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लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में हर पार्टी ब्राह्मणों को क्यों रिझाना चाहती है?

बीजेपी राजस्थान में ब्राह्मण भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाती है, तो मध्य प्रदेश में राजेंद्र शुक्ला को उप-मुख्यमंत्री. कहा गया कि ये यूपी को मैसेज देने की कोशिश है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी 24 दिसंबर से ब्राह्मण महापंचायत से चुनाव प्रचार शुरू करने जा रही है.

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22 दिसंबर 2023 (अपडेटेड: 22 दिसंबर 2023, 01:08 AM IST)
Brahmin Votes in UP
सांकेतिक तस्वीर. (India Today)
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चुनाव राजस्थान में हुए. नया मुख्यमंत्री राजस्थान को मिला. लेकिन भजनलाल के नाम की चर्चा राजस्थान के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में भी होने लगी. इसकी वजह थी उनका ब्राह्मण समुदाय से आना. कहा गया कि राजस्थान में एक ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने यूपी के ब्राह्मण वोटरों को साधने की कोशिश की है. इससे पहले मध्यप्रदेश में भी राजेंद्र शुक्ला को डिप्टी सीएम बनाया गया था.

पांच राज्यों के चुनाव संपन्न हुए, तो सभी दलों का फोकस लोकसभा चुनाव की तरफ शिफ्ट हुआ. बीजेपी दो राज्यों में ब्राह्मण मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री बनाकर पूरे समुदाय को संदेश देने की कोशिश कर चुकी है. उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है. बीजेपी के बाद समाजवादी पार्टी ने भी आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए नया दांव चला है. अखिलेश यादव की सपा 24 दिसंबर से ब्राह्मण महापंचायत के साथ चुनाव प्रचार शुरू करने जा रही है.

तो इसे ब्राह्मण समाज को राजनीतिक तवज्जो देने के तौर पर देखा जाए, या सिर्फ वोटों की सियासत के तौर पर?

बीजेपी के नज़रिए से देखा जाए, तो उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव के पहले से ऐसा कहा जाने लगा था कि यूपी के ब्राह्मण योगी सरकार से नाराज़ हैं. जुलाई 2020 में बिकरू कांड के बाद गैंगस्टर विकास दुबे का एनकाउंटर हुआ. उसके बाद विपक्ष ने योगी सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने के आरोप भी लगाए. बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर योगी सरकार पर ब्राह्मणों पर अत्याचार करने का आरोप लगाया. इधर कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया. जितिन प्रसाद तब कांग्रेस में हुआ करते थे. यूपी में जितिन को ब्राह्मणों का 'नेता' माना जाता है. जितिन ने योगी सरकार पर आरोप लगाए और ब्राह्मणों को जोड़ने का काम शुरू कर दिया.

बीजेपी में शामिल होते जितिन प्रसाद. (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)

उस दौरान राजनीतिक गलियारों में इस तरह की चर्चा जोर पकड़ गई थी कि क्या यूपी के ब्राह्मण बीजेपी से नाराज़ हैं! इसीलिए बीजेपी ने सबसे पहले जितिन प्रसाद को ही अपनी पार्टी में शामिल कर लिया. हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में ये साफ हो गया कि ब्राह्मणों की बीजेपी से नाराज़गी की बात में दम नहीं है. लेकिन पिछली सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे दिनेश शर्मा को इस बार योगी कैबिनेट में जगह नहीं मिली. लेकिन ब्राह्मण समाज से आने वाले बृजेश पाठक को योगी का डिप्टी नियुक्त किया गया. हालांकि, कुछ समय बाद दिनेश शर्मा को भी कथित 'ब्राह्मण कोटे' से राज्यसभा भेजकर औपचारिकता पूरी की गई. क्योंकि कहा जाता है कि अवध क्षेत्र में दिनेश शर्मा की ब्राह्मणों पर जितनी पकड़ है, उतनी किसी और नेता की नहीं है. इससे पहले 2017 विधानसभा चुनाव में मेरठ सीट से हारकर हाशिए पर पहुंच चुके लक्ष्मीकांत वाजपेई को भी को राज्यसभा भेजा गया और फिर उन्हें सदन में चीफ व्हिप भी बनाया गया.

