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14 सालों में बिहार ने कई महेंद्र सिंह धोनी खो दिए हैं

रणजी में बिहार की फिर वापसी हुई है.

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धोनी ने बिहार रणजी के लिए साल 1999-2000 में डेब्यू किया था.
वो साल 2003-04 था. एक पतला-दुबला लड़का घरेलू क्रिकेट में अपनी विकेट कीपिंग और जोरदार बैटिंग के जरिए नेशनल टीम के दरवाजे पर खड़ा था. इसी बीच जिस स्टेट टीम की वो कप्तानी करता था, उसी की मान्यता खत्म कर दी गई थी. ये लड़का था महेंद्र सिंह धोनी. और टीम थी बिहार. बतौर कप्तान आखिरी बार धोनी ने ही बिहार का रणजी में नेतृत्व किया था. 2003 से आज तक बिहार रणजी नहीं खेल पाया क्योंकि झारखंड ने उसकी जगह ले ली. अब 2018-19 में जब बिहार एक बार फिर रणजी में खेलेगा, धोनी अपने करियर की तमाम ऊंचाइयों के बाद अपनी रिटारमेंट की ओर हैं. बिहार ने इस दौरान कई धोनी खोए हैं. कई धोनी बचे  हुए हैं जिन्हें अब उम्मीद है कि वो बीसीसीआई की छतरी तले अपने क्रिकेट करियर चमका पाएंगे.
बिहार क्यों रहा रणजी से बाहर?
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पास के राज्यों में जाकर खेलने को मजबूर है बिहार की क्रिकेट पौध.

4 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि बिहार को रणजी में शामिल किया जाए. 1936 से 2003 तक बिहार की टीम रणजी में खेलती रही. मगर साल 2000 में जब बिहार से झारखंड बना तो दोनों राज्यों में क्रिकेट कंट्रोल पर विवाद हो गया. बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को मानने से बीसीसीआई ने मना कर दिया. कारण ये बना कि 1935 से बिहार क्रिकेट एसोसिएशन का हेडक्वार्ट्स जमशेदपुर में रहा जो अब झारखंड में आता है.इसी आधार पर जब नई झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन बनी तो उसे मान्यता मिल गई. वहीं बिहार को डीरिकॉगनाइज कर दिया गया. मामला इतना ही नहीं है. बिहार में क्रिकेट को कंट्रोल करने के कई दावेदार हैं. यानी कई क्रिकेट एसोसिएशन्स हैं. बिहार क्रिकेट एसोसिएशन्स के अलावा एसोसिएशन ऑफ बिहार क्रिकेट (ABC)और क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार (CAB) भी खुद को असली एसोसिएशन बताती हैं. इसी के चलते बीसीसीआई ने बिहार को डिस्क्वालिफाई कर दिया था.
हालांकि बिहार के पास क्रिकेट इंफ्रास्ट्रक्चर तो है, मगर क्रिकेट गायब दिखती है. यहां पटना, भागलपुर और दरभंगा में पांच फर्स्ट क्लास क्रिकेट ग्राउंड हैं. वहीं पटना का मोइन-उल-हक़ स्टेडियम बीसीए का होम ग्राउंड है. मगर 14 साल के इस गैप में बिहार में  क्रिकेट के कई सपने पूरे नहीं हो पाए. जिसे क्रिकेटर बनना है वो पास के राज्यों में जाकर खेलने लगे. दूसरे राज्यों में सबसे बाद में ही नंबर आता है.
बिहार में क्रिकेट का केजरीवाल
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BCCI की नाक में दम करने के लिए मशहूर हैं आदित्य वर्मा.

2007-08 में एक अदमी रोज मुंबई में चर्चगेट पर बीसीसीआई दफ्तर के बाहर खड़ा हो जाता था. रोज जाता. सिक्योरिटी गार्ड से दोस्ती करता, अधिकारियों के सामने अपनी पहचान बनाता और कोशिश करता किसी तरह अंदर जा सके. उसके हाथ में कुछ कागज होते थे जिन्हें वो ऊपर तक पहुंचाना चाहता था. मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया. ये आदमी था आदित्य वर्मा. क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार का सेक्रेट्री. वो क्रिकेट बॉडी जो अभी तक रिकॉगनाइज नहीं थी. तब से इस आदमी ने न सिर्फ बिहार की रणजी में वापसी की लड़ाई लड़ी, साथ ही बीसीसीआई के काम करने में पारदर्शिता लाने के लिए भी मुहिम छेड़ी.
छपरा के आदित्य ने बीसीसीआई को आईपीएल फिक्सिंग मामले में भी बॉम्बे हाई कोर्ट में घेरा. अपना केस को खुद सुप्रीम कोर्ट में लड़ा. फिर इन्हीं की अपील पर नौ महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने एन श्रीनिवासन को बोर्ड प्रेसिडेंट की कुर्सी ने हटने के आदेश दिए. साथ ही राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपरकिंग्स को दो साल के लिए सस्पेंड किया गया.


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