ज़िंदगी का पहला स्कूल. जगह आजमगढ़ के रेलवे स्टेशन के पास. स्कूल का नाम श्री रामचंद्र मेमोरियल स्कूल. डर लगता था स्कूल जाने में. वजह सिर्फ गणित की कक्षा ही नहीं, बल्कि उस कठोर विषय को पढ़ाने वाले टीचर महोदय थे. रंग सांवला था. पेट निकला हुआ था. हाथों में हमेशा लकड़ी की एक मोटी वाली स्केल. ये तीनों बातें उन्हें खौफनाक बनाती थीं. ऐसा सिर्फ हम नहीं, बल्कि हमारे जैसे कई बच्चे समझते थे.
ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है, ये कौन-सा स्कूल है, जहां हम नहीं जा पाए
स्कूल से डरने वाले हर शख्स को ये देखना चाहिए.

गिनती के बाद किसी तरह हम पहाड़ा सीखने की ओर बढ़ ही रहे थे. दो के दो, दो दूनी चार, दो तिहाई सात... बस फिर क्या था. हमारे कोमल हाथ और उनकी स्केल. रोना आ जाता था. डर ऐसा बैठा कि क्लास की एकदम पीछे वाली सीट पर बैठने लगे. कई साल तक ऐसा ही चलता रहा. लेकिन ये सब आपके साथ क्यों शेयर कर रहे हैं हम...
इसका तगड़ा वाला कारण है. फेसबुक पर एक वीडियो हाथ लगा. किसी पार्कनुमा जगह में स्कूली बच्चों का जमावड़ा लगा हुआ है. एक छोटी-सी लड़की और दो नटखट लड़के नाचते-गाते हुए पहाड़ा याद कर रहे हैं. कभी एक पैर ऊपर उठाते, तो कभी कमर मटकाते. कभी सिर पर हाथ, तो कभी कमर पर हाथ. इन तीनों बच्चों के चारों ओर पीठ पर बस्ते का बोझ लिए बच्चे उत्साह के साथ तालियां बजाते हुए पहाड़ा याद कर रहे हैं. इन बच्चों के चेहरे पर डर नहीं, खुशी है. उम्मीद है कि ये वीडियो वे टीचर ज़रूर देखेंगे, जो मानते हैं कि बिना डर के बच्चों को कुछ सिखाया नहीं जा सकता.
एक मिनट 28 सेकंड का ये वीडियो हमारे-आपके जैसे न जाने कितने लोगों को बरसों पीछे ले जाने की ताकत रखता है. आप भी देखिए. अच्छा लगेगा. आप भी कहेंगे ये कौन-सा स्कूल है, जहां हम नहीं जा पाए. और ये आपके दिल को गुदगुदाए, तो इस वीडियो को सिर्फ अपने तक सीमित मत रखिएगा. दूसरों तक पहुंचाकर उन्हें भी मुस्कुराने का मौका दीजिएगा.
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