नेपाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर सत्ता के शिखर तक पहुंचे बालेन शाह की चमक फीकी पड़ने लगी है. 27 मार्च 2026 को नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के मात्र 150 दिन में सबकुछ पलटने लगा है. ना संसद जाना और ना ही अपनी पार्टी की एक्टिविटी में शामिल होना. ऊपर से जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर. नेपाली लोगों को दिखाए गए सपने अधूरे ही रह गए. इस दौरान बालेन शाह सरकार को विरोध-प्रदर्शनों और हिंदू-मुस्लिम दंगों का सामना करना पड़ा. पीएम बालेन के खुद के कथित बर्ताव ने जनता में नाराजगी बढ़ा दी है.
Gen Z प्रोटेस्ट की दम पर नेपाल के पीएम बने थे बालेन शाह, इतनी जल्दी बुरा हाल कैसे हुआ?
नेपाल में हुए Gen Z प्रोटेस्ट ने वहां की सरकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंका था. Gen Z लहर पर सवार होकर बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बन गए. लेकिन अब पांच महीनों बाद PM Balen Shah का डाउनफॉल दिखने लगा है. जानिए ये सब कैसे हो गया.

नेपाल में Gen Z रिवोल्यूशन ने नेपाल की दशकों पुरानी सरकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंका था. यह शायद दुनिया में पहली घटना थी, जिसमें Gen Z ने किसी देश की सत्ता बदल दी. Gen Z लहर पर सवार होकर बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बन गए.
काठमांडू के पूर्व मेयर, अंडरग्राउंड रैपर और सिविल इंजीनियर बालेन शाह ने तब के पीएम केपी शर्मा ओली को चुनाव हराया था. चुनाव में बालेन शाह राष्ट्रीय स्वंत्रता पार्टी (RSP) की कैंडिडेट थे. बालेन को ये कामयाबी Gen Z और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के जरिए ही मिली, और उन्होंने बहुमत के साथ सरकार बनाई.
इंडिया टुडे से जुड़े आनंद सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक, नौबत ये आई गई है कि 19 अगस्त को स्पीकर डीपी अर्याल को बालेन शाह को 26 अगस्त को सवाल-जवाब के सेशन के लिए सदन में पेश होने का आदेश देना पड़ा. मार्च में पद संभालने के बाद से बालेन शाह 39 बैठकों में से सिर्फ 5 में ही शामिल हुए हैं. स्पीकर का यह फैसला तब आया जब विपक्षी सांसदों ने उनके संसद में पेश ना होने पर बार-बार विरोध किया. नेपाल-भारत सीमा पर उनकी टिप्पणियों समेत कई मुद्दों पर जवाब की मांग की.
बालेन शाह का डाउनफॉलबीते पांच महीनों में बालेन शाह का डाउनफॉल दिखने लगा. अप्रैल से शुरू करते हैं. अप्रैल में बालेन ने भारत से आने वाले सामान पर सख्त नियम लागू किए. अगर कोई नेपाली नागरिक भारत आकर तय सीमा से ज्यादा सामान खरीदता, तो उसे टैक्स देना पड़ता. अब नेपाल से तो लोग बड़ी संख्या में भारत आकर सामान खरीदते हैं. बालेन के आदेश ने उनकी जेब पर डाका डाल दिया. भारी विरोध हुआ, जिसके बाद उन्हें अपना ये आदेश वापस लेना पड़ा.
भारत-नेपाल बॉर्डर कंट्रोवर्सीमई के आखिर में भारत-नेपाल बॉर्डर कंट्रोवर्सी हो गई. पीएम बालेन शाह के बयान से ही इसे हवा मिली. पीएम बनने के बाद बालेन पहली बार संसद पहुंचे. संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल ने एक-दूसरे की जगहों पर कब्जा किया है.
कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर संसद में बालेन शाह ने कहा कि नेपाल ने कई जगहों पर भारतीय इलाके में घुसपैठ की है. उन्होंने सुझाव दिया कि इतिहासकार, सर्वे करने वाले और यहां तक कि यूनाइटेड किंगडम (UK) भी औपनिवेशिक दौर के नक्शों को सुलझाने में मदद कर सकते है.
यह बयान कूटनीतिक रूप से नासमझी भरा था. बालेन के बयान ने भारत के साथ रिश्तों में तो खटास डाली, उनके देश में भी उबाल मच गया. भारत के इलाके बताने पर जनता और विपक्ष ने आरोप लगाया कि बालेन इन इलाकों पर नेपाल के दावों से पीछे हट गए.
ये इलाके लंबे समय से भारत के प्रशासन के अधीन हैं. बालेन के दावों को ऐतिहासिक सबूतों का समर्थन नहीं मिलता है. भारत ने भी तीसरे पक्ष के दखल को खारिज किया, और भारत-नेपाल सीमा विवाद को पूरी तरह से द्विपक्षीय बताया.
अपना बनाया नियम तोड़ना पड़ाजून आते-आते बालेन शाह को डिप्लोमैटिक लेवल पर झटका मिला. जून में बालेन की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के चेयरमैन और सह-संस्थापक रबी लामिछाने भारत दौर पर आए. नई दिल्ली में उन्हें जो ग्रैंड वेलकम मिला, उसने इंटरनेशनल मामलों के जानकारों को तो हैरान किया. अंदरखाने, बालेन शाह को भी परेशान किया होगा. क्यों? क्योंकि रबी लामिछाने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बुलावे पर भारत आए थे. बालेन नहीं.
हालांकि, भारत सरकार उन्हें इंडिया विजिट के लिए इनवाइट कर चुकी है, लेकिन वे अब तक आए नहीं. रबी लामिछाने ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस जयशंकर और बीजेपी नेतृत्व के साथ हुई मुलाकातों के दौरान ढोल-नगाड़े बजाए गए. फूलों की पंखुड़ियां बरसाई गईं. किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष के बजाय उसकी राजनीतिक पार्टी के मुखिया को ऐसा स्वागत मिलना विरला ही है.

