‘प्रतिभा साधन की मोहताज नहीं होती.’ इस बात को चरितार्थ किया है लखनऊ की 19 साल की सारा मोईन ने. सारा न देख पाती हैं. न ही सुन पाती हैं. यहां तक कि उन्हें बात करने में भी काफी समस्या होती है. इसके बावजूद सारा ने साल 2026 की इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट (ISC) के 12वीं बोर्ड एग्जाम में स्कूल टॉप किया है. वो लखनऊ के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में पढ़ती हैं. इस परीक्षा में उनके 98.75% नंबर आए हैं.
सुन नहीं पातीं, देख नहीं पातीं, 12वीं में नंबर 98.75%, सारा मोईन की कहानी हिम्मत देती है
सारा के पिता अहमद ने उनकी इस सफलता का क्रेडिट उनके टीचर सलमान अली काजी को भी दिया है. अहमद ने कहा कि उन्होंने मेरी बेटी को कॉलेज टॉपर बनाने में मदद करने के लिए काफी प्रयास किया है. साथ ही बताया कि सारा को उसके टीचर 'हेलेन केलर' कहते हैं.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सारा को सार्कोइडोसिस नाम की एक रेयर बीमारी है. जब वो चार साल की थीं, तबसे वो इस बीमारी से ग्रस्त हैं. इसकी चपेट में आने के बाद सारा ने धीरे-धीरे अपनी आंखों की रोशनी खो दी. कुछ सालों के बाद सारा को सुनने में भी समस्या होने लगी. अंत में उनकी सुनने की भी क्षमता खत्म हो गई. सार्कोइडोसिस की वजह से से सारा को बोलने में भी काफी दिक्कत होती है.
सारा अपने पैरेंट्स और बड़े भाई के साथ लखनऊ के हुसैनगंज में रहती हैं. उनके पिता मोइन अहमद ने बेटी की सफलता पर कहा कि सारकॉइडोसिस की वजह से काफी कम उम्र में बेटी की आंखों की रोशनी और सुनने की क्षमता दोनों खत्म हो गई. उसकी ये हालत देखकर ही उन्होंने उसका एडमिशन क्राइस्ट चर्च कॉलेज में कराया, जहां विकलांग स्टूडेंट्स को स्पेशल हेल्प मिलती है. उन्होंने कहा,
जब सारा ने 10वीं में 95% हासिल किए तो इससे उसे यह विश्वास मिला कि वह और भी बेहतर कर सकती है. दूसरों के साथ मुकाबला कर सकती है.
सारा के पिता ने आगे बताया कि रोजाना वो अपनी बेटी को क्राइस्ट चर्च कॉलेज ले जाते थे. इस कॉलेज में ऐसे जरूरतमंद बच्चों के लिए एक अलग डिपार्टमेंट हैं, जहां प्रशिक्षित टीचर्स की देखरेख में बच्चों को पढ़ाया जाता है. अहमद ने आगे बताया,
सारा की आंखों और न सुन पाने की समस्या की वजह से कॉलेज प्रशासन ने उसके लिए अलग से कक्षाओं का प्रबंध किया था. मैंने भी अपनी नौकरी से वॉलंटरी रिटायरमेंट इसलिए ली ताकि मैं उसकी पूरी तरह से देखभाल कर सकूं. ऐसे मुश्किलों का सामना कर रहे बच्चे को लगातार अटेंशन और मदद की जरूरत होती है.
सारा के पिता अहमद ने उनकी इस सफलता का क्रेडिट उनके टीचर सलमान अली काजी को भी दिया है. अहमद ने कहा कि उन्होंने मेरी बेटी को कॉलेज टॉपर बनाने में मदद करने के लिए काफी प्रयास किया है. साथ ही बताया कि सारा को उसके टीचर 'हेलेन केलर' कहते हैं. सारा के पिता ने बताया कि क्राइस्ट चर्च कॉलेज ने साल 2014 में विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए अपना यह सेक्शन शुरू किया था. तभी से वो भी इस डिपार्टमेंट का हिस्सा बने हुए हैं.
सारा अन्य दृष्टिबाधित छात्रों की तुलना में काफी अलग रही क्योंकि, वो सुन भी नहीं सकती थी. इसलिए उन्हें सिखाने के लिए बेस्ट टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया गया. सारा को पढ़ाने के लिए डिजिटल उपकरणों का काफी इस्तेमाल किया गया. इसमें एक ऑर्बिट रीडर का इस्तेमाल किया गया, जो ब्रेल लिपि पर आधारित डिवाइस है. सारा को पढ़ाने के लिए उसकी सभी किताबों को स्कैन किया गया और उन्हें Word फाइलों में बदला गया था. बाद में उन्हें इस स्पेशल डिवाइस से जोड़ा गया, ताकि वह छूकर उसे आसानी से पढ़ सके.
परीक्षाओं के लिए सारा को एक लैपटॉप से जुड़े रिफ्रेशेबल ब्रेल डिस्प्ले उपलब्ध कराया गया, जिसकी मदद से उसके क्वेश्चन पेपर्स को ब्रेल में बदला गया. ताकि वह आसानी से पढ़कर आंसर लिख सके. बाद में उसके आंसर्स को नॉर्मल टेक्स्ट में बदल दिया गया.
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