पर्सनली अगर इस बारे में कहूं तो कॉमेडी करने के लिए ये सबसे बेहतरीन समय है. टीवी अपने निम्नतम स्तर पर गिर चुका है. जर्नलिज्म और जर्नलिस्ट पाले में जा खड़े हुए हैं. पाले के मालिक देश चला रहे हैं. देश में क्या खाना है से लेकर क्या पहनना है, क्या देखना है और किस वक्त देखना है, सब कुछ निर्धारित किया जा रहा है और बाकायदा उसे थोपने की कोशिश भी की जा रही है. विवाह संबंधों में भी जिहाद जैसे टर्म शामिल हो चुके हैं. और ऐसे में कॉमेडी करने के लिए सबसे बेहतरीन मटीरियल मिलता है. लोगों की औकात बताने के लिये इससे बेहतर समय ही नहीं हो सकता. एक परफ़ेक्ट दुनिया सोचिये. एकदम परफ़ेक्ट. कोई समस्या ही नहीं. न धर्म की लड़ाई, न एक फ़िल्म से संस्कृति भ्रष्ट होने का खतरा, न अंधभक्त, न अच्छे दिनों का अधूरा वादा, न पड़ोसी के साथ चिकचिक, न मराठी मानुष का शोर, न भइय्या लोगों से चिढ़, न भारत के टुकड़े होने का नारा, न जेल के बाहर वकीलों की गुंडागर्दी इत्यादि इत्यादि. अगर ये सब न हो तो किस बात का मज़ाक उड़ाया जाएगा? महिलाओं को समान अधिकार मिलने लग जाएं तो आधी झुंझलाहट यूं ही ख़तम हो जाए. और झुंझलाहट ख़तम तो कॉमेडी ख़तम. (फिर बस कपिल शर्मा ही चलेगा. लेकिन वो फिर कभी.) मुझे नहीं लगता है कि बिना खीझ, बिना बेचैनी और बिना झुंझलाहट के आप कॉमेडी करने की सोच भी सकते हैं.
साल 2017 के 5 चेहरे जो हमें यूट्यूब, फ़ेसबुक वगैरह पर खूब दिखे. ये 2017 में उभरे और इन्होंने काफ़ी कमाल का काम किया. इनसे हमने बातें भी की और इनका काम तो पूरे साल देखा ही देखा.
#1 संदीप शर्मा

बरेली का आदमी. एकदम बक. फ़ोन पे बात करते हुए ऐसा लग रहा था कि इसको अपने स्कूल में होना चहिए था. बहुत मौज आती.
साल 2012 में संदीप ने मुंबई की ट्रेन पकड़ी. रेडियो प्रोडक्शन किया, फिर ऐड एजेंसी के लिए लिखा. 2 साल कुछ करते हुए गुज़रा लेकिन ठीक से कुछ चल नहीं पा रहा था. 2014 में वापस दिल्ली. एक न्यूज़ चैनल में काम किया और फिर लगा कि ये तो और भी बदतर है. हालांकि स्टैंड-अप कॉमेडी करना 2010 में ही शुरू कर दिया था, लेकिन तब मामला छोटा था. 2015 में एक मज़ेदार बात हुई. न्यूज़ चैनल में काम करते हुए पूरी रात जागकर किसी शो की स्क्रिप्ट तैयार की. अगले पूरे दिन नींद नहीं मिली. शाम को मेनहट्टन पब में स्टैंड-अप करने पहुंचे. इनके साथ लिखने वाला इनका फ़ोन नहीं उठा रहा था और ये भयानक नर्वस. 48 घंटे से जागे हुए संदीप ने सूखे मुंह के साथ कॉमेडी करनी शुरू की तो नतीजा ये रहा कि पब के मैनेजर ने इन्हें 'कैनवस लाफ़ क्लब' से बैन करने की सिफ़ारिश कर दी.
