जब मंदिर में पहुंचे दलित
20 मई को जौनसार बावर परिवर्तन यात्रा का आयोजन हुआ. जिसका रूट था विकास नगर से पोखरी तक. पोखरी देहरादून की चकराता तहसील का गांव है. जहां मंदिर है 'शिलगुर महाराज' का. शिलगुर महाराज वहां के स्थानीय देवता हैं. उनके लिए भव्य मंदिर बनाया गया है. देश के तमाम मंदिरों की तरह इस मंदिर में भी दलितों के घुसने पर रोक लगी है. पिछले 36 साल से.'आराधना ग्रामीण विकास केंद्र समिति' ने ये यात्रा ऑर्गनाइज की थी. समिति के संरक्षक हैं दौलत कुंवर और उनकी पत्नी सरस्वती कुंवर हैं इसकी अध्यक्ष. दोनों जन दलितों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. इससे पहले गबेला गांव के मंदिर में दलितों को ले जाने के लिए दो हफ्ते भूख हड़ताल कर दी. सवर्ण नहीं माने. फिर पुलिस आई. पुलिस के अपने तरीके होते हैं. मंदिर में एंट्री मिल गई. दलितों के वापस जाते ही मंदिर का शुद्धिकरण किया गया. गंगाजल और गौमूत्र से धोकर.
तो शाम साढ़े चार बजे तक पुलिस, दौलत कुंवर और तरुण विजय मंदिर तक पहुंचते हैं. पहले वहां 'दौलत कुंवर मुर्दाबाद' के नारे लगते हैं. फिर शोर बढ़ता है. और पथराव शुरू हो जाता है. एक पत्थर सांसद तरुण विजय के सिर में भी लगता है. वो चोटहिल हो जाते हैं. अपनी गाड़ी के पीछे छिप कर किसी तरह खुद को बचाते हैं. भीड़ उनकी गाड़ी को खाई में धकेल देती है. दौलत कुंवर खेत मेड़ पकड़ कर भागते हैं. तरुण विजय भी किसी तरह गांव से निकल कर अस्पताल पहुंचते हैं.

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गांव वालों ने की सुरक्षा की मांग
रविवार को तकरीबन 100 गांव वाले दून हॉस्पिटल पहुंचे. जहां दौलत कुंवर भर्ती हैं. डिमांड की कि दौलत कुंवर को सरकारी सुरक्षा दी जाए. जब तक ऐसा नहीं होता, वो वापस नहीं जाएंगे. पुलिस की टीम ने तरुण विजय और साथियों पर हमला करने वालों को अरेस्ट करने के लिए रेड डालना शुरू किया.
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इधर मंदिर के पुजारी कह रहे हैं "36 साल से शिलगुर देवता हमको संभाल रहे हैं. उस परंपरा को तोड़ा गया है. देवता गुस्से में हैं. उनको मनाने के लिए पूजा करनी पड़ेगी. अगले 9 दिनों तक मंदिर की शुद्धि के लिए पूजा होगी."
















