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सर्फ एक्सल का विरोध करने वालो, पता है उसने रमज़ान पर क्या किया था

विरोध करने वाले लिख रहे हैं कि मुस्लिमों के त्योहार पर ऐड क्यों नहीं बनाते...

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सर्फ एक्सल ने होली के मौके पर नया ऐड बनाया. मेसेज था- सेकुलरिजम, सहिष्णुता और भाईचारा-दोस्ती. राइट विंगर्स को ये सब नहीं दिखा. उन्होंने ऐड में लव जिहाद खोज लिया. फिर ये सवाल भी कि बस होली पर ऐड क्यों. उन्हें पता नहीं कि सर्फ एक्सल रमज़ान और ईद पर भी ऐड बना चुका है.
वो तमाम लालबुझक्कड़. सारे राइट-विंग शूरमा. जो सर्फ एक्सल के होली ऐड पर बिफरते हुए कंपनी को रमज़ान-ईद पर ऐड बनाने के लिए ललकार रहे हैं. ये खबर उनके लिए ही लिखी गई है. वो चाहें, तो इस खबर के आखिर में लगाए गए दो वीडियोज़ को देखकर अपना मुंह खुद ही नोच सकते हैं. बैकग्राउंडर: ऐड की कहानी कहानी ये है कि एक कंपनी है- सर्फ एक्सल. डिटर्जेंट भी बनाती है. सालों से 'दाग अच्छे हैं' की टैगलाइन से अपना सामान बेचती है. इस लाइन का मतलब होता है कि अच्छा काम करने में अगर कपड़े गंदे होते हैं, तो क्या परवाह. आप अच्छाई कीजिए. दाग सर्फ एक्सल धो लेगा. इसी सीरीज़ में कंपनी ने होली पर एक ऐड बनाया. कोई मुहल्ला है. बालकनी में चढ़े बच्चे नीचे सड़क पर आने-जाने वालों के ऊपर रंगों वाले गुब्बारे फेंक रहे हैं. एक बच्ची साइकल पर आती है. घूम-घूमकर अपने ऊपर बच्चों से रंग फिंकवाती है. फिर सारे बच्चों के रंग खत्म हो जाते हैं. surf-excel-ad फिर वो बच्ची एक घर के आगे जाकर कहती है, बाहर आ जाओ. सब खत्म हो गया. अंदर से झक सफेद कुर्ता-पजामा पहने एक बच्चा निकलता है. सिर पर मुसलमानी टोपी उसका मजहब जाहिर कर देती है. बच्ची उसे अपनी साइकल पर बिठाती है. बाकी बच्चे बड़े प्यार से उन दोनों को देखते हैं. वो बच्ची साइकल से मस्जिद की सीढ़ियों के पास पहुंचकर रुक जाती है. वो बच्चा मस्जिद की सीढ़ियां चढ़ते हुए कहता है, नमाज़ पढ़कर आता हूं. इसपर बच्ची जवाब देती है- फिर रंग लगेगा. बच्चा मुस्कुराकर हामी भरता है और सीढ़ियां चढ़ने लगता है. ऐड पर क्या बवाल हुआ? कई लोगों को इस ऐड से शिकायत हो गई. उनके मुताबिक, ये हिंदू धर्म पर हमला है. लव-जिहाद को प्रमोट करती है. हिंदू की बेटी और मुसलमान का बेटा, ऐसा क्यों? होली पर ही ऐड क्यों? ये लोग सर्फ एक्सल का बहिष्कार करने की अपील कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर इसके लिए मेसेज वायरल हो रहे हैं. लोग जुगाड़ खोज रहे हैं कि किस तरह सर्फ एक्सल को मज़ा चखाया जाए. ऐसे मेसेजों में एक सवाल भी है. कि कंपनी ने होली पर ही क्यों बनाया ऐड. मुसलमानों के त्योहारों पर क्यों नहीं बनाया. क्यों नहीं उनके पर्व पर कहा कि दाग अच्छे हैं. ऐसे लोगों के लिए मोमेंट ऑफ ट्रूथ. सर्फ एक्सल ऐसे ऐड बना चुका है. रमज़ान पर बनाए गए सर्फ एक्सल के तीन ऐड नीचे लगाए हैं हमने. देखिए और उन लोगों के मुंह पर उछालिए धर्म का नरक मचाया हुआ है. हां, अगर ये शिकायत बची रह जाए किसी की कि रमज़ान और ईद पर ही क्यों? मुहर्रम पर क्यों नहीं? तो इसका जवाब है कि होली और रमज़ान-ईद, दोनों खुशी के त्योहार हैं. मुहर्रम मातम का मौका है. खोंइछा में आइग मांगने वालों का क्या इलाज है? बाकी एक कहानी है. एक मां-बेटी की जोड़ी थी. महा-लड़ाकू थीं दोनों. बिना लड़े, बिना फसाद किए उनका खाना नहीं पचता था. धीरे-धीरे गांव में सब थक गए उनके रोज़-रोज़ के तमाशे से. लोगों ने उनको एंटरटेन करना बंद कर दिया. कोई बात ही नहीं करता था, तो लड़ाई कहां से होती. मां-बेटी दुखी. एक दिन उन्होंने झगड़ा मोल लेने का प्लान बनाया. मां ने बेटी को पट्टी पढ़ाकर पड़ोसी के यहां भेजा. उन दिनों बिजली-बत्ती नहीं थी. माचिस भी लक्ज़री थी. लोग एक-दूसरे से आग मांगकर डिबिया-जलावन जलाते थे. बेटी जाकर अपना आंचल फैलाकर पड़ोसन से बोली- खोंइछा में आइग दिअ. मतलब, आंचल में आग डाल दो. पड़ोसन से रहा नहीं गया. उसने कहा, ऐसा तो नहीं देखा कहीं कि कोई आंचल में आग मांगे. बस. दोनों मां-बेटी शुरू. हमारी मर्ज़ी हम जिसमें आग लें, तुम कौन होती हो टीका-टिप्पणी करने वाली. बस उस दिन से वो मिसाल बन गई. जैसे सींगें लड़ाना. वैसे ही खोंइछा में आग मांगना. बिना बात की बात में 'धर्म का अपमान' और 'धर्म पर हमला' चिल्लाने वाले भी उसी कैटगरी के हैं.
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