देश - भारत. पूरी दुनिया इंतज़ार कर रही है और चिढ़ने वाले चिढ़ भी रहे हैं कि कब ये देश दुनिया की महाशक्ति बनेगा. भारत को लेकर हर तरफ एक उम्मीद एक आशा का माहौल है. एक मज़बूत लोकतंत्र. एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था. एक सोच...
कन्हैया के समर्थन में गईं शेहला राशिद के साथ बहुत ग़लीज़ हरकत की गई है
पॉलिटिक्स अपनी जगह है लेकिन ऐसा घटिया काम नहीं होना था.
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शेहला रशीद
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नहीं रुकिए! सोच नहीं. सोच निश्चित रूप से नहीं. वो एक चीज़ है जिसकी ग्रोथ रेट (नेट और ग्रॉस दोनों ही) भारत के मामले नेगटिव में चल रही है. जिस सोच से हमें घिन आनी चाहिए, वो सोच आ रही है, उसपर घिन नहीं.
दोस्तो क्या आपको गुस्सा नहीं आता, कोफ़्त नहीं होती कि हम केवल अपनी सोच भर के चलते रुके हुए हैं. रुके हुए हैं, या शायद पीछे जा रहे हैं. छात्र नेता और जेनएनयूएसयू की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला रशीद इन दिनों बेगूसराय में थीं. अपने ही कॉलेज के पास आउट कन्हैया कुमार के प्रचार के लिए. कन्हैया बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे हैं. सीपीआई के टिकट पर. उनके साथ चुनावी समर को लड़ रहे हैं राजद के तनवीर हसन और एनडीए के गिरिराज सिंह. होने को और भी कई प्रत्याशी होंगे, लेकिन त्रिकोणीय टक्कर इन तीनों के बीच ही हो रही है. और चुनाव की तारीख है - 29 अप्रैल, 2019. यानी चुनाव प्रचार का आज (27 अप्रैल, 2019 को) लास्ट डे है. हां तो कन्हैया के प्रचार के लिए शहला राशिद बेगूसराय थीं. उनको लेकर फेसबुक पर तरह-तरह की पोस्ट शेयर की जा रही हैं. पोस्ट नहीं दरअसल एक ग़लीज़, महा दोयम बात. हम कुछेक पोस्ट्स को यहां पर एम्बेड कर देते हैं. बल्कि स्क्रीन शॉट एक बेहतर ऑप्शन रहेगा, ताकि इन सभी शेयर-कर्ताओं को अक्ल आने पर (जो कि बहुत अच्छी बात होगी, लेकिन संभावना कम ही है) अगर पोस्ट डिलीट भी हो जाए तो बाकियों के लिए एक मिसाल रहे.
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नहीं अब हम इन पोस्ट करने वालों से ये नहीं कहेंगे कि क्या आप लोग अपने घर की मां बहनों के लिए भी ऐसी ही बातें करते हैं. हम नहीं कहेंगे, क्यूंकि ये कहना, दरअसल ये सिद्ध करना होगा कि स्त्रियां इनके सर्टिफिकेट के दम पर इज्ज़त अर्न करती हैं. और क्यूंकि उसके बाद ये बड़े गर्व से और भी बड़ी भौंडी बात कहेंगे - हमारे घर की औरतें ऐसा नहीं करतीं. तो नहीं दोस्तो इनसे इस तरह की बात करना, या किसी भी तरह की बात करना अपने को भी इनके स्तर तक लाने सरीखा होगा. इन्हें सर्टिफिकेट की तरह यूज़ करना होगा. इन्हें जज और स्त्रियों को कटघरे में खड़ा करने सरीखा होगा. हम कुछ और करेंगे, हम इन्हें कटघरे में खड़ा करेंगे. हम इनसे हम दूसरे, कुछ हार्ड हीटिंग सवाल पूछेंगे. हम आज पड़ताल करेंगे, लेकिन किसी खबर की नहीं, इस बात की नहीं कि रशीद के बैग से कंडोम मिले की नहीं. बल्कि हम पड़ताल करेंगे, इन गलीज़ दिमागों की.
