बंदरों की एक नई प्रजाति की पुष्टि हुई है. सेंट्रल अफ्रीका के देश कांगो में. कुछ समय पहले यहां जंगलों में एक 'रहस्यमय' जानवर की खोज हुई थी. अब वैज्ञानिकों ने कन्फर्म कर दिया है कि ये बंदर की एक नई प्रजाति है. नाम दिया गया है ‘Colobus Congoensis’. इस बंदर का चेहरा और बाल काले रंग के हैं. पूरे शरीर में केवल होंठ का रंग अलग है. कोलोबस कांगोएन्सिस के होंठ नारंगी हैं.
असली काले बंदर की खोज, नारंगी होंठ हैं, कैसे मिली ये नई प्रजाति?
बताते हैं कोलोबस कांगोएन्सिस को 2008 में वन-पशु संरक्षकों ने कांगों के लोमामी नेशनल पार्क में देखा था. वहां यहां के घने ट्रॉपिकल जंगलों में ऊंचे पेड़ों में छिपा था. तब से दावे किए जाते रहे कि यहां एक रहस्यमय प्रजाति मौजूद है.


बताते हैं कोलोबस कांगोएन्सिस को 2008 में वन-पशु संरक्षकों ने कांगों के लोमामी नेशनल पार्क में देखा था. वहां यहां के घने ट्रॉपिकल जंगलों में ऊंचे पेड़ों में छिपा था. तब से दावे किए जाते रहे कि यहां एक रहस्यमय प्रजाति मौजूद है. बाद में जुनियर एम्बोको नाम के एक छात्र ने इस बंदर को ढूंढने में अहम भूमिका निभाई. एम्बोको फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी में PhD की पढ़ाई कर रहे हैं.
BBC ने कोलोबस कांगोएन्सिस को लेकर एम्बोको से बात की. उन्होंने बताया कि 2008 में बंदर की एक धुंधली फोटो भी ली गई थी. इसके सालों बाद 2018 में कोलोबस दिखाई दिया तो एक इंटरनेशनल टीम ने इसे खोजने और इस पर रिसर्च करने का काम शुरू कर दिया.
इसी खोज में जूनियर एम्बोको ने अहम भूमिका निभाई है. इसमें ऑडियो रिकॉर्डिंग, फोटोज और एक बड़ी जेनेटिक स्टडी शामिल थी. एम्बोको ने बताया कि ऐसे जानवर के चेहरे को देखना कमाल का अनुभव था.
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उन्होंने यह भी बताया कि कुछ स्थानीय लोग इस बंदर के बारे में जानते थे और इसे ‘लिक्वेली’ नाम से बुलाते थे. बंदर के स्वभाव के बारे में एम्बोको ने बताया कि यह थोड़े शर्मीले होते हैं. इस वजह से पेड़ों की ऊंचाई पर टहनियों में छिपे रहते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक रिसर्च के दौरान टीम ने जंगल के पास के 52 गांवों में लोगों से बात की. पता चला केवल 8 लोगों ने इसे देखा था. कोलोबस पर फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर केट डेटवाइलर का भी बयान आया है. उन्होंने कहा कि इन बंदरों के अंगूठे नहीं होते हैं. डेटवाइलर ने आगे बताया,
‘ये शाकाहारी जानवर हैं, जो पेड़ों की ऊपरी टहनियों पर रहते हैं. ये हमारे इकोसिस्टम का एक जरूरी हिस्सा हैं. हमें लगता है कि जंगल में बीजों को प्रोसेस करने और उनके अंकुरण में भी इनकी बड़ी भूमिका है. इनकी आवाज भी बहुत अलग होती है, जो किसी दहाड़ जैसी लगती है. आप अक्सर, उनकी आवाज तो सुनते हैं, लेकिन उन्हें देख नहीं पाते.’
डेटवाइलर का मानना है कि ये जानवर काफी दुर्लभ है और सिर्फ जंगलों के ऊंचे हिस्सों में पाए जाते हैं, जहां उनके हिसाब से खाना और घर मिलता है. ऐसे जानवरों का शिकार उनके मांस के लिए किया जाता है.
रिसर्च करने वालों को उम्मीद है कि कोलोबस को एक अलग प्रजाति के तौर पर पहचान मिलने के बाद उन्हें आधिकारिक तौर पर संरक्षण मिल सकता है. शोधकर्ताओं के पास कई और भी सवाल है, जिनके रिसर्च के लिए प्लान तैयार किया जा रहा है.
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