस शख़्स ने सब को अपनी एक एक सीडी दी और कहा कि अगर कोई ख़रीदना चाहे तो 150 रुपए में ख़रीद ले. सिर्फ़ एक सीडी बिक पाई वो भी शायद शर्म की वजह से, जैसे बचपन में भालू का तमाशा देखने के बाद जब पैसे देने की बारी आती थी तो सब से ज़्यादा शर्म उसे आती थी जो तमाशबीनों में सबसे आगे होता था,या तो वो तमाशा ख़त्म होने से पहले ही निकल जाता था, या बहुत बेशर्म बन कर बाद में जाता था, या फिर दिल पर पत्थर रख कर दे देता था एक आध सिक्का. इस वॉयलिन वाले मदारी ने भी अपने 150 रुपए लिए और चलता बना. अगले दिन मेरी सात साल की बेटी रिदा ने मुझे बताया कि "अब्बू! हम खेलते खेलते उन अंकल के कमरे की तरफ़ गए तो वो अकेले रो रहे थे, आप जा कर पूछोगे?" मैं नई दुनिया की रस्मों से डरने वाला शख़्स हूं, वो दुनिया जहां किसी के दुख बांटने को उसकी प्राईवेसी में दखल देना समझा जाता है, वो दुनिया जहां मुहल्ले के किसी इंसान का दुख तब तक नहीं पता चलता जब तक किसी बंद कमरे से लाश की बदबू बन कर वो दुख ज़ाहिर न हो. और बदबूदार दुख से हमदर्दी? अरे नहीं ! यह मुहज़्ज़ब/civilised/सभ्य समाज है, बदबू का यहां काम भला. सो मैंने उस रोते हुए वॉयलिन के साज़ को नहीं छेड़ा. लानत ऐसी रस्म-ए-दुनिया पर. और लानत इन रस्मों को "civilised" समझने वालों पर. मैं जब वापस लौट रहा था तो हमेशा की तरह सोचता रहा कि कुछ छूट तो नहीं गया होटल में, चार्जर, फ़ोन, पैसे, या कोई और सामान (यानी हम मशीनों को चलाने वाले कल-पुर्ज़े) घर आया, बैग से वो सीडी निकाली, उसपर नाम लिखा था Swapan Sett. गूगल किया, और पता चला कि हम तमाशबीनों का यह मदारी पूरे देश की ख़ाक छान रहा है, अपनी बीवी के कैंसर ट्रीटमेंट के लिए. अपना हुनर नीलाम कर रहा है. उनकी पत्नी 2002 से कैंसर से लड़ रही हैं और मुम्बई के टाटा मेमोरियल में इलाज चल रहा है. मैं होटल में वाक़ई कुछ भूल आया था, कुछ छोड़ आया था, स्वप्न को रोते छोड़ आया था. मैं पहली क़तार का तमाशबीन हूं, जिसे आज शर्म कुछ ज़्यादा आ रही है.
अगर आप को भी शर्म आती है तो स्वप्न का नम्बर है 9331244895 और 150 रुपए क़ीमत है हमारी मुशतर्का/सामूहिक/collective शर्म की, जो सीडी के अंदर बंद है. या आप इनसे बात कर के अपने यहां शर्माने के प्रोग्राम भी रख सकते है. नई civilised दुनिया है, यहां शर्म भी आयोजित की जाती है.

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