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जो गंदगी शेहला रशीद के नाम पर फैली थी, आज स्मृति ईरानी तक पहुंच गई

कीचड़ फैलाने वाले दोनों तरफ हैं, लेकिन निशाना सिर्फ महिला नेता बनती हैं.

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औरतों के बारे में ऐसी बातें करने वाले लोग कौन हैं और कहां से आते हैं.
इंसान में हैवान यहां भी है वहां भी अल्लाह निगहबान यहां भी है वहां भी खूंख्वार दरिंदों के फक़त नाम अलग हैं शहरों में बयाबान यहां भी है वहां भी निदा फ़ाज़ली की ये ग़ज़ल 'राजनीतिक भक्तों' पर बिल्कुल फिट बैठती है. छात्र नेता और जेनएनयूएसयू की पूर्व उपाध्यक्ष हैं शेहला रशीद. पिछले दिनों बेगूसराय में थीं. अपने ही कॉलेज के पास आउट कन्हैया कुमार के प्रचार के लिए. कन्हैया बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे हैं. सीपीआई के टिकट पर. शेहला राशिद के बारे में फेसबुक पर कई तरह की पोस्ट शेयर की जा रही हैं. कई लोगों ने उनके बारे में लिखा, 'बेगूसराय में पुलिस की जांच में शेहला रशीद के बैग से मिले कंडोम. ये कन्हैया के लिए वहां प्रचार करने गई है या चुनावी खर्च निकालने.' condom2 कुछ लोग कीचड़ में उतरे और बाकी उनके साथ लोटने लगे. दूसरी तरफ के लोगों को लगा कि हम क्यों पीछे रहें. वे भी उतर गए कीचड़ में. केंद्रीय मंत्री हैं स्मृति ईरानी. राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ रही हैं. जब कुछ लोग रशीद के बैग में कंडोम गिन रहे थे उसी समय दूसरे पक्ष के लोग ईरानी के बैग में कंडोम गिनने लगे. ट्विटर पर कई लोगों ने शेहला रशीद का नाम हटाकर स्मृति ईरानी का नाम जोड़ दिया. इतना ही नहीं ऐसा करने वाले ईरानी के वेरिफाइड ट्विटर हैंडल को टैग कर रहे हैं. आखिर इन लोगों में इतनी हिम्मत आती कहां से है जो ट्विटर पर टैग कर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं? condom1 देश में चुनाव चल रहे हैं. राजनातिक पार्टियां साम,दाम दंड, भेद किसी भी तरह चुनाव जीतना चाहती हैं. जो भाषा नेता बोल रहे हैं, वहीं भाषा उनके भक्त बोल रहे हैं. नेताओं को उनकी गंदी जुबान के लिए नोटिस मिल रहे हैं. कार्रवाई हो रही है, लेकिन बार-बार वही भाषा बोल रहे हैं. उन्ही के कदमों पर उनके भक्त भी चल रहे हैं. असर इतना कि वे भी नेताओं की तरह सार्वजनिक मंच से उस व्यक्ति को टैग कर अपनी घटिया सोच का प्रदर्शन कर रहे हैं. उन्हें किसी का डर नहीं है. वे बेखौफ महिलाओं के बारे में इस तरह की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं. बात किसी एक पार्टी की नहीं है. ऐसा करने वाले दोनों ओर हैं. ये अजीब भी है और परेशान भी करता है. इन्हें किनका संरक्षण मिला है, जो ये इतने बेख़ौफ़ हैं. इनका अकांउट फर्ज़ी है, पर संस्थाएं अपने पर उतर आएं तो इंटरनेट की दीवारों के पार से भी फर्ज़ी अकाउंट वालों को पकड़ कर हेकड़ी निकाल सकती हैं. ये बात इन्हें भी पता है, लेकिन डर कहीं दिखता ही नहीं. बदतमीज़ी और दुस्साहस सोशल मीडिया पर कई गुने बढ़ से गए हैं. कुछ तो कारण होगा. पुलिस का नाम लेकर झूठ और घटिया बातें परोसी जा रही हैं. रशीद के बैग में जो लोग कंडोम गिर रहे हैं उन्होंने पुलिस का नाम लिया. कि पुलिस की जांच में ऐसा हुआ. वही बातें ईरानी के बारे में लिखी जा रही हैं. अपनी घटिया बातें करने के लिए संस्थाओं की आड़ ली जा रही है.  और कोई कुछ नहीं कर पा रहा है.
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