एक मज़ेदार किस्सा है 2015 का. तारीख भी याद है - 2 अगस्त. 300 की केपेसिटी वाले ऑडिटोरियम में कुल 6 लोग. लाइन-अप में कॉमेडियन भी कुल 6. सभी को आगे वाली सीटों पर बिठाया. समोसे बेचने वालों को भी पकड़ के वहीं बिठाया. इंटरवल भी कैंसिल करवा दिया. डर था कि कहीं इंटरवल में 1-2 कम न हो जाएं. समोसे खाते हुए, ऑडियंस से ही चटनी लेते हुए उनके बीच कॉमेडी की. संदीप कहते हैं कि उस दिन जो कॉन्टेंट लेकर गया था, नहीं सुनाया. बस ऑडियंस से बातचीत की. फ़ोकस इस बात पर था कि जनता रुकी रहे तो कम से कम शो ख़तम होने पर पैसे मिल जायेंगे. जो भी सामने बैठे सुन रहे थे, सबको 2-2 समोसे अपनी जेब से खिलाये. जनता (जितनी भी थी) लहालोट थी. खूब मज़े ले रही थी. इस पूरे काम को समोसे बेचने वाले भाई ने अपने फोन पर रिकॉर्ड कर लिया. जाकर अपने बॉस को दिखाया. बॉस ने संदीप को बुलाया और पूछा कि वो कम परफॉर्म क्यूं करते हैं. तब सारे राज़ खुले. लाइन-अप बनाने वाला बंदा संदीप को पसंद नहीं करता था इसलिए उनका नाम आने ही नहीं देता था. अगले दिन उसे बेहतरीन वाली डांट मिली और बरेली के संदीप शर्मा को मिला मुंबई में एक स्टेज.
संदीप एक बात कहते हैं जो मारक लगी. कहते हैं कि 'शुरुआत में जब स्टेज पर गड़बड़ लगता था तो सोचता था कि 17 दिनों की लिखी कॉमेडी से बेहतर है 17 सालों का तजुर्बा. वो कॉमेडी काम नहीं करेगी, तो तजुर्बा सब संभाल लेगा.' ये तजुर्बा एकदम उस पेन की तरह होता है जिसमें 4 रंग की रिफ़िल लगती थीं. कोई भी सिचुएशन हो, काम हो जाता है.
संदीप अपने नाना से काफ़ी इंस्पायर हुए. नाना गाना गाते थे और हारमोनियम बजाते थे. सुबह 5 बजे उठाकर भजन गवाते थे और फिर संदीप से पढ़ाई में लग जाने को कहते थे. 70 साल की उम्र में 5 किलोमीटर की सैर करने वाले नाना ने संदीप को परफॉर्मर बनाया. और 21 की उम्र में पहली बार मेट्रो शहर देखने वाला संदीप आईआईटी में जाकर 2 बार डिबेट वगैरह में जीतकर आया. इसके प्रोफ़ेसर एनएल शर्मा अपनी जेब से पैसे देकर टिकट करवाते. वसीम बरेलवी ने संदीप को काफ़ी इन्सपायर किया. वो मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर संदीप के कॉलेज में आया करते थे. बाद में संदीप उनके घर आने-जाने लगे और ये सिलसिला चलता रहा.
संदीप कहते हैं कि कॉमेडी नया गिटार है. पहले हर लड़का गिटार बजा कर हीरो बनना चाहता था, अब उसके पास स्टैंड-अप है. कॉमेडी करने वालों को परसाई के बारे में कुछ नहीं पता है. वो लुईस सीके को सुन के आते हैं और उन्हें लगता है कि कहीं भी वो जोक मारेंगे और लोग हंसने लगेंगे. बकौल संदीप, "जब लुईस कहता है कि 'Kids are assholes' तो वो अमरीकी कल्चर में कह रहा होता है. यहां आप कह दीजिये तो बाप जूते ले के दौड़ा लेगा. क्यूंकि उसने पहले ही अपने बेटे को इतना सूता हुआ है कि वो चाहता ही नहीं है आप उसके बारे में एक लफ्ज़ और निकालें. अमरीका में तो बच्चा पालना प्राइड का मामला होता है. आप वहां ये लिबर्टी ले सकते हैं. ये वो देश है जहां एक आदमी माइक पर चिल्लाता है - 'मैंने देश के लिए अपनी पत्नी छोड़ दी.' अरे भाई ये कोई तोप नहीं मारी है तुमने. उस औरत के एंगल से देखो कितना बुरा काम है ये." लेकिन फिर भी संदीप इंडियन स्टैंड-अप सीन के लिए काफ़ी पॉजिटिव हैं क्यूंकि वो कहते हैं कि इस देश में मटीरियल की कमी ही नहीं है. (कुनाल कामरा के मिलते जुलते स्टेटमेंट को वो याद करते हैं.)
