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किन्नरों को 'बधाई' के नाम पर पैसे मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट

रेखा देवी ने तर्क दिया था कि इस तरह के पैसे या गिफ्ट लेने का चलन कई सालों से रहा है. यह एक पारंपरिक अधिकार बन गया है. लेकिन जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की एक बेंच ने फैसला सुनाया कि इसका कोई कानूनी आधार नहीं है. कोर्ट ने इसे लेकर कई तर्क भी दिए हैं.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को लेकर फैसला सुनाया है (PHOTO-Wikipedia)

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा कि किन्नरों के पास ‘बधाई’ यानी शुभ मौकों पर दिए जाने वाले पारंपरिक चढ़ावे या उपहार लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. इस मामले में ट्रांसजेंडर समुदाय की एक सदस्य रेखा देवी ने एक याचिका दायर की थी. रेखा देवी ने तर्क दिया था कि इस तरह के पैसे या गिफ्ट लेने का चलन कई सालों से रहा है. यह एक पारंपरिक अधिकार बन गया है. लेकिन जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की एक बेंच ने फैसला सुनाया कि इसका कोई कानूनी आधार नहीं है.

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हाई कोर्ट ने क्या तर्क दिए?

कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी नागरिक को सिर्फ उतना ही टैक्स, सेस या फीस देने का निर्देश दिया जा सकता है, जो उनसे कानून के हिसाब से सही तरीके से लिया जा सके. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा कि इस तरह से पैसे निकालना किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने कहा,

‘ऐसा कोई वैध या कानूनी आधार मौजूद नहीं है, जो किसी को कानून के अनुसार निर्धारित प्रक्रिया के अलावा, किसी दूसरे व्यक्ति से किसी भी तरह का पैसा, टैक्स, फीस या सेस वसूलने या लेने की इजाजत देता हो. याचिकाकर्ता ने जो अधिकार मांगे हैं, उन्हें कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं. भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्राप्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, कोर्ट याचिकाकर्ता के इन कामों को तब तक वैध नहीं ठहरा सकता, जब तक कि उन्हें किसी भी कानून का सपोर्ट न हो.’

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कोर्ट ने आगे कहा,

‘यदि याचिकाकर्ता के मामले में किसी भी तरह की नरमी बरती जाती है, तो ऐसे कई और लोग या गिरोह हो सकते हैं जो सक्रिय हों और लोगों से अवैध वसूली या जबरन उगाही कर रहे हों. इस देश में कानून ऐसी अवैध वसूली को कभी भी मान्यता नहीं देता. भारतीय न्याय संहिता के तहत ऐसी वसूली एक अपराध है.’

ये याचिका हाई कोर्ट क्यों पहुंची?

रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ता गोंडा जिले के किन्नर समुदाय से ताल्लुक रखती हैं. वह लंबे समय से एक खास इलाके में 'बधाई' इकट्ठा करने के अपने पारंपरिक अधिकार का इस्तेमाल कर रही हैं. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि गोंडा जिले में ऐसे ही और भी किन्नर रहते हैं, जो 'बधाई' इकट्ठा करते हैं. हालांकि, कोर्ट को बताया गया कि वे एक-दूसरे के इलाकों में दखल दे रहे थे, जिससे समुदाय के सदस्यों के बीच दुश्मनी और हिंसा बढ़ रही थी.

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इस मामले में याचिकाकर्ता ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग की, ताकि वह बिना किसी हिंसा के डर के 'बधाई' इकट्ठा करने का अपना काम जारी रख सके. याचिका में यह भी मांग की गई थी कि 'बधाई' इकट्ठा करने के लिए इलाकों की सीमा तय करने का निर्देश दिया जाए. लेकिन कोर्ट ने फैसला सुनाया कि चूंकि 'बधाई' इकट्ठा करने का कोई अधिकार कानून में मौजूद नहीं है, इसलिए वह इस तरह के काम को सुरक्षा नहीं दे सकता. 

वीडियो: ट्रांसजेंडर बिल के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, लोगों ने क्या की मांग?

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