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माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाना सपा का ब्राह्मण कार्ड या खेल कुछ और है?

Uttar Pradesh विधानसभा में अखिलेश यादव ने माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी है. इस पद के लिए शिवपाल यादव, इंद्रजीत सरोज, रामअचल राजभर और तूफानी सरोज के नाम चल रहे थे. लेकिन अखिलेश यादव ने एक ब्राह्मण चेहरे को पीडीए समीकरण के ऊपर तरजीह दी है.

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यूपी विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं माता प्रसाद पांडेय. (फोटो- X/@yadavakhilesh)

29 जुलाई से उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र की शुरुआत हो रही है. सत्र से एक दिन पहले यानी 28 जुलाई को सपा के विधायकों की बैठक हुई. एजेंडा था विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का चुनाव. जो सपा प्रमुख अखिलेश यादव के इस्तीफे से खाली हुआ था. अखिलेश अब लोकसभा के सदस्य हैं. सपा की बैठक में विधायकों ने नेता प्रतिपक्ष चुनने की जिम्मेदारी अखिलेश यादव पर ही डाली. कयास ऐसे लगाए जा रहे थे कि किसी दलित या पिछड़े को इस पद की जिम्मेदारी मिल सकती है. सूत्रों के हवाले से कुछ नाम भी चल रहे थे. जिनमें शिवपाल यादव, इंद्रजीत सरोज, रामअचल राजभर और तूफानी सरोज शामिल हैं. लेकिन नाम आया तो सबके अनुमान धरे रह गए. अखिलेश यादव ने सबको चौंकाते हुए पार्टी के वयोवृद्ध ब्राह्मण नेता माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा के निचले सदन की जिम्मेदारी सौंप दी.

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अगर आप अखिलेश यादव की सियासी रणनीति पर गौर फरमाएंगे तो पाएंगे कि सपा ने PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) के फॉर्मूले पर लोकसभा चुनाव लड़ा. उन्होंने आरक्षण के मुद्दे को भी खूब उछाला. लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि अखिलेश की रणनीति काम भी आई. सपा लोकसभा चुनाव में 37 सीटों पर जीत हासिल हुई. लेकिन अब PDA फॉर्मूले से हटकर सपा ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद के लिए एक ब्राह्मण नेता का दांव खेला है.

शिवपाल और दूसरे दावेदार क्यों पिछड़े?

विधानसभा में विधायक दल के नेता के लिए शिवपाल यादव का नाम भी चला. सपा का एक धड़ा चाहता था कि शिवपाल यादव को ये जिम्मेदारी मिले. लेकिन अखिलेश यादव कुछ दिन पहले लालबहादुर यादव को उच्च सदन विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बना चुके थे. फिर इंद्रजीत सरोज का नाम आया. सूत्र बताते हैं कि इस पर पार्टी के नेताओं का मानना था कि एक तो इंद्रजीत सरोज दूसरी पार्टी से सपा में आए हैं, उनको सपा के काम करने के तरीके के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. और दूसरा उनके बेटे पुष्पेंद्र सरोज कौशांबी से सांसद हैं. ऐसे में विरोधी परिवारवाद पर घेर सकते हैं. 

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इसके अलावा रामअचल राजभर का नाम भी इस रेस में था. लेकिन वो भी बसपा से सपा में आए थे. एक और दावेदार तूफानी सरोज अंतिम समय तक रेस में बने थे. लेकिन अखिलेश यादव अपने किसी भरोसेमंद नेता पर ही विश्वास जताना चाहते थे. इसलिए माता प्रसाद पांडेय को चुना.

इंडिया टुडे से जुड़े आशीष मिश्रा बताते है, 

सपा को एक ऐसा नेता चाहिए था जो भाजपा को काउंटर कर सके. अपनी पार्टी के सभी नेताओं को साथ लेकर चल सके. और जो पार्टी के लोगों से भली भांति मुखातिब भी हो. उस लिहाज से माता प्रसाद पांडेय फिट बैठते हैं. दो बार स्पीकर रहे हैं. सात बार विधायक रहे हैं. 82 साल उम्र है. बैठक में कुछ मुस्लिम नेताओं के नाम की भी चर्चा हुई. लेकिन फिर बात आई कि मुस्लिम नाम आएगा तो भाजपा को ध्रुवीकरण की राजनीति का मौका मिल जाएगा.