संदीप को 'बॉम्बे का ब्राह्मण ब्रो' वीडियो से जाना जाने लगा. वो काफ़ी पॉपुलर हुए और अब बढ़िया नाम कमा रहे हैं. 2018 में काफ़ी कुछ एक्स्पेक्ट किया जा रहा है और संदीप टियर-3 सिटीज़ को असली इंडिया कहते हैं जहां वो इस साल खूब परफॉर्म करने वाले हैं.
#2 पुनीत पनिया

इन्हें मोदी जी से अगर कुछ सीखना चाहिए तो वो है फ़ोटो खिंचवाना. यहां ऐसी तस्वीर नहीं लगानी पड़ती.
एक सिंधी जिसकी जड़ें कराची में हैं. पुनीत 'बॉर्न एंड ब्रॉट अप इन मुंबई' वाली जमात से हैं. एमबीए डिग्री धारी हैं और इस बात का इन्हें कोई घमंड नहीं है. 3 साल पहले तक कॉर्पोरेट में सर घुसा रखे थे. सुबह नाश्ते में पावर पॉइंट प्रेज़ेन्टेशन लेते थे और रात तक खुद ही कहीं स्लाइड हो जाते थे. फार्मा कंपनी में सेल्स वाले थे इसलिए पैरों में पहिये फिट करवाने की नौबत आ गई थी. इसके साथ ही ये कॉमेडी शो ऑर्गनाइज़ कर रहे थे. 24 में 3 घंटे सोने को मिल रहा था. जैसे ही शो ऑर्गनाइज़ करते हुए कमाई होने लगी, नौकरी छोड़ दी. आज के दिन में मुंबई का सबसे बड़ा ऑर्गेनाइज़र - 'चलता है कॉमेडी'.
पुनीत ने इस काम में घुसते ही परफॉर्म करना शुरू कर दिया. लगभग 3 साल पहले. लेकिन वीडियो अभी अपलोड किये. कहते हैं कि ये गंगा है जिसमें अब अपना कॉन्टेंट विसर्जित कर दिया है. आगे उसका जो होगा, देखा जाएगा. लेकिन ऑर्गनाइज़ करने के चक्कर में परफॉरमेंस को पीछे रखना पड़ता है. लिहाज़ा ज़्यादा नहीं कर पाते. वीडियो इसलिए रिलीज़ किया जिससे कॉमेडी सीन के नक़्शे पर पुनीत पनिया के नाम की भी एक मुहर लग जाए. क्यूंकि आज के वक़्त में ऐसा है कि अगर आपके स्टैंड-अप का वीडियो नहीं है तो आपका अस्तित्व ही नहीं है. और एक ये भी काम हो जाता है कि जब वीडियो अपलोड कर दिया, उसके बाद वही कॉन्टेंट और नहीं सुना सकते. क्यूंकि वो सब देख चुके हैं. इसलिए एक कॉन्टेंट से बोर हो जाओ तो उसे अपलोड कर दो. कुछ नया लिखो.
पुनीत भले ही 3 सालों से इस 'धंधे' में हैं, लेकिन लिख वो काफ़ी वक़्त से रहे हैं. हिंदी पढ़ने की प्रैक्टिस छोड़ चुके पुनीत काफ़ी वक़्त से ब्लॉग्स वगैरह लिख रहे हैं. इसलिए लोगों को मालूम था कि वो फ़नी हैं. ये कहना मुश्किल है कि वो पढ़के हंस रहे थे या इस बात पर हंस रहे थे कि ये आदमी लिख रहा है. खैर, इसके बारे में फिर कभी :P लेकिन पुनीत जब लिखते थे तो पढ़ने वाले हमेशा इस इंतजार में होते थे कि अंत आते आते ये ज़रूर कोई न कोई झापड़ मारेगा. पुनीत का सारा कॉन्टेंट रियल चीज़ों से ही जुड़ा हुआ होता है.
