पर अभी पता चला है कि मोदी सरकार के दौरान कुछ ऐसा हुआ है, जो पिछले दस सालों में नहीं हुआ था. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इंडस्ट्रियल सेक्टर को बैंक से मिलने वाले क्रेडिट का ग्रोथ रेट अभी तक के सबसे निचले स्तर पर है. चार साल पहले तक ये 20 प्रतिशत की रेट से बढ़ रहा था. जुलाई 2014 में भी ये 10 से ऊपर था. पर अगस्त 2016 में ये निगेटिव हो गया है.
इस महीने की शुरुआत में अपनी मॉनीटरी पॉलिसी में रिजर्व बैंक ने शंका जताई थी कि ऐसा मामला है. अब ये कंफर्म है.इधर बैंकों की स्थिति भी डांवाडोल है. एनपीए बढ़ रहा है. कर्जे चुकता नहीं हो रहे. 2005 से 2011 के बीच बैंक इंडस्ट्री में बहुत पैसे दे रहे थे. पर ज्यादातर पैसा बड़े इंडस्ट्रियल घरानों को ही जा रहा था. मिडिल साइज के बिजनेस तब भी बैकफुट पर थे. और अब तो परेशानी ज्यादा बढ़ गई है.
क्रेडिट ग्रोथ क्या होता है?
इसका मतलब है बैंकों द्वारा कंपनियों, बिजनेसमैनों, लोगों को दिये जाने वाले उधार यानी लोन में ग्रोथ.
क्रेडिट तब बढ़ता है जब इंडस्ट्रियल रिफॉर्म होते हैं. नई-नई इंडस्ट्रीज आती हैं. पैसों की जरूरत होती है. पर क्रेडिट ग्रोथ ना होने के और भी कारण हो सकते हैं. जैसे विदेशों से पैसा उठाना. अभी की दुनिया में ये ज्यादा आसान हो गया है. पर भारत के छोटे बिजनेसमैनों के पास ये सुविधा नहीं है. तो उनके लिये ये समस्या बनी रहती है.

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