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सपा के इस कदम पर सीनियर जर्नलिस्ट राजकुमार सिंह कहते हैं,

नेता प्रतिपक्ष किसी भी पार्टी के लिए बड़ा महत्वपूर्ण पद होता है. और अखिलेश यादव खुद इस पद पर थे. इसलिए वो चाहते थे कि इस पद पर कोई ऐसा आदमी बैठे जो उनके पूरे भरोसे का हो. और जिसका समाजवादी नीतियों के प्रति कमिटमेंट हो. माता प्रसाद पांडेय इन दोनों बातों पर खरे उतरते हैं. एक तो बहुत पुराने समाजवादी नेता हैं. उनको विश्वास है कि वो विधानसभा में कोई ऐसा कदम नहीं उठाएंगे जो पार्टी की नीतियों के खिलाफ हो. साथ ही अखिलेश को इस बात का भी भरोसा है कि पांडेय अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को बाइपास नहीं करेंगे.

दरअसल, माता प्रसाद पांडेय मुलायम सिंह यादव के पुराने सहयोगी रहे हैं. और अखिलेश यादव के भी विश्वासपात्र है. अखिलेश पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनको विधानसभा का स्पीकर बनाया था. राजकुमार सिंह आगे बताते हैं कि माता प्रसाद पांडेय को ये जिम्मेदारी दिया तो गई भरोसेमंद होने की वजह से. लेकिन अखिलेश यादव को माता प्रसाद का ब्राह्मण होना, एक ऐडेड एडवांटेज नजर आया. वो कहते हैं कि PDA का उनका कार्ड तो लोकसभा चुनाव में चल गया. कई बार ऐसी बातें चलती हैं उत्तर प्रदेश में कि ब्राह्मण योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से नाराज हैं. तो उनको एक संदेश देने की कोशिश की गई है कि वो 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की ओर देखे.

अखिलेश की ब्राह्मणों को रिझाने की कवायद

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 12 प्रतिशत बताई जाती है. ब्राह्मण समुदाय पारंपरिक तौर पर बीजेपी का वोटर माना जाता है. हालांकि 2007 के यूपी विधानसभा चुनावों में उनका एक हिस्सा बसपा के साथ भी गया था. तब बीएसपी ने नारा दिया था. ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’. मायावती ने 66 ब्राह्मणों को टिकट दिया. ब्राह्मणों ने शंख बजाया और मायावती मुख्यमंत्री बनीं. 

अखिलेश यादव की ब्राह्मणों को रिझाने की यह कवायद नई नहीं है. इससे पहले 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी अखिलेश यादव इस वोटबैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश कर चुके हैं. 2022 चुनावों के दौरान सपा ने पूरे राज्य में परशुराम जयंती का आयोजन किया. इस दौरान अखिलेश यादव ने परशुराम की मूर्ति का अनावरण भी किया था. और कई मंचों पर हाथ में फरसा थामे भी नजर आए थे. लेकिन विधानसभा चुनावों में उनके तमाम प्रयासों के बावजूद कुछ खास सफलता नहीं मिली. और ब्राह्मण समुदाय के बड़े हिस्से ने बीजेपी में ही अपना विश्वास जताया. 

आशीष मिश्रा ने बताते हैं 

2022 के मुकाबले परिस्थितियां बदल चुकी हैं. 2024 में आप देखेंगे कि कई जगहों पर ब्राह्मणों ने बीजेपी का उतना साथ नहीं दिया. अंबेडकरनगर में रितेश मिश्रा हार गए. वहीं बलिया से सपा के टिकट पर सनातन पांडेय जीत गए. 2024 के चुनाव में ये संकेत मिल गया कि ब्राह्मणों का एक वर्ग बीजेपी से नाराज है. फैजाबाद लोकसभा सीट पर बीएसपी के ब्राह्मण कैंडिडेट को पचास हजार से ज्यादा वोट मिला. वहीं बीजेपी के कई ब्राह्मण चेहरे हार गए. जिसमें साकेत मिश्रा और महेंद्रनाथ पांडेय भी शामिल हैं.

सवर्ण मतदाताओं को मैसेज देने की कोशिश

लोकसभा चुनावों के पहले अखिलेश यादव ने PDA का मतलब बताते हुए कहा था कि PDA में A का मतलब आधी आबादी और अगड़े भी हैं. माता प्रसाद पांडेय की नियुक्ति इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है. क्योंकि सपा के ब्राह्मण चेहरे और पूर्व चीफ व्हिप मनोज कुमार पांडेय फरवरी में राज्यसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. जिसके बाद सपा की छवि एंटी फॉरवर्ड पार्टी की बनती जा रही थी.