पुनीत अपनी शुरुआत के बारे में बताते हैं कि उन्हें जॉर्ज कार्लिन बहुत पसंद था. उसे खूब फॉलो भी किया लेकिन मुंबई में ओपन माइक और स्टैंड-अप सीन के बारे में उन्हें काफ़ी बाद में मालूम चला. इस बात पर मुझे 'बॉर्न एंड ब्रॉट अप इन मुंबई' वाली बात पर शक ज़रूर हुआ लेकिन फिर सोचा, हो सकता है मज़ाक कर रहा हो. है तो वैसे भी कॉमिक ही.
आज के वक़्त में चल रही कॉमेडी को देखकर पुनीत एक बेहतरीन ऑब्जरवेशन करते हैं. उन्होंने बताया कि 'शुरुआत में मुंबई के अमीर लड़के जो बोलिंग करते-करते थक गए थे, कॉमेडी में आ गए. शुरुआत में ये अमीरों का 'खेल' बन गया था. लेकिन फिर इसमें एक नई पीढ़ी आनी शुरू हुई. अब मिडल क्लास के लोगों की बारी थी. उन्होंने ज़्यादा ज़मीनी बातों को कॉमेडी में शामिल किया. अब जो तीसरी जमात आएगी न, उसमें हीरा निकलेगा.' बात भी सही है. ज़मीन से पेट्रोल निकालो तो पहले मिट्टी, फिर मिट्टी का तेल और फिर असली पेट्रोल निकलता है.
पहले इस फ़ील्ड में सब कुछ अंग्रेजी में ही होता था. लेकिन फिर धीरे धीरे हिंदी ने अपनी जगह बनाई और अच्छा फीडबैक मिला. लिहाज़ा अब सभी हिंदी-अंग्रेजी मिक्स रखने लगे हैं. कई ऐसे भी हैं जो हिंदी में ही करते हैं. पुनीत ये भी कहते हैं कि एक ये धंधा ऐसा है जहां आपके काम का फीडबैक तुरंत ही आ जाता है. यहां इमोशन कनेक्ट करना पड़ता है. कनेक्ट नहीं हुआ तो ऑन द स्पॉट गालियां पड़ती हैं. इसके साथ ही ऑर्गनाइज़ करने वाले एंगल से भी ये काफ़ी कठिन काम होता है. आपको माइक से लेकर ऑडियंस के एम्बियंस और लाइट और सीट्स का ख्याल रखना पड़ता है.
पुनीत अपनी एमबीए स्किल्स को कॉमेडी में इन्वेस्ट कर रहे हैं. बेच लेने की अपनी फ़ितरत को काम में ला रहे हैं. ये अनोखा संगम कहा जाएगा. इस पर शायद आप हंसे. पुनीत यहीं सफ़ल हो जाते हैं. उनका काम ही यही है. वो चाहते हैं कि मुंबई की तरह दिल्ली, कलकत्ता, बेंगलुरु में अच्छे ऑर्गनाइज़र आ जाएं तो एक चेन शुरू हो. इससे इंडिया का कॉमेडी सीन सुधर सकता है और फिर नए टैलेंट सामने आयेंगे.
#3 जसप्रीत सिंह

मैंने जसप्रीत को पहली बार इंडिया के स्टेब्लिश हो चुके कॉमिक डेनियल फर्नांडिस के शो में ओपन करते हुए देखा था. दस मिनट में गुलाबी पगड़ी वाले इस सरदार ने बता दिया था कि ये काफ़ी असरदार होने वाला है. साल भर के अंदर आज जसप्रीत के वीडियो व्हाट्सैप पर फ़ॉरवर्ड होते हैं. जसप्रीत अपने सोलो शोज़ कर रहे हैं.