बालेन शाह को यह वेलकम खटक सकता है? इसकी कुछ दलीलें दी जाती हैं. RSP नेताओं में बालेन शाह को लेकर मनमुटाव है. बालेन ना पार्टी के कामकाज में शामिल होते हैं, और ना ही संसद में आते हैं. यह दूरी बालेन शाह, RSP, गठबंधन साथी और सरकार के दरमियान लंबी दूरी दिखाती है. रबी लामिछाने की चीन के साथ ऐसी कोई नजदीकी नजर नहीं आती. भारत को लेकर वे सहज ही दिखे. लेकिन, भारत को लेकर बालेन शाह का रुख सवाल खड़ा करता है.
ऊपर से बालेन शाह ने एक नई परिपाटी चालू कर दी थी. उन्होंने मंत्री रैंक से नीचे विदेशी डिप्लोमैट्स से मिलने से साफ मना कर दिया. इनमें भारत के विदेश सचिव तक शामिल हैं. लेकिन 10 अगस्त को बालेन शाह ने खुद पर लगाई गई पाबंदी खत्म कर दी. उन्होंने काठमांडू के सिंघा दरबार में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीनी राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात की.

अब जुलाई की बात करते हैं. राइड-शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली का काठमांडू मेट्रोपॉलिटन पुलिस के साथ पार्किंग फाइन और गाड़ी का पहिया लॉक किए जाने को लेकर बड़ा विवाद हुआ. 25 साल के गणेश नेपाली ने खुद को आग लगा ली. जलने की वजह से उनकी मौत हो गई. ये वो घटना थी, जिसने Gen Z के साथ बालेन शाह के संबंध तकरीबन पूरी तरह तोड़ दिए.
कुछ दिनों बाद दो और लोगों ने खुद को आग लगाने की कोशिश की. इनसे लोगों की दबी हुई नाराजगी सामने आ गई. जैसे कि नगर निगम की सख्त कार्रवाई, असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा की कमी, और यह एहसास कि मौजूदा सरकार भी उतनी ही आम लोगों से दूर है जितनी कि वह सरकार थी जिसे इसने हटाया था.
पहली नजर में ये बड़ी समस्याएं नहीं लग सकतीं. लेकिन नेपाल एक छोटा देश है, जिसका आकार लगभग भारत के किसी राज्य जितना ही है. यहां मामूली लगने वाले विवाद भी राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन जाते हैं.
काठमांडू में विरोध-प्रदर्शन का मुख्य केंद्र 'मैतीघर' फिर से प्रदर्शनों का गवाह बना. जो युवा कभी बालेन शाह का समर्थन करते थे, वे अब सरकार को 'फासीवादी' बताने वाले और न्याय की मांग करने वाले पोस्टर लेकर प्रदर्शन कर रहे थे.
हिंदू-मुस्लिम दंगे हुएजुलाई के आखिर में, दक्षिणी जिलों-सुनसारी और सिराहा में हिंदू और मुस्लिम समूहों के बीच सांप्रदायिक दंगे में तीन लोगों की मौत हो गई. अधिकारियों ने कई कस्बों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया. बालेन शाह ने प्रधानमंत्री के तौर पर अपना पहला बड़ा टेलीविजन संबोधन दिया. उन्होंने शांति, धैर्य और राष्ट्रीय एकता की अपील की और निष्पक्ष जांच का वादा किया. इससे पहले, प्रधानमंत्री बनने के बाद से शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से सामने आए थे.
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अगर पिछले 150 दिनों में बालेन शाह के कार्यकाल पर नजर डालें, तो उनकी घटती लोकप्रियता किसी बाहरी शख्स की गलतियों का नतीजा नहीं लगती. ऐसा लगता है कि वे हर मोर्चे पर शासन चलाने में संघर्ष कर रहे हैं. सिर्फ पांच महीनों में ही यह साफ हो गया कि कैसे जनता का भारी समर्थन तेजी से राजनीतिक संकट में बदल सकता है.
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