शायद नहीं! हम या कोई भी इन दिमागों की पड़ताल नहीं कर सकता, इन्हें खुद ही करनी होगी. बस हमें रशीद के लिए यही कहना है कि - ढेरों मुश्किलों को पार करके वो इस मंज़िल तक पहुंचा/पहुंची. और अभी और भी 'मुश्किलें' आएंगी. और अगर वो मुश्किलें भी, ऐसी ही हुईं कि जैसी आज हैं तो दी लल्लनटॉप असहमतियों-सहमतियों के परे जाकर आपके समर्थन में आएगा.
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[शेयर और लाइक्स की संख्या पर फिर से गौर कीजिए]
लल्लनटॉप को नहीं जानना कि रशीद के बैग में क्या था, अगर वो कोई आपत्तिजनक चीज़ नहीं थी तो. अब शब्द पर गौर कीजिए - आपत्तिजनक. और स्पेसिफाई कर देते हैं इस शब्द को. आपत्तिजनक मतलब - बम, एके47, ज़हर... और गैर आपत्तिजनक मतलब - पैसे, सेनेट्री पैड, लिपस्टिक, कंडोम, सेफ्टी पिन, पेपर-स्प्रे. पेपर-स्प्रे भी आपत्तिजनक होता अगर 'इन लोगों' की सोच कुंठित न होती. लेकिन वो अटैक नहीं डिफेंस है अब. 'इन लोगों' की कुंठाओं से खुद को बचाने के लिए, अगर कोई स्त्री खुद को बचा पाए तो. कुंठा. हम पड़ताल करेंगे, इस एक शब्द की कसौटी पर इन सबके दिमाग की. हमें नहीं जानना कि रशीद के बैग में क्या था, हमें जानना है कि 'इनके', इन पोस्ट लिखने, शेयर करने और फॉरवर्ड करने वालों के दिमाग में क्या है? तो पोस्ट लिखने वालों बताओ, अगर एक वक्त को मान भी लें कि किसी के बैग में कंडोम पाए गए थे तो इसमें दांत दिखाकर हंसने की क्या ज़रुरत? इसमें इतना हव्वा बनाने की क्या ज़रुरत? सेक्स को हव्वा बनाने की क्या ज़रुरत? नहीं तुम्हारे पास जवाब नहीं होगा. हो ही नहीं सकता. तुम वो हो जो कोई भाषण दे रहा हो तो नीचे से हूटिंग करता है लेकिन मंच पर बुला लिए जाने पर अंदर की सांस अंदर और बाहर की बाहर रह जाती है. तुम वो लोग हो जिनके लिए व्यंग्य का अर्थ किसी के एवज़ में हंसना है. सेडिस्टिक प्लेज़र की चाह रखने वाले तुम लोग, वही लोग हो जिनके बारे में कहा जाता है कि ढेरों मुश्किलों को पार करके वो इस मंज़िल तक पहुंचा/पहुंची. तुम इस वाक्य विन्यास में 'मुश्किल' नाम का शब्द हो. याद रखना इतिहास पढ़ते हुए तुमने ऐसे ही लोगों को कोसा है. याद रखना इतिहास नाम का लिटमस टेस्ट हमारा तुम्हारा भी होगा.
शायद नहीं! हम या कोई भी इन दिमागों की पड़ताल नहीं कर सकता, इन्हें खुद ही करनी होगी. बस हमें रशीद के लिए यही कहना है कि - ढेरों मुश्किलों को पार करके वो इस मंज़िल तक पहुंचा/पहुंची. और अभी और भी 'मुश्किलें' आएंगी. और अगर वो मुश्किलें भी, ऐसी ही हुईं कि जैसी आज हैं तो दी लल्लनटॉप असहमतियों-सहमतियों के परे जाकर आपके समर्थन में आएगा. अंततः- देश - भारत. पूरी दुनिया इंतज़ार कर रही है और चिढ़ने वाले चिढ़ भी रहे हैं कि कब ये देश दुनिया की महाशक्ति बनेगा. भारत को लेकर हर तरफ एक उम्मीद एक आशा का माहौल है. एक मज़बूत लोकतंत्र. एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था. एक सोच...
नहीं रुकिए! सोच नहीं. सोच निश्चित रूप से नहीं.
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