ये आदमी पहले फेसबुक पर नहीं था. कहता है कि टाइम वेस्ट लगता था. फ़ोन पर बात करते हुए लग भी रहा था कि एकदम 'नो नॉनसेन्स' वाला मामला है. 15 मार्च, 2015 को पहली बार ओपन माइक में खड़ा हो गया. जसप्रीत को ऐसा लगा कि ये तो बड़ी आसान चीज़ है. जैसे नॉर्मल मौकों पर बात करता है, वैसे ही माइक पर भी बोल देता है. स्टेज पर डर नहीं लगता है क्यूंकि खूब थियेटर वगैरह किया था. एंटी सोशल में किये पहले ओपन माइक ने खूब हौसला दिया और जसप्रीत स्टैंड-अप की ओर पहला कदम बढ़ा चुका था.
सॉफ्टवेयर इंजीनियर जसप्रीत जनवरी की दस तारीख के बाद फ़ुल टाइम कॉमिक हो जायेंगे. साल 2017 में ही उन्होंने नौकरी का अंत करने की सोच ली थी. हालांकि लोगों को यही बताते हैं कि इंजीनियर हैं. कॉलेज वगैरह में परफॉर्म करते हैं. वहां कोई पूछता है कि 'और क्या करते हो?' तो कहते हैं "बीवी के पैसों पर ऐश करता हूं." किसी को ज़्यादा एक्सप्लेन करना नहीं चाहते. अपने काम से काम रखते हैं.
अमित टंडन को देखकर जसप्रीत को लगा ही नहीं कि ये कोई मुश्किल काम है. जसप्रीत ये भी कहते हैं कि बहुत सारे लोग कॉमेडी सर्किट में आ रहे हैं लेकिन आपको माइक के सामने किसी को भी दस मिनट सुन के मालूम पड़ जाता है कि उसमें पोटास है या नहीं. 2-4 बार में ये भी पता लग जाता है कि अगला टिकेगा या नहीं.
साथ ही जसप्रीत का ये भी कहना है कि उन सभी कॉमिक्स को ज़ाकिर खान के लिए एक थैंक यू नोट लिखना चाहिए जो हिंदी में कॉन्टेंट बना रहे हैं. इसके अलावा अमित टंडन एक बहुत बड़ा नाम हैं और जसप्रीत को काफ़ी पसंद हैं. बाकी इंडियन कॉमेडी सीन में जसप्रीत को काफ़ी 'चू*याप' नज़र आता है. वो कहते हैं कि इमोशनल कॉन्टेंट ही ऐसा है जो जिंदा रहेगा. बाकी सब एक दिन मर जाएगा और वो दिन बहुत जल्दी आएगा.
अपने कॉन्टेंट में 80% कहानियां असल जीवन से निकालने वाले जसप्रीत वेब सीरीज़ वगैरह के चक्कर में अभी नहीं पड़ना चाह रहे हैं. वो खुद को उस ज़ोन में नहीं पाते हैं जहां वो किसी वेब सीरीज़ के बारे में सोच रहे हों या उसे लिखने के बारे में विचार कर रहे हों. 2018 में जसप्रीत एक बेहतर राइटर बनना चाहते हैं और चाहते हैं कि उनकी रीच बढ़े जिसके लिए वो फ़रवरी-मार्च में अपने सोलो शोज़ कर रहे हैं.
#4 उरूज अशफ़ाक़

उरूज से हमने बात करने की कोशिश की तो मालूम पड़ा कि वो दफ़्तर में हैं जहां से वो शाम 8 बजे फ़्री होंगी. उसके बाद से एक मिस्ड कॉल और एक एसएमएस के बावजूद उरूज का कोई अता पता नहीं है. इसलिए यहां लिखी गई सभी बातें उनके यूट्यूब वीडियो और गूगल पर उंगलियां पटकने के बाद सोची-समझी गई हैं. ;) अब आगे.