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी की बात करें, तो स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरित मानस, हिंदू धर्म और ब्राह्मण को लेकर दिए गए बयानों के बाद संतों ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई थी. सपा पर पहले से यादव-मुस्लिम पार्टी होने के आरोप लगते रहे हैं. जबकि ब्राह्मणों को बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है. ऐसे में मौर्य के बयानों से ब्राह्मण समाज के सपा से और दूर होने की संभावना है.

वैसे, ब्राह्मणों को लुभाने के लिए ब्राह्मण महापचंयात सपा का पहला पासा नहीं है. अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे अभिषेक मिश्र ने लखनऊ में 108 फीट ऊंची परशुराम की मूर्ति लगवाई और ऐलान किया कि सभी जिलों में मूर्ति लगाई जाएगी. और अब लोकसभा चुनाव के लिए ब्राह्मण महापंचायत.

बात अगर बसपा और कांग्रेस की करें, बसपा सतीश चंद्र मिश्र और कांग्रेस प्रमोद तिवारी के सहारे ब्राह्मणों को साधने की कोशिश करती रही है, जो 10 सालों में कारगर साबित होती नहीं दिख रही है. हालांकि, 2007 विधानसभा चुनाव में मायावती को ब्राह्मण-जाटव की सोशल इंजीनियरिंग का भरपूर फायदा मिला. बसपा ने तब नारा दिया- ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, तो हाथी बढ़ता जाएगा’. मायावती ने 66 ब्राह्मणों को टिकट दिया. ब्राह्मणों ने शंख बजाया और मायावती मुख्यमंत्री बनीं.

यूपी में ब्राह्मणों का कितना रसूख?

मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद से भले ही राज्य में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना, लेकिन इस समाज का रसूख हर सरकार में दिखाई दिया. आरोप तो ये भी लगते रहे हैं कि यूपी की ब्यूरोक्रेसी में ब्राह्मणों का सिक्का चलता है. हालांकि, इन्हें दावे ही कहा जाना चाहिए.

राज्य में ब्राह्मण समाज की आबादी लगभग 10 प्रतिशत के आसपास आंकी जाती है. न्यूज़ 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में कुल 12 सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण वोट 15 प्रतिशत से ज्यादा है. बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर, इलाहाबाद. यानी एकतरफा वोट इन सीटों के नतीजे को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.

इंडिया टुडे मैगज़ीन के वरिष्ठ संवाददाता आशीष मिश्र कहते हैं कि

विधानसभा चुनाव में सरकार उसी की बनती है, जिसके ब्राह्मण विधायक ज्यादा होते हैं. इसलिए लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा, सभी पार्टियां ब्राह्मणों को साधने की पूरी कोशिश करती हैं. लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ब्राह्मणों को सभी संकेत देने में जुटी है. और समाजवादी पार्टी की ब्राह्मण महापंचायत भी इसी कोशिश का हिस्सा है.

जो बात आशीष कह रहे हैं, उस पर उन्होंने विस्तार से एक रिपोर्ट की है. इंडिया टुडे मैगज़ीन के 30 जून 2021 के एडिशन में छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक 2007 विधानसभा चुनाव में 58 ब्राह्मण विधायक चुने गए. 41 बसपा के थे, सरकार बसपा की बनी. 2012 में 41 ब्राह्मण विधायक बने. 21 सपा के थे, सरकार सपा की बनी. 2017 में 56 विधायक ब्राह्मण समाज से आए. 46 बीजेपी के थे, सरकार बीजेपी की बनी.

यूपी में लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण वोटों के पैटर्न पर CSDS ने एक सर्वे किया था. इस सर्वे में बताया गया कि 2009 और 2014 लोकसभा चुनावों में ब्राह्मण किसके साथ नजर आया. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में 31 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट किया था, जबकि 2014 में सिर्फ 11 फीसदी ही रह गए. वहीं बीजेपी को 2009 में 53 परसेंट ब्राह्मणों ने वोट किया, 2014 में समर्थन बढ़कर 72 फीसदी तक पहुंच गया. और बीजेपी ने 80 में से 71 सीटें जीत लीं. बीएसपी को ब्राह्मणों का 2009 में 9 फीसदी और 2014 में सिर्फ 5 फीसदी वोट मिला. जबकि समाजवादी पार्टी को 2009 और 2014 दोनों लोकसभा चुनाव में पांच-पांच फीसदी ही ब्राह्मण वोट हासिल हुए.

शायद यही वजह है कि यूपी में चुनाव से पहले कोई भी पार्टी ब्राह्मण वोटबैंक की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती.

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