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बम धमाका नहीं किया था, फिर भी 23 साल जेल में रहना पड़ा

निसार को सुप्रीम कोर्ट ने बम धमाकों के केस में बरी कर दिया है. रिहा होने के बाद निर्दोष निसार ने सुनाई आपबीती.

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फोटो क्रेडिट: इंडियन एक्सप्रेस, निसार जेल से रिहा होने के बाद
मेरी ज़िंदगी के 8150 दिन जेल में गुजरे. मेरे लिए ज़िंदगी खत्म हो गई है. आप जो मुझे देख रहे हैं, ये एक जिंदा लाश है. मैं अपने पैरों को भारी महसूस करता हूं. लगता नहीं है कि अब 23 साल बाद मैं जेल से आजाद हूं. जेल में बिताई 23 साल की सजा, जो मुझे मिली थी बिना किसी गलती किए : निसार उद्दीन अहमद
बाबरी विध्वंस के एक साल बाद 1993 में इंडिया में अलग-अलग जगहों पर पांच ट्रेनों में बम धमाके हुए. दो लोगों की जान गई, 5 लोग घायल हुए. धमाकों के बाद पुलिस एक्टिव हुई. छानबीन की. कई लोगों को गिरफ्तार किया. 15 जनवरी 1994 को कर्नाटक में फॉरमेसी सेकेंड ईयर के स्टूडेंट निसार को पुलिस कॉलेज के पास से रिवॉल्वर का खौफ दिखाकर उठा लेती है. निसार के 15 दिन बाद एग्जाम शुरू होने थे. उम्र 20 भी पूरी नहीं हुई थी. पुलिस कहती है कि निसार बम धमाके करने वालों में शामिल था. निसार को कर्नाटक के गुलबर्ग में हैदराबाद की पुलिस की टीम गिरफ्तार करती है. कोर्ट में केस चलता है. TADA लगाया जाता है. निसार को जेल में डाल दिया जाता है. अब 23 साल बाद सुप्रीम कोर्ट निसार को बरी करती है. 11 मई को निसार जयपुर की जेल से आजाद होकर बाहर आए. बोले,

'जिंदगी के इतने साल जेल में कटे हैं कि एक पूरी जनरेशन बीत गई है.'

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निसार ने कहा, 'मैं जब 20 साल का भी नहीं था. तब उन्होंने मुझे जेल में डाल दिया था. आज मेरी उम्र 43 साल है. मेरी छोटी बहन को इससे पहले जब आखिरी बार देखा था, तब उसकी उम्र 12 साल थी. आज मेरी बहन की बेटी 12 साल की है. मेरी भांजी एक साल की है.' जेल से रिहा होते ही निसार ने पहली रात जयपुर के होटल में गुजारी. कहा, 'मुझे रातभर नींद नहीं आई. कमरे में सोने के लिए बैड था. इतने साल जेल में फर्श पर गुजारी कि बिस्तर पर नींद नहीं आई.' द इंडियन एक्सप्रेस को शुक्रिया. इस कहानी को सामने लाने के लिए. बता दें कि निसार के साथ जेल में सजा काट रहे तीन लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया है. कोर्ट ने उम्रकैद की सजा को खत्म करने के साथ तत्काल प्रभाव से निसार को रिहा करने का आदेश दिया.
बता दें कि निसार के भाई जहीर उद्दीन को भी 1994 में अप्रैल में अरेस्ट कर लिया गया. जहीर ने कहा, 'कोई इस बात को इमेजिन नहीं कर सकता कि एक परिवार के दो जवान बेटे जेल में हैं. हमारे अब्बा ने हम दोनों की बेगुनाही साबित करने के लिए हर कोशिश की. और वो इसी कोशिश को करते-करते साल 2006 में दुनिया छोड़ गए.'
निसार की तरह की जहीर को भी उम्र कैद की सजा मिली थी. लेकिन जहीर को लंग कैंसर होने की वजह से 2008 में हेल्थ ग्राउंड्स के आधार पर जेल से रिहा कर दिया गया था. निसार ने कहा, 'हम लगातार सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रहे थे. आखिरकार अब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने हमें दोषमुक्त करार दिया.' पुलिस ने शुरुआत में निसार, जहीर और कार मैकेनिक मोहम्मद यूसूफ को अक्टूबर 1993 में हैदराबाद के मुस्लिम एजुकेशन इंस्टीटयूट में हुए बम धमाके के आरोप में पकड़ा. पुलिस ने तीनों को कई और बम धमाकों को भी दोषी माना. फिर आखिर में ट्रेन धमाकों का आरोपी माना. पुलिस की तरफ से जो सबूत पेश किए गए. उसमें कस्टडी के दौरान निसार के दिए बयान शामिल थे. कथित कबूलनामे के मुताबिक, 'निसार ने 6 दिसंबर 1993 में एपी एक्सप्रेस में बम प्लांट करने की बात मानी थी. निसार ने केके एक्सप्रेस में धमाका करने के लिए दो बम अपने होने की बात कही. पर क्योंकि उसकी तबीयत खराब थी. इसलिए वो दो बमों का इस्तेमाल नहीं कर सका.' ये पुलिस की कस्टडी के दौरान दिए निसार के बयान हैं.
हैदराबाद की शुरुआती जांच के बाद ये केस सीबीआई ने संभाला. सीबीआई ने 13 अन्य लोगों को धमाकों का आरोपी माना. मुंबई का जलीस अंसारी धमाकों के मास्टरमाइंड बताया गया, जिसने बाबरी मस्जिद विध्वंस का बदला लेने के लिए बम धमाकों की साजिश प्लांट की. 1996 में हैदराबाद मेट्रोपॉलिटियन सेशन जज ने केस में TADA हटाने का आदेश दिया. आंध्र सरकार ने इसके खिलाफ अपील की. लेकिन साल 2001 में ये अपील वापस ली गई.
निसार ने कहा, 'TADA हटाए जाने के बाद हैदराबाद कोर्ट में कथित कबूलनामे को नहीं माना गया. लेकिन वहां के कबूलनामे को अजमेर की टाडा कोर्ट में हम पर आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया गया.' फरवरी 2004 में अजमेर में टाडा कोर्ट ने 14 लोगों को दोषी माना. उम्र कैद की सजा सुनाई. टाडा कोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. और अब 12 साल बाद निसार को बाइज्जत बरी कर दिया गया है.

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