राइटर और कॉमेडियन उरूज मुंबई से हैं. ऐसी बातों पर बात करती हैं जिन पर काफ़ी बात होनी चाहिए लेकिन इन पर बात करने से लोग अक्सर कतराते हैं. मसलन बुर्का. ऑल इंडिया बकचोद के साथ 2 महीने इंटर्नशिप और अबीश मैथ्यू के टॉक शो 'सन ऑफ़ अबीश' में काम करने वाली 22 साल की उरूज कॉमेडी सर्किट में काफ़ी पहले से मौजूद लोगों से मिली मदद के लिए शुक्रगुज़ार हैं. हालांकि जब पहली बार ओपन माइक में उरूज एक फ़ुल हाउस के सामने खड़ी हुई थीं तो डिलीवरी उतनी अच्छी नहीं हुई थी. लेकिन पहला फाउल तो कैरम में भी माफ़ होता है. ये तो फिर भी स्टैंड-अप था. उरूज को TLC के शो क्वीन्स ऑफ़ कॉमेडी में खूब देखा गया और उन्हें काफ़ी पॉजिटिव फीडबैक मिला.
उरूज ने अपनी प्रेरणा होमियोपैथी की दवाइयों से ली है. मीठी गोलियों पर जैसे कड़वे रस को लेप कर मरीज को खिलाया जाता है वैसे ही सीरियस बातों को हंसी के साथ डिलीवर कर के उरूज अपना रास्ता नाप लेती हैं. मेटल म्यूज़िक की फैन उरूज आर्चीज़ के लिए साल 2017 काफ़ी कमाल का रहा है.
#5 कुनाल कामरा

कुनाल कामरा, बिना किसी शक, 2017 में सबसे ज़्यादा गाली खाने वाला कॉमेडियन है. जिस वीडियो के लिए कुनाल को सबसे ज़्यादा टार्गेट किया गया, उस वीडियो की शुरुआत होती है, "इट्स ग्रेट यार! आई लव इंडिया." लेकिन फिर सब कुछ बर्बाद हो जाता है. उसके बाद अपने घर के सामने पड़े गू से लेकर जेएनयू में स्टूडेंट्स की उधारी की बात करते-करते कुनाल नोटबंदी, एटीएम की लाइन और 'सियाचिन में हमारे जवान लड़ रहे हैं' की बात करने लगते हैं. 8 मिनट के वीडियो में सूडो-नेशनलिज्म की धज्जियां उड़ाने के बाद कुनाल को चारों तरफ से घेरा जा रहा था. एक वक़्त के लिए कुनाल को भरपूर ट्रोल किया जा रहा था लेकिन फिर पद्मावती की शूटिंग शुरू हो गई. फिर ट्रोल करने वालों का ध्यान भटक गया.
भाई बिज़ी था इसलिए बोला कि सवाल भेज दे, मैं जवाब भेज दूंगा. आज तक कोई जवाब नहीं आया. कुनाल शायद कॉमेडियन्स का आरटीआई ऑफिस है.
तीन वीडियो के बाद कुनाल ने अपना टॉक-शो शुरू किया. 'शट अप या कुनाल'. कुनाल तीन एपिसोड में बीजेपी यूथ विंग के वाइस-प्रेसिडेंट, फिर कांग्रेस की नेशनल स्पोक्स्पर्सन प्रियंका चतुर्वेदी और फिर तीसरे एपिसोड में कन्हैया कुमार और उमर खालिद को लेकर आए. इसमें उन सभी बातों को कवर किया जो सोशल मीडिया पर धकापेल चल रही थीं. ज़्यादातर बातें पॉलिटिकल थीं लेकिन फिर भी ज़रूरी थीं. (यहां मज़ाक करने की कोई भी कोशिश नहीं की गई है.) इस सीरीज़ ने भी काफ़ी धमाल मचाया और लोगों में काफ़ी कुलबुलाहट पैदा की. एक कॉमेडियन के तौर पर कुनाल अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से निभाते हुए दिख रहे थे. वो सिर्फ हंसा ही नहीं रहे थे बल्कि दिमाग की कसरत भी करवा रहे थे.
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