आशीष मिश्रा कहते हैं,  

मनोज पांडेय और उनके साथ कई सवर्ण नेताओं के सपा छोड़कर बीजेपी में जाने से एक माहौल बना कि सपा कथित अपर कास्ट और ब्राह्मण विरोधी पार्टी है. अब माता प्रसाद पांडेय को बनाकर अपर कास्ट में भी एक मैसेज देने की कोशिश की गई है.

कौन हैं माता प्रसाद पांडेय?

माता प्रसाद पांडेय पूर्वी उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के इटवा विधानसभा से सात बार के विधायक हैं. उन्होंने अपना पहला चुनाव 1980 में जनता पार्टी के कैंडिडेट के तौर पर इटवा से लड़ा था. 1985 में वे लोकदल के टिकट पर इटावा से फिर जीते. और 1989 में जनता दल के कैंडिडेट के तौर पर तीसरी बार यहां से जीते. 

माता प्रसाद पांडेय 2002 में पहली बार सपा के टिकट से चुनाव जीते. फिर 2007 और 2012 में भी इटवा से जीत दर्ज की. लेकिन 2017 के चुनाव में बीजेपी के सतीश चंद्र द्विवेदी से उनको हार का सामना करना पड़ा. फिर 2022 के चुनाव में पांडेय ने करीबी मुकाबले में द्विवेदी को 1662 वोटों से मात दी.

वो 2004 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार के समय विधानसभा अध्यक्ष रहे थे. और 2012 में जब अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा सत्ता में आई तो उन्हें फिर से विधानसभा स्पीकर बनाया गया.

ये भी पढ़ें - लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में हर पार्टी ब्राह्मणों को क्यों रिझाना चाहती है?

माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाने पर यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव पर निशाना साधा है. केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पिछड़े दलितों को धोखा दिया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 

कांग्रेस के मोहरा सपा बहादुर श्री अखिलेश यादव जी की नेता प्रतिपक्ष चुनते ही असलियत सामने आने से सपा में PDA चालीसा पढ़ने वाले पिछड़े दलितों के समर्थन से चुनकर आए नेताओं में मायूसी है.

केशव प्रसाद मौर्य के बयान के पीछे की राजनीति पर राजकुमार सिंह बताते हैं, 

अखिलेश यादव ने अपना मूव चल दिया है. इसका फायदा होगा या नुकसान होगा ये तो 2027 में पता चलेगा. लेकिन बीजेपी अगर अपनी  रणनीति में बदलाव कर पिछड़े और दलितों को और अधिक तवज्जो संगठन और सरकार में देंगे तो निश्चित रूप से अखिलेश यादव का PDA प्रभावित हो सकता है. और केशव प्रसाद मौर्य उसी चीज को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.

माता प्रसाद पांडेय के नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने पर बीएसपी प्रमुख मायावती ने भी अखिलेश यादव पर हमला बोला है. उन्होंने उन पर PDA को गुमराह करने का आरोप लगाया है. मायावती ने कहा कि सपा में एक जाति विशेष को छोड़कर बाकी PDA के लिए कोई जगह नहीं है.

मायावती ने एक्स पर लिखा,

सपा मुखिया ने लोकसभा आम चुनाव में खासकर संविधान बचाने की आड़ में यहां PDA को गुमराह करके उनका वोट तो जरूर ले लिया लेकिन यूपी विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता बनाने में जो इनकी उपेक्षा की गई. यह भी सोचने की बात है. जबकि सपा में एक जाति विशेष को छोड़कर बाकी PDA के लिए कोई जगह नहीं. ब्राह्मण समाज की तो कतई नहीं क्योंकि सपा व भाजपा सरकार में जो इनका उत्पीड़न व उपेक्षा हुई है वह किसी से छिपा नहीं. वास्तव में इनका विकास एवं उत्थान केवल BSP सरकार में ही हुआ. 

मायावती का अखिलेश पर हमलावर होना लाज़मी है. लेकिन इसका संबंध 2024 के लोकसभा चुनाव भी हैं. इस चुनाव में अखिलेश की पार्टी मायावती के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रही है. इस बार मायावती के वोट छिटकर बीजेपी से कहीं ज्यादा अखिलेश की पार्टी और इंडिया गठबंधन के पास गए. 

बहरहाल, अखिलेश ने इस बार ब्राह्मण नेता का दांव चला है. सदन में माता प्रसाद पांडेय सरकार को घेरने में कितना कारगर साबित होंगे और उनकी पार्टी ब्राह्मणों को रिझाने में कितनी कामयाब होगी, ये आने वाले वक्त में देखना दिलचस्प होगा.

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