2014 से 2018 तक 39 भारतीय मोसुल में लापता थे. साढ़े तीन साल तक उनकी तलाश होती रही. फिर अब उनका पता चल गया. उन सबकी हत्या की जा चुकी थी. मोसुल की लड़ाई खत्म होने के बाद वहां कई जगहों पर सामूहिक कब्रें मिली थीं. ऐसे ही एक पहाड़ पर एक सामूहिक कब्र के अंदर इन हिंदुस्तानियों की लाशें दबी होने की जानकारी मिली. लाशों को निकाला गया. उनकी डीएनए जांच हुई. सैंपल्स को इन लापता भारतीयों के डीएनए सैंपल्स से मिलाया गया. 39 में से 38 के सैंपल मैच हो गए. तय था कि सारे के सारे मारे जा चुके हैं.

ये जून 2014 की तस्वीर है. लापता भारतीयों के परिवारवाले अपने-अपनों की फोटो थामे खड़े हैं. जब ISIS ने मोसुल पर कब्जा किया, तब ये 39 भारतीय वहां एक सरकार कंस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे थे. साढ़े तीन साल तक चली तलाश के बाद अब ये पक्का हो गया है कि ये सभी मारे जा चुके हैं.
एक बयान के साथ वो सभी 'लापता' अब 'मृतक' हो गए हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में ये जानकारी दी. सुषमा ने कहा:
जब तक उनके बचे होने की आस थी, तब तक फिर भी एक उम्मीद जिंदा थी. अब पता चल चुका है कि वो सभी भारतीय मारे गए. हम उनके शवों को विशेष विमान से भारत लाएंगे. वो जहां-जहां के रहने वाले थे, उन शहरों में जाकर उनके परिवार को अस्थियां सौंपी जाएंगी.कौन थे ये भारतीय? ये सारे भारतीय मजदूर थे. कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मजदूरी करते थे. मारे गए 39 लोगों में 31 पंजाब के थे. बाकी कुछ बिहार और कुछ पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे.
इन भारतीयों के साथ क्या हुआ था? 2014 में ये सभी लोग एक सरकारी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे थे. फिर ISIS ने मोसुल पर हमला कर दिया. वहां तैनात इराकी सैनिक भाग गए. जो बचे, मारे गए. शहर और वहां रहने वालों पर आतंकियों ने कब्जा कर लिया. इसके बाद इन सभी भारतीय मजदूरों के साथ संपर्क टूट गया. 2014 में जून के दूसरे हफ्ते में जाकर इराक स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने इनकी खबर दी. माना गया कि इन सबको ISIS ने किडनैप कर लिया है.

इराक से ISIS का सफाया हो चुका है. मोसुल और उसके आस-पास के इलाकों में कई सारी सामूहिक कब्रें मिलीं. इनमें मिली लाशों को नाम देने की, उनकी पहचान खोजने की कोशिशें अब भी जारी हैं. तस्वीर में एक इराकी सैनिक एक मास ग्रेव की तरफ इशारा कर रहा है.
भारत सरकार ने क्या किया? इराक स्थित भारतीय दूतावास और भारतीय विदेश मंत्रालय लगातार कोशिश कर रहा था. अपहरणकर्ताओं के साथ संपर्क की कोशिश हो रही थी. ताकि भारतीयों को छुड़वाया जा सके. सरकार इन भारतीयों के परिवारवालों के साथ भी लगातार संपर्क बनाए हुए थी.
हरजीत मसीह ने क्या कहानी सुनाई थी? हरजीत मसीह उन 40 भारतीयों में थे, जिन्हें ISIS ने किडनैप किया था. वो बच निकले थे. उनका कहना था कि आतंकी उन लोगों को किसी अज्ञात जगह पर ले गए. फिर उन्हें घुटनों के बल कतार में बैठने को कहा. और फिर सबके ऊपर अंधाधुंध गोली चलाई. हरजीत के पैर में गोली लगी. और वो बाकी लोगों की लाश के नीचे दब गए. आतंकियों ने सबको मरा समझा और वहां से चले गए. हरजीत किसी तरह जान बचाकर एक बांग्लादेशी राहत शिविर पहुंचे. वहां उन्हें एक अस्पताल में भर्ती कराया गया. फिर उन्होंने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से संपर्क कर उनसे मदद मांगी. और इस तरह इराक से वापस घर लौटे. हरजीत के मुताबिक 14 जून, 2014 को ये घटना हुई. तब सुषमा स्वराज ने हरजीत की बात को खारिज किया था. उन्होंने कहा था कि उन्हें छह अलग-अलग सूत्रों से पता चला है. कि लापता भारतीय जिंदा हैं. लोकसभा में बयान देते हुए तब उन्होंने कहा था:
बिना पुख्ता सबूतों के किसी जिंदा इंसान को मरा हुआ बताना पाप है. मैं ये पाप नहीं करूंगी.हरजीत ने झूठी कहानी सुनाई: सुषमा सुषमा ने राज्यसभा में बताया कि हरजीत की बताई कहानी झूठी थी. आतंकियों ने 55 के करीब बांग्लादेशियों और 40 भारतीयों को अगवा किया था. फिर उन्हें एक ही जगह पर अलग-अलग रखा. हरजीत ने जुगाड़ लगाकर अपना नाम बदल लिया. हरजीत की जगह अपना नाम अली बताया. और वो बांग्लादेशियों के एक ग्रुप के साथ हो लिए थे. उन बांग्लादेशी नागरिकों को ISIS ने छोड़ दिया. उनके साथ ही हरजीत इरबिल पहुंचे. इरबिल से ही उनकी बात सुषमा से हुई थी. सुषमा का कहना है कि हरजीत ये तक नहीं बता सके कि वो इरबिल कैसे पहुंचे.

