हम भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 124ए को खत्म करेंगे. इसका बेज़ा इस्तेमाल हुआ है. वैसे भी ये धारा अब गैरज़रूरी रह गई है क्योंकि इस बारे में नए कानून आ गए हैं.

कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में IPC के सेक्शन 124ए को हटाने का वादा किया है. लिखा है कि राजद्रोह को परिभाषित करने वाले इस कानून का ग़लत इस्तेमाल हुआ है. इसका बेज़ा इस्तेमाल UPA की सरकार के टाइम भी हुआ था. दाहिनी तरफ जो कार्टून है, उसकी वजह से कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर राजद्रोह लगा दिया गया था.
और भी कुछ कार्टून थे. ये आए थे अन्ना हज़ारे के जन लोकपाल आंदोलन के दौरान, नवंबर 2011 में. पॉलिटिक्स के लोगों में पैठे करप्शन पर व्यंग्य किया गया था. उस समय केंद्र और महाराष्ट्र, दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी. केंद्र में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री, राज्य में पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री. UPA सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे. असीम का कार्टून सरकार के खिलाफ माना गया.

असीम त्रिवेदी पर उनके बनाए कुछ कार्टून्स की वजह से राजद्रोह लगा दिया गया था. उन्हें अरेस्ट करके जेल भी भेजा गया.
असीम को जेल भी हुई असीम के खिलाफ पुलिस में शिकायत लिखवाई थी अमित कतरनेय नाम के शख्स ने. अमित का कहना था कि असीम के कार्टून्स से भारतीयों की भावनाएं आहत हुई हैं. मगर इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के लोगों का दावा था कि इस केस के पीछे खुद सरकार का हाथ है. क्योंकि वो अपने खिलाफ चल रही भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम को कुचलना चाहती है. ये आरोप सही हों या न हों, लेकिन ये सच तो है कि कांग्रेस की सत्ता में ही कार्टून से व्यंग्य करने वाले एक आर्टिस्ट पर राजद्रोह का केस बना. और उसे जेल भी भेजा गया.

ये ब्रिटेन के अखबार 'द गार्डियन' के एक खबर का स्क्रीनशॉट है. इसमें असीम की गिरफ़्तारी वाले न्यूज को रिपोर्ट किया गया है. असीम का वाकया दुनियाभर में रिपोर्ट हुआ.
देश-विदेश, सब जगह इसकी खूब आलोचना हुई असीम पर राजद्रोह का केस दर्ज़ होने और उनकी गिरफ़्तारी दुनिया भर में खबर बनी. मनमोहन सिंह सरकार की बहुत आलोचना हुई. उस पर आरोप लगे कि अंग्रेज़ों के जमाने में बने इस औपनिवेशिक माइंडसेट के कानून का ग़लत इस्तेमाल कर वो खुद की आलोचना को दबा रही है. अंतरराष्ट्रीय संगठन 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉडर्स' ने भी असीम को रिहा करने की मांग की थी. उस समय सूचना और प्रसारण मंत्री थीं अंबिका सोनी. उन्होंने पत्रकारों से कहा था-
कार्टूनिस्ट्स को संवैधानिक मापदंडों की हद में रहना चाहिए. वो राष्ट्रीय प्रतीकों को अपने कार्टून का विषय नहीं बना सकते.बाद में कांग्रेस ने बतौर पार्टी खुद को इस मामले से दूर कर लिया. पार्टी की तरफ से बोलते हुए मनीष तिवारी ने कहा-
मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं कि अरेस्ट किए जाने का फैसला बहुत ज्यादा कड़ी कार्रवाई थी. हम गिरफ़्तारी के पक्ष में नहीं. ऐसा समाज जो खुद पर हंस न सके, खुद का मज़ाक न उड़ा सके, वो कमज़ोर होने के जोखिम पर होता है.
असीम के केस का क्या हुआ? शुरुआत में असीम ने खुद पर लगे राजद्रोह के मामले का विरोध करते हुए जमानत लेने से इनकार कर दिया था. उन्हें तब दो हफ़्ते जेल की सज़ा हुई. बाद में जमानत भी मिली. आगे चलकर बंबई हाई कोर्ट ने असीम को बरी कर दिया. अदालत ने कहा था कि एक नागरिक को सरकार और उसके फैसलों की आलोचना करने का हक है. शर्त यही है कि वो सरकार के खिलाफ हिंसा न भड़काए. सरकार और प्रशासन की आलोचना करना राजद्रोह नहीं माना जा सकता. तब ही ये हुआ था कि किसी पर राजद्रोह का मामला दर्ज़ करने से पहले महाराष्ट्र में पुलिस को जिला लॉ अफसर से कानूनी सलाह लेनी होगी. महाराष्ट्र सरकार ने भी बंबई हाई कोर्ट को आश्वासन दिया कि वो इस सिलसिले में गाइडलाइन्स जारी करेगी.
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