लापता भारतीयों के परिवारवालों के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज. सुषमा ने राज्यसभा में बोलते हुए कहा कि बिना पक्के सबूत के वो उन गुमशुदा भारतीयों को मृत नहीं मानना चाहती थीं. उन्होंने कहा कि सरकार ने उन 39 भारतीयों को बचाने की हर मुमकिन कोशिश की.
मोसुल की आजादी अक्टूबर 2016. अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ मोसुल में मिलिटरी ऑपरेशन शुरू किया था. महीनों लड़ाई चली. लाखों लोग मरे. शहर को ISIS से आजाद करा लिया गया. इराक सरकार के साथ मिलकर भारत ने उन लापता भारतीयों की तलाश शुरू की. लेकिन उनकी कोई थाह नहीं मिली.
विदेश राज्यमंत्री वी के सिंह इराक भी गए जनरल (रिटायर्ड) वी के सिंह इराक गए. इन लापता भारतीयों की खबर लगाने. ये जुलाई 2017 की बात है. खुफिया सूत्रों के हवाले से उन्होंने कहा कि ISIS ने उन भारतीयों को खेती के काम में लगा दिया था. फिर वहां से उन्हें बादुश जेल में ले जाकर बंद कर दिया. उनके निशान खोजती भारत सरकार के पास इसके आगे की कोई जानकारी नहीं थी. बादुश जेल के बाद वो कहां गए, उनका क्या हुआ, इसकी कोई खबर नहीं मिल रही थी. फिर इराक सरकार का बयान आया. कि बादुश जेल को पूरा खाली करा लिया गया है. वहां कोई कैदी नहीं है. जो लोग निकाले गए, उनमें ये लापता भारतीय नहीं थे. 2017 में खबर आई कि भारत सरकार ने इन लापता भारतीयों के परिवारवालों से ब्लड सैंपल जमा करना शुरू कर दिया था. ताकि डीएनए जांच कराई जा सके.

ये एक सामूहिक कब्र की तस्वीर है. इराक के मुताबिक, इसमें 25 लोगों की लाशें थीं. सारे के सारे अल्पसंख्यक यजीदी समुदाय से थे. कब्र के पास खड़े सैनिक कुर्दिश पेशमरगा के लड़ाके हैं.
इराक ने क्या कहा था? इराक के विदेश मंत्री इब्राहिम अल-जाफरी ने कहा. कि इराक सरकार को नहीं पता कि वो लापता भारतीय जिंदा हैं या नहीं. इराक सरकार ने कहा कि वो भी उन्हें खोज निकालने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
साढ़े तीन सालों तक चली जद्दोजहद, उम्मीद सब खत्म हो गई. वो भी इस तरह. अब वो गुमशुदा भी न रहे थे. वो 'लापता' से 'मृतक' हो